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गुरुवार, 28 जुलाई 2011
बुधवार, 27 जुलाई 2011
सोमवार, 11 जुलाई 2011
पाहुन....
पाहुन ! कब आआगे ?
तकती प्रतिपल पंथ
सुधि के बीज बोती
मिलन की
स्वपनिल पवन
से उसे सहलाती
कीट विरह के
कुतरते दिन-दिन
उसे कब सरसाओगे ।
पाहुन ! कब आआगे ?
वो बहार वो समाँ
मरूस्थल की आँधी हुई ।
यादें सुखद क्षणों की
उजाड़ अमराई हुई
प्यार की छाँह
सिमटते छिन-छिन
उसे कब बरसाओगे ।
पाहुन ! कब आआगे ?
ये बिछुआ ऊँगली पर,
बोझ हुआ जाता है ।
ये बिंदिया माथे पर
दोष लगा जाता है ।
हृदय-घट (दरकता)
चटकता तुम बिन
उसे कब बनाओगे ।
पाहुन ! कब आआगे ?
रमेश यादव
ग्राम-पेण्ड्री, पोष्ट-कलंगपुर
मैं कौन हूँ ?
मैं कौन हूँ
मुझे इक पहचान दीजिए ।
जी सकूँ हँस के,
ऐसा अरमान दीजिए ॥
चला जा रहा हूँ
बस मंजिल-ए-बिना ।
साहिल बन कोई,
इक फरमान कीजिए ॥
फ़कत बाजार है,
ये दुनिया झूठ-मूठ की ।
खत्म कर सकूँ ये तिलस्म,
तीर कमान दीजिए ॥
फँस के रह गया हूँ मैं,
दