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बुधवार, 8 जून 2016

छत्तीसगढ़िया सबसे बढ़िया


स्थानीय बनाम बाहरी का वायरस राजनीति और लोकजीवन के छद्म दिमागों से निकल कर बीमारी की तरह फैलने को बेताब होता रहता है. छत्तीसगढ़ सहित अन्य प्रदेशों में नारा उछलता रहा कि स्थानीय का ही राज होगा, बाहरी लोगों का नहीं. इतिहास को अंकगणित के पहाड़े की पुस्तक बनाया जाता है. ढूंढ़ा जाता रहा कि किसके पुरखे कितने बरस पहले छत्तीसगढ़ की धरती पर आए.

जबान पर छत्तीसगढ़ी भाषा (बोली) प्राकृतिक मुहावरे की तरह चढ़ी है अथवा नहीं. शब्दकोश से विशेषण निकालकर उन्हें चस्पा किया जाता है. ’परदेशी’ ’बाहरी’ ’शोषक’ ’दुश्मन’, ’गैरछत्तीसगढ़िया’ जैसे असंवैधानिक शब्दों से भी नवाजा जाता रहा है. कथित बाहरी लोगों में वे भी शामिल हैं, जो स्वतंत्रता संग्राम सैनिक, सरहदों की रक्षा के शहीदों के परिवार और छत्तीसगढ़ की धरती की पहचान बनाने के अशेष सांस्कृतिक हस्ताक्षर हैं.

छत्तीसगढ़ में भी अरसे से कथित बाहरी लोगों का ही वर्चस्व रहा है. अमूमन सभी ब्राह्मण परिवार-चाहे गंगापारी हों या सरयूपारी-उत्तरप्रदेश से ही आए हैं. राजनीति और साहित्य संस्कृति सहित उद्योगों में भी उनका वर्चस्व रहा है. यही हाल प्रतिष्ठित कई क्षत्रिय और वैश्य परिवारों का भी है.

रविशंकर शुक्ल, श्यामाचरण शुक्ल, विद्याचरण शुक्ल, राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल, हरिप्रसाद शुक्ल, देवीप्रसाद चैबे, रवीन्द्र चैबे, कमलनारायण शर्मा, कन्हैयालाल शर्मा, डॉ. श्रीधर मिश्र, ठाकुर प्यारेलाल सिंह, सुधीर मुखर्जी, मदन तिवारी, पद्मावती देवी, दिलीप सिंह जूदेव, देवेन्द्र कुमारी देवी, रामचन्द्र सिंहदेव जैसे सैकड़ों छोटे बड़े नेता आखिर मूल वंश परम्परा के अनुसार छत्तीसगढ़ के तो नहीं हैं. सत्ता व्यवस्था पर आरोप लगाने वाले मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को भी उत्तरप्रदेश से आया वंशज कहते हैं. यही आरोप नेता प्रतिपक्ष टी. एस. सिंहदेव पर है.

वैश्य कुल के प्रभावशाली नेताओं में सेठ नेमीचंद जैन, लखीराम अग्रवाल, मोहनलाल बाकलीवाल, श्रीकृष्णा अग्रवाल, रामकुमार अग्रवाल, बृजमोहन अग्रवाल, अमर अग्रवाल, राजेश मूणत, इंदरचंद जैन आदि संकीर्ण अर्थों में छत्तीसगढ़ का मूल निवासी होने का दावा क्यों नहीं कर सकते? अन्य कई जातियों, उपजातियों और समूहों के जनप्रतिनिधि मसलन पंढरीराव कृदत्त, अशोक राव,जे. पी. एल. फ्रांसिस, डॉ. जयराम अय्यर, भारतचंद्र काबरा, बंदेअली फातमी कैसे समझाएंगे कि वे छत्तीसगढ़िया कोख से होने के बाद भी किस परिभाषा के अंतर्गत मूल स्थानीय नहीं समझे जाएंगे.

पत्रकारिता के सहारे कांग्रेस की राजनीति में पिछले चालीस वर्षों से हावी मोतीलाल वोरा राजस्थान से ही छत्तीसगढ़ आए थे. छत्तीसगढ़ के सभी बड़े दैनिक समाचार पत्रों के स्वामी मोटे तौर पर राजस्थान के ही मूल निवासी प्रचारित किए जाते हैं. तथाकथित पिछड़ी जातियों के बहुत से सूरमा पूर्वजों का इतिहास उलटने पलटने पर पाएंगे कि अंगरेज़ी ज़माने के गज़ेटियर और इतिहासवृत्तांत बताते हैं कि उनमें से अधिकांश उत्तरप्रदेश से ही आए हैं.

छत्तीसगढ़ी अस्मिता की अगुवाई करने वाले चंदूलाल चंद्राकर, पुरुषोत्तम कौशिक,खूबचंद बघेल, बृजलाल वर्मा, हीरालाल सोनबोईर, केजूराम, रमेश बैस, वासुदेव चंद्राकर, प्यारेलाल बेलचंदन, बिसाहूराम यादव, ताम्रध्वज साहू, बैजनाथ चंद्राकर, चंद्रशेखर साहू, धनेन्द्र साहू, भवानीलाल वर्मा वगैरह के पीछे अगर कोई संकीर्ण ऐतिहासिक दृष्टि लेकर छानबीन करने पर आमादा हो जाए तो सिद्ध करेगा कि सबके पूर्वज अन्य प्रदेशों से आए थे.

छत्तीसगढ़ के किराना, सराफा, यातायात और शिक्षा व्यापार पर ऐसे लोगों का कब्जा है जिन्हें छत्तीसगढ़ का किताबी तौर पर मूल निवासी कहा जाता है. ऐतिहासिक दृष्टि से ऐसा नहीं माना जाता. खुज्जी, धमतरी, तखतपुर आदि के विधायक सिख परिवारों से रहे हैं. उनका पंजाब से रिश्ता संदेह की वस्तु नहीं है. मोहम्मद अकबर, बदरुद्दीन कुरैशी, ताहिर भाई, हमीदुल्ला खान, मुश्ताक अली वगैरह में लोग अपना जनप्रतिनिधि ढूंढ़ते रहे हैं. जातीय और नस्लीय शोधकर्ता उन्हें किसी न किसी दूसरे प्रदेश का मूल निवासी बना ही सकते हैं. छत्तीसगढ़ के जनजीवन पर पड़ोसी राज्यों महाराष्ट्र, बिहार, आंध्रप्रदेश और ओडिसा का गहरा असर है. दक्षिण बस्तर के आंध्रप्रदेश से सटे इलाकों में तेलगु भाषा के चमत्कारी प्रभाव के कारण आयातित नक्सली नेतृत्व पूरी तौर पर हावी है.

राजनांदगांव से भौगोलिक निकटता के कारण बी. एन. सी. मिल्स के आंदोलन का नेतृत्व नागपुर के कॉमरेड रुईकर, वसंत साठे और वी.वाई.राजिमवाले वगैरह ने वर्षों तक किया. छत्तीसगढ़ के साहित्य जगत के वरिष्ठ सूरमा माधवराव सप्रे और ख्यातनाम हस्ताक्षर गजानन माधव मुक्तिबोध छत्तीसगढ़ के मूल निवासी नहीं कहे जा सकते, लेकिन उन्होंने साहित्य में छत्तीसगढ़ को अमर किया.

बैकुंठपुर में जन्मे डॉ. कांतिकुमार जैन, दुर्ग-सुत अशोक वाजपेयी, बिलासपुर-पुत्र श्रीकांत वर्मा, जगदलपुर के शानी तथा मेहरुन्निसा परवेज़, राजनांदगांव में जन्मे डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र, विनोद कुमार शुक्ल तथा जयप्रकाश साव, बिलासपुर के प्रमोद वर्मा, खैरागढ़ के पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी तथा रमाकांत श्रीवास्तव, रायगढ़ के लोचनप्रसाद पांडे, मुकुटधर पांडे, चिरंजीव दास और प्रभात त्रिपाठी, अम्बिकापुर की कुंतल गोयल और विजय गुप्त तथा बस्तर के सुन्दरलाल त्रिपाठी और लाला जगदलपुरी की लेखनी ने छत्तीसगढ़ को राष्ट्रीय पहचान दिलाई. कौन जड़ों को खोदकर देखे कि उनके पूर्वज कहां के रहने वाले थे और क्यों छत्तीसगढ़ आए थे?

रायपुर के हबीब तनवीर ने छत्तीसगढ़ की लोकनाट्य कला को अंतर्राष्ट्रीय प्रसिद्धि दिलाई. आधुनिक प्रभावों के समर्थक होने के बावजूद वे मन, वचन और कर्म से छत्तीसगढ़ की संस्कृति के प्रति एकनिष्ठ रहे.

पत्रकारिक कलम थामे मायाराम सुरजन, गुरुदेव चैबे, रम्मू श्रीवास्तव, डी. पी. चैबे, रमेश याज्ञिक, शरद कोठारी, बसंत तिवारी, किरीट दोषी, रमेश नय्यर, ललित सुरजन, सुनील कुमार, जगदीश उपासने, त्रिलोक दीप, राजेश गनोदवाले, कुमार साहू, सुशील शर्मा, यशवंत धोटे, दिवाकर मुक्तिबोध, गिरीश पंकज वगैरह के पीछे कौन पड़े कि वे कब, क्यों और कहां से छत्तीसगढ़ में आए.

हॉकी में एरमन बेस्टियन तथा सबा अंजुम वगैरह खिलाड़ियों ने छत्तीसगढ़ को अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा दिलवाई. उनकी देह और उनकी हॉकी स्टिक से छत्तीसगढ़ी धरती की सुगंध आती रही.

यह अलग बात है कि राजनेता तथा कवि पवन दीवान, श्रमसाध्य लेखक परदेसीराम वर्मा, वरिष्ठ कवि विमल पाठक, प्राध्यापक डॉ. विनय पाठक, मुक्त कॉलम लेखक नन्दकिशोर शुक्ल, हास्य कवि डॉं. सुरेन्द्र दुबे, मंचीय कवि मुकुन्द कौशल तथा लक्ष्मण मस्तूरिहा, बुजुर्ग प्राध्यापक पालेश्वर शर्मा और छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग के अध्यक्ष दानेश्वर शर्मा आदि छत्तीसगढ़ी भाषा और छत्तीसगढ़ियापन के लिए लगातार सचेष्ट रहने की पहचान बनाए रखना चाहते हैं. जातिशोधक तत्व इन्हें भी अन्यप्रदेश से आया सिद्ध करते रह सकते हैं.

किशोर साहू ने फिल्मों के अशेष निर्माता बनकर राजनांदगांव और दुर्ग का भी नाम रोशन किया. यही यश रायपुर और भिलाई के अनुराग बसु बढ़ा रहे हैं. रायपुर के प्रसिद्ध संगीतज्ञ परिवार अरुण कुमार सेन और अनीता सेन के यशस्वी पुत्र शेखर सेन संगीत और कला के क्षेत्र में झंडा गाड़े हुए हैं. इन सबका आनुवंशिक मूल छत्तीसगढ़ में यदि नहीं भी स्थापित हो तो इन लोगों ने छत्तीसगढ़ को स्थापित कर ही दिया है. डॉ. पुखराज बाफना, शमशाद बेगम, फुलवासन बाई, भारती बंधु और अनुज शर्मा आदि को भारत शासन द्वारा पद्मश्री का सम्मान मिला. उनके मूल में छत्तीसगढ़ का ही यश तो है.

छत्तीसगढ़ के लोग सम्पत्ति-उद्यमी नहीं हैं कि उनके पास बड़ी पूंजी हो और अरबपति बन जाएं. छत्तीसगढ़ के बड़े ठेके ज़्यादातर आंध्रप्रदेश के ठेकेदार कबाड़े जा रहे हैं. विद्युत और लोहे के कारखानों पर हरियाणा, राजस्थान, आंध्रप्रदेश और अन्य इलाकों के लोगों का दबदबा है. स्थानीय किसानों की छोटी छोटी जोत की जमीन को मिटाकर शहरों के निकट बड़े बड़े फॉर्म हाउस बन रहे हैं. इनके जरिए गुजरात, पंजाब और हरियाणा के करोड़पति छत्तीसगढ़ी ग्रामीण व्यवहार का अस्तित्व समाप्त कर रहे हैं.

छत्तीसगढ़ में बेरोजगार नौजवानों के नियोजन की कोई व्यवस्थित अथवा अधिनियमित योजनाएं नहीं हैं. मसलन सहकारी पंचायत और स्वायत्तशासी संस्थाओं तथा शासकीय निगमों आदि में ऐसे कई उद्योग प्रकल्प स्थानीय बेरोजगार युवाओं के लिए आरक्षित किए जा सकते हैं. ऐसे संभावित उद्योग प्रकल्पों में बहुत अधिक तकनीकी विशेषता की आवश्यकता नहीं होती. राज्य शासन द्वारा आर्थिक सुविधाएं और संरक्षण मुहैया कराया जाना कठिन नहीं होगा.

युवा शक्ति को वोट कबाड़ू नेता अपने नियोजित कर्मचारियों की तरह राजनीतिक प्रचार का पुर्जा बनाकर रखते हैं. विकल्पहीन बेरोजगार युवा नेताओं और नौकरशाहों की चाकरी करने पर मजबूर हैं. वे बाहरी शोषक उद्योगपतियों के हत्थे चढ़कर सुरक्षाकर्मियों, ड्राइवरों, चैकीदारों, फार्महाउस रक्षकों, टेलीफोन ऑपरेटरों, रसोइयों आदि की नौकरी करने को लेकर संतुष्ट और अभिशप्त हैं.

फसलों में उत्पादन वृद्धि के सरकारी दावों में वृद्धि के बावजूद कृषि भूमि का रकबा सिकुड़ रहा है. जंगल बेतहाशा कट रहे हैं. उन्हें राजनीतिक पार्टियों के नेता, नौकरशाह और उद्योगपति मिलकर काट रहे हैं. जंगलों से पशु पक्षियों और वन उत्पादों के अतिरिक्त आदिवासी भी बेदखल किए जा रहे हैं. पूरा छत्तीसगढ़ खनिजों की उगाही के नाम पर खुद रहा है. कहना अतिशयोक्तिपूर्ण लगता होगा लेकिन छत्तीसगढ़ में भूकंप के खतरे बढ़ रहे हैं.

प्रदूषण तो राजधानी में ही इस कदर बढ़ा है कि राज्यपाल की चेतावनी का भी कोई असर नहीं होता. आदिवासी बहुल राज्य होने पर भी संविधान की पांचवीं अनुसूची के तहत आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों में बढ़ोतरी के लिए कोई अधिसूचना आज तक जारी नहीं की गई. नौकरशाही के तेवर इतने ढीठ हो गए हैं कि उसे जनप्रतिनिधियों, स्वतंत्रता संग्राम सैनिकों, वरिष्ठ नागरिकों और बुद्धिजीवियों का अपमान करने में अपराधिक किस्म का आनंद आने लगा है. पुलिस अपराधियों से जनता की रक्षा नहीं कर पाती. बल्कि अपनी खुद की रक्षा भी कई बार नहीं कर पाती. नक्सलवाद छत्तीसगढ़ का राष्ट्रीय नासूर है. उसके संदर्भ में राजनेताओं की सांठगांठ से इनकार करना सर्वेक्षण दलों के लिए भी मुश्किल है.

शिकागो के विश्व धर्मसम्मेलन में विवेकानन्द के जिस पहले वाक्य पर असाधारण करतल ध्वनि हुई थी, वह यह था, ’’मुझे उस धर्म का अनुयायी होने का गर्व है जिसकी भाषा संस्कृत में ’बहिष्कार’ जैसा कोई शब्द नहीं होता.’’ विवेकानन्द जन्मना कायस्थ थे. वे संयोगवश जन्मस्थान कलकत्ता के अतिरिक्त भारत में सर्वाधिक समय (दो वर्ष से ज्यादा) छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में रहे. छत्तीसगढ़ में कुर्मीवाद, साहूवाद, मारवाड़ीवाद और ब्राम्हणवाद का चतुर्भुज है. यदि वे रायपुर में ही टिके रहते और उनके जीवनकाल में छत्तीसगढ़ बन जाता तो क्या करते?

कलकत्ते में गैर-कम्युनिस्ट और छत्तीसगढ़ में बाहरी आदमी? देश की सरहदों की रक्षा में छत्तीसगढ़ के जो नौजवान सपूत शहीद हुए हैं, उनमें से अधिकांश का मूल स्थान यदि छत्तीसगढ़ के बाहर हुआ तो? इन सब कलुषित हालातों के कारण भी बाहरी और स्थानीय जैसे झगड़े सुनाई पड़ते हैं. प्रसिद्ध बंगला उपन्यासकार विमल मित्र की ‘सुरसतिया‘ नामक कहानी के कारण छीछालेदर हुई थी. छत्तीसगढ़ अन्य प्रदेशों के समझदार और पढ़े लिखे लोगों के लिए भी एक अजूबा रहस्यमय और मिथकीय इलाका प्रचारित होने की साजिश का शिकार रहा है.

जो कुछ वर्षों पहले आ गए, वे तय करेंगे कि जो बाद में आए-वे किसी पद या सेवा के लायक नहीं हैं. संविधान के निवास, अधिवास और बस जाने संबंधी प्रावधान की तात्विक घोषणाओं का क्या अर्थ है? वर्षों पहले ओडिसा से बाहरी और विशेषकर राजस्थान मूल के लोगों को भगाने का जबरदस्त अभियान छेड़ा गया था. रोटी के वास्ते पिछड़े इलाकों छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिसा, बिहार आदि से हजारों की संख्या में श्रमिक अन्य राज्यों में पलायन करते हैं. वे वर्षों वहां रहते हैं. उन्हें खानाबदोशों की जिन्दगी बिताने के लिए मजबूर किया जाता है. वे गुमनामी के अंधेरे में खोते जाते हैं.

देश में कहीं भी बसकर राजनीतिक- सांस्कृतिक-सामासिकता से एकात्म हो जाना संविधान की मंशा है और उसकी घोषणा भी. यथार्थ इतना कंटीला और कड़ियल है कि सेवानिवृत्ति के बाद हर व्यक्ति को पुरखों की तथाकथित देहरी की ओर लौटने की इच्छा या स्थिति नहीं होती. जहां उसने अपना पूरा जीवन काट लिया, उसे भी उसके जीवन की सांझ में परदेश कह दिया जाता है.
कनक तिवारी
http://cgkhabar.com/ Sunday, June 1, 2014

शनिवार, 21 फ़रवरी 2015

छत्तीसगढ़ धान का कटोरा है

कारण और निदान

कर्म संस्कृति का जनक है और संवाहक भी। व्यक्तिसः या सामूहिक रुप से किये गये धर्मनिष्ठ कर्म का कालान्तर में पुनरावृत्ति होते रहने से सांस्कृतिक अस्तित्व का आविर्भाव होता है। ऐसे बहुत से कर्म हैं जिसे हम कर्तव्य निर्वहन, हित संवर्धन या मानवता की वेदी पर रखकर जाने-अनजाने संपादित तो करते हैं, किंतु उनका
दूरगामी परिणाम इतना सुखद और लोक-मंगलकारी होगा, इसकी कल्पना भी नहीं किये होते हैं। कुछ ऐसी ही एक घटना इतिहास के गर्भ में छुपी हुई है, जिसके कारण छत्तीसगढ़ “धान का कटोरा” बन गया। कविवर श्री लक्ष्मण मस्तुरिया का गीत मोर छत्तीसगढ़ ला कहिथे भइया “धान के कटोरा”, इसे वर्तमान में जन-जन तक रमा दिया है। 
पूरी दुनिया में छत्तीसगढ़ ही एक ऐसा प्रदेश है जिसे “धान का कटोरा से संबोधित किया जाता है। इस प्रकार का संबोधन अन्य देश या प्रदेश के लिए नहीं मिलता। एक दूसरा संबोधन - उत्तरी अमेरिका के प्रेयरी प्रदेश के लिये है। उसे “रोटी की टोकरी” कहा जाता है। प्रेयरी प्रदेश “रोटी की टोकरी” है तो छत्तीसगढ़ “धान का कटोरा”। इन दोनों शब्दों के वजन और अर्थगत अंतर से आप सभी भलीभाँति परिचित हैं, तथापि अंतरपक्ष पर विहंगम दृष्टि डालने पर -
  • “कटोरा” धातु निर्मित होता है, इस कारण यह काफी मजबूत, वजनी और मूल्यवान होता है, किंतु “टोकरी” बाँस से बनी होने के कारण कमजोर, हल्की और सस्ती होती है। 
  • “रोटी की टोकरी” से आशय है- गेहूँ उत्पादक क्षेत्र और “धान का कटोरा” से आशय धान उत्पादक क्षेत्र से है। धान के फसल के लिए खेत में पानी देर तक भरा रहना चाहिये। इसलिये धान क्षेत्र के लिए “कटोरा” और गेहूँ फसल के लिये जमीन में केवल नमी चाहिये। इसलिये गेहूँ क्षेत्र के लिये “टोकरी” शब्द का उपयोग पूर्वजों द्वारा किया गया है। क्योंकि “कटोरा” में भरा हुआ पानी देर तक रहता है और “टोकरी” में पानी भरें भी तो वह शीघ्र रीस जाता है। दोनों प्रदेशों की भौगोलिक स्थितियाँ ठीक इसके अनुकूल हैं। 
  • कीमत की दृष्टि से धान मँहगा अनाज है। गेहूँ धान की तुलना में सस्ता है। 
  • धान में भरण-पोषण की क्षमता अधिक होती है। प्रति एकड़ उत्पादन भी अधिक होता है। परिणाम स्वरूप धान उत्पादक क्षेत्र धन-जन से सुसंपन्न होते हैं, जबकि गेहूँ में भरण-पोषण की क्षमता कम तथा प्रति एकड़ उत्पादन भी कम होने के कारण वहाँ की स्थिति धन-जन से कमजोर होती है। 
इस प्रकार छत्तीसगढ़ भारत-माता की गोद पर बसा विश्व का एक ऐसा महान प्रदेश है जिसे “धान का कटोरा” जैसे संपन्नता बोधक शब्द से नवाजा गया है। तभी तो लक्ष्मण मस्तुरिया अपने गीत में आगे कहते हैं- लक्ष्मी दाई के कोरा भइया, “धान के कटोरा”। 

प्रश्न अब भी अपने जगह पर स्थिर है कि छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा होने का गौरव कैसे प्राप्त हुआ ? इसका रहस्य इस ऐतिहासिक घटना के गर्भ में निहित है। 

इस वसुंधरा पर भगवान का अवतार किसी कारण विशेष के निमित्त ही नहीं प्रत्युत अनेकानेक कारणों से होते हैं। उन समस्त कारणों के मूल में जनकल्याण एवं धर्म स्थापना की भावना होती है। इसी तारतम्य में एक बार धर्म स्थापना एवं जनकल्याण के निमित्त भगवान शंकर भगवती सती के साथ ग्राम चौरेल के गौरैया प्राँगण में पधारकर लीला सम्पन्न किये। यह लीला प्रचलित किवदंतियों पर आधारित त्रेतायुगीन है। 

त्रेतायुग में तपस्वी वेशधारी एवं पत्नी-वियोग से व्यथित श्रीरामचंद्र जी को देखकर भगवती सती को उनके सच्चिदानंद होने पर संदेह उत्पन्न हो गया। इस संदेह के निवारणार्थ जब भगवान शंकर ने परीक्षा लेने की बात कही तो भगवती सती ने सीता का रूप धारण कर श्रीरामचंद्र जी की परीक्षा ली। इस घटना के पश्चात भगवान शंकर और सती इसी “गौरैया” स्थान पर पधारे। 

संध्याकालीन भोजन हेतु भगवती सती चावल चुनकर जल लेने बावली चली गईं। भगवान शंकर समय का उपयोग करते हुए ध्यान में बैठ गये। जब सती जल लेकर वापस लौटीं तो देखती हैं कि- गौरैया नामक चिड़िया चुने हुए चावल को चुग रही है। सती के पास आने पर गौरैया चिड़िया अपने चोंच में कुछ दाने दबाकर उड़ गई। देखने में यह घटना बहुत छोटी और सामान्य लगती है, किंतु चिड़िया के इस कार्य से भगवती सती धर्म-संकट में पड़ गईं। चावल चिड़िया द्वारा जूठा कर दिया गया। जूठे चावल को जान बूझकर स्वामी को खिलाना धर्म विरुद्ध है और दूसरा चावल भी नहीं है जिससे भोजन बनाया जा सके। स्वामी को बिना भोजन कराये भूखे विश्राम कराना भी पत्नी धर्म के विरुद्ध है। इस धर्म संकट का मूल कारण चावल चूगने वाली गौरैया चिड़िया थी। इस कारण उस चिड़िया के इस व्यवहार से क्षुब्ध भगवती सती माता ने धर्म-संकट के निवारणार्थ भगवान शंकर से प्रार्थना करने लगी। इससे भगवान शंकर का ध्यान भंग हो गया सती माता ने पूरा वृतांत सुनाकर नारी धर्म निर्वाह के मार्ग में उत्पन्न समस्या का समाधान करने तथा उस चिड़िया से चावल वापस लाने के लिये निवेदन की। चावल के वापस नहीं आने से क्षेत्रवासियों के समक्ष क्षुधा पूर्ति की विकट समस्या आ जाती। भगवान शंकर ने सती के वचनों में जनकल्याण की पवित्र भावना देखकर अपना तीसरा नेत्र खोल दिया। वहाँ से क्रोध का जन्म हुआ जो गौरैया चिड़िया का पीछा करने लगा। 

गौरैया चिड़िया तब तक काँकेर की उत्तरी पहाड़ी तक पहुँच चुकी थी। वहाँ देवपरियाँ संध्या भ्रमण कर रही थी। उनके पास जाकर गौरैया चिड़िया त्राहिमाम! त्राहिमाम!! क्रंदन करने लगी। 

देवपरियाँ असहाय चिड़िया की करुण पुकार सुनकर रुक गई। प्रथम देवपरी कौतुहलवश पूछने लगी -क्या बात है ? किससे रक्षा? कौन सा संकट?

चिड़िया- भगवान शंकर जी के क्रोध से रक्षा। मेरे प्राण-रक्षा का संकट, देवियों ! 

दुसरी देवपरी- भगवान शंकर के क्रोध से तुम्हारी रक्षा? तुम्हारे प्राण का संकट ? बात समझ नहीं आ रही है, स्पष्ट करो। 

चिड़िया- आप सभी देख रहे है मै एक छोटी सी चिड़िया हूँ। मुझे गौरैया के नाम से जानते हैं। मेरा जीवन प्रकृति पर आधारित है। प्रकृति द्वारा जो मेरे भोजन के योग्य मिलता है वही मेरा भोजन होता है। आज मुझे चावल मिला। मैं उसे खा ही रही थी कि माता सती आ पहुँचीं। मुझे क्या पता था कि माता सती ने भोजन पकाने के लिए उसे चुन कर रखी हैं। मुझे चावल चुगते हुए देखकर चावल जूठा हो जाने की बात को नारी धर्म पालन मे अवरोध उत्पन्न होने का विषय बना लीं, और भगवान शंकर का ध्यान भंग कर धर्म पालन करने के लिये मार्ग प्रशस्त करने का हठ करने लगीं। भगवान शंकर का तीसरा नेत्र खुल गया। जिससे उत्पन्न क्रोध मेरा पीछा कर रहा है। मेरी रक्षा कीजिये। 

तीसरी देवपरी- प्रकृति आधारित दैनिक क्रियाओं पर सामान्य व्यक्ति भी क्रोध नहीं करता। भगवान शंकर कैसे क्रोधित होंगे ? 

प्रथम देवपरी - हाँ गौरैया ! यह कैसे संभव है? भगवान तो करुणानिधान हैं, क्रोध कैसे करेंगें। 

चिड़िया - पर सच्चाई तो यही है देवियों। मैं क्या करूँ ? 

तीसरी देवपरी - अगर तुम्हारी बातें सत्य हैं तो इस घटना के पीछे कोई लीला का आभाश होता है। इस लीला के लिए तुम निमित्त बनी हो तो इसे अपना सौभाग्य मानो गौरैया; भगवान शंकर के शरण में जाओ। 

पहली और दूसरी परी - हाँ गौरैया ! भगवान शंकर के शरण में जाओ, तुम्हारा अवश्य कल्याण होगा। 

चिड़िया- जैसी आप लोगों की आज्ञा। 

देवपरियों से चर्चा के दौरान चिड़िया की चोंच में दबा चावल जमीन पर गिर गया। अब तक क्रोध गौरैया चिड़िया के पास तक पहुँच चुका था। जब उसे अपने गिरफ्त मे लिया तो क्रोध के ताप से चिड़िया का शरीर झुलसने लगा। ब्याकुल होकर चिड़िया भगवान शंकर का स्मरण कर बोली - हे देवाधिदेव ! मुझे अपने शरण में लीजिये। मेरे प्राण की रक्षा कीजिये। मेरी गलतियों पर मुझे क्षमा कीजिये प्रभु !

इस प्रकार भगवान शंकर के शरणागत होते ही गौरैया चिड़िया की शारीरिक व्याकुलता समाप्त हो गई और क्रोध के साथ जाने लगी। इस किवदंती के अनुसार पूर्व में गौरैया चिड़िया का रंग सफेद था, किंतु क्रोध के ताप के प्रभाव से उसका पंख हल्का भूरा और काला हुआ है। ज्ञातव्य है कि गौरैया चिड़िया को ब्राह्मण पक्षी भी कहा जाता है। ब्राहमणों की धर्मपरायण्ता, न्याय प्रियता एवं पवित्रता का भाव प्रथमतः उनके स्वेत वस्त्रों से सूचित होता है। कुछ ऐसे ही भाव से गौरैया चिड़िया को उनके श्वेत वर्ण और गृहों में वास करने के कारण ब्राह्मण पक्षी तो आज भी कहा जाता है, किंतु उनका वर्ण इस घटना के बाद से बदल गया। 

गौरैया चिड़िया त्राहिमाम् ! त्राहिमाम्! करती हुई भगवान शंकर और माता सती के समक्ष उपस्थित हुई। भगवान शंकर ने सती को प्रश्न भरे नजरों से देखा तो माता सती ने अपनी योग शक्ति से एक नारी प्रतिमा को अवतरित किया और उस प्रतिमा को प्राण-दान देने के लिये भगवान शंकर से निवेदन की। भगवान शंकर ने उस प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा की और पूरे क्षेत्र में अधिष्ठात्री देवी के रूप में पूज्य होने का आशीर्वचन प्रदान किया। 

भगवान शंकर अर्थात्‌ गोंड़ जाति का ईष्ट देव “गौरा” तथा सती अर्थात “गौरी” दोनों की दिव्य शक्ति से उत्पन्न होने के कारण उसे “देवी गौरैया माता” के नाम से प्रसिद्धि मिली। ज्ञातव्य है कि सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ दंडकारण्य का महत्वपूर्ण अंग रहा है। दंडकारण्य गोंडवाना प्रदेश में आता है यहाँ गोंड़ जाति की बहुलता रही है। गोंड़ जाति में आज भी गौरी-गौरा की पूजा एवं विवाहोत्सव बड़े धूमधाम के साथ दीपावली की रात को मनाया जाता है, जिसमें सभी ग्राम एवं नगरवासी शामिल होते हैं। इस देवी के अवतरण का कारण गौरैया चिड़िया रही है। इस कारण चिड़िया के नाम के आधार पर भी “देवी गौरैया माता” के नाम से विख्यात हुई ऐसा माना जा सकता है। माता सती ने भगवान से पुनः निवेदन की- “हे स्वामी ! इस क्षेत्रवासीयों के जीवन निर्वाहक सामाग्री चावल को गौरैया चिड़िया द्वारा उठा लिया गया है। इससे क्षेत्रवासी अतृप्त क्षुधा से ग्रसित हो जायेंगे। उनकी भोजन व्यवस्था का उपाय कीजिये।” 

भगवान शंकर लोककल्याण की भावना देखकर तनिक मुस्काए, फिर गौरैया चिड़िया के चोंच से गिरे हुए चावल को आशीष देते हुए कहा- तुम उसी स्थान से नदी के रूप में प्रवाहित होकर देवी गौरैया का पग-प्रक्षालन करते रहोगे। देवी गौरैया के चरण-स्पर्श होने पर तुम्हारे जल का जहाँ तक विस्तार होगा वह पूरा क्षेत्र चावल उत्पादन के लिए प्रसिद्ध होगा। 

इस प्रकार नदी की उत्पत्ति चावल के गिरे हुए दानों से हुई मानी जाती है। चावल को संस्कृत में “ताँदुल” कहा जाता है। इस कारण नदी का नाम “ताँदुला” पड़ा। 

ज्ञातव्य है कि ताँदुला, शिवनाथ नदी तथा शिवनाथ महानदी की सहायक नदी है। महानदी बेसीन संपूर्ण छत्तीसगढ़ में फैले होने के कारण ताँदुला का जल संपूर्ण छत्तीसगढ़ में सिंचित होता है। इस कारण देश में सर्वाधिक चावल का उत्पादन छत्तीसगढ़ में होता है। संभवतः यही कारण है कि छत्तीसगढ़ को “धान का कटोरा” होने का गौरव प्राप्त हुआ है। 

देवी गौरैया माता का यह पावन प्रांगण ग्राम-चौरेल की पूर्वी सीमा पर स्थित है। प्रांगण के पूर्वी भाग से ताँदुला नदी प्रवाहित होती है, जो वास्तु के विचार से अत्यंत उत्तम है। 

“चौरेल” का अर्थ है- चावल+रेला (प्रचुरता) अर्थात जहाँ प्रचुर मात्रा में चावल होता हो। बुजुर्गों के अनुसार चौरेल के चावल की प्रसिद्धि बालोद, दुर्ग, राजनादगाँव, बेमेतरा, और कबीरधाम जिले तक फैली हुई थी, किंतु वर्तमान वैज्ञानिक उर्वरकों एवं औषधियों के प्रयोग से स्थिति में अब परिर्वतन मिलता है। 

एक दूसरी किवंदती के अनुसार चौरेल का प्राचीन नाम “चौरागढ़” था। यहाँ चौरस नामक सम्राट का साम्राज्य था। उस सम्राट का विवाह “बोड़की” नामक कन्या से हुआ था। बोड़की रामायण की शबरी जिसने भगवान श्रीरामचंद्र जी को जूठे बेर खिलाई थी, की सगी बहन थी। बोड़की की प्रतिमा चौरेल भाँठा (मैदान) में आज भी अनगढ़ शिला-रूप में स्थित है। उस मैदान को “बोड़कई भाँठा” के नाम से जाना जाता है, चूँकि बोड़की भील जाति की आदिवासी महिला थी। आदिवासियों की प्रवृत्ति के अनुरूप बोड़की की प्रवृत्ति भी मदिरापान करने की रही होगी। शायद इसी कारण बोड़कई भाँठा में महुआ वृक्षों की अधिकता रही हो, जो आज भी आंशिक रूप में मिलता है, किंतु उस मैदान को “मउहारी भाँठा” न कहकर “बोड़कई भाँठा” के नाम से जाना जाता है, क्योंकि उसी मैदान पर संभवतः बोड़की का निवास भवन रहा हो। “चौरस” नामक सम्राट के नाम पर इस राजधानी का नाम “चौरागढ़” पड़ा था, जो अब परिवर्तित होकर “चौरेल” के नाम से जाना जाता है। यह चौरेल, गुण्डरदेही-विकासखण्ड, जिला-बालोद में स्थित है। 

इस प्रकार भगवान की अमृत कथा को अपने हृदय में सहेज कर रखने वाले चुनिंदा स्थानों में एक नाम चौरेल भी है, जहाँ माँ गौरैया वास करती हैं। 
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चंद्रकुमार चंद्राकर, अर्जुन्दा





भारतीय गणना

आप भी चौक गये ना? क्योंकि हमने तो नील तक ही पढ़े थे..!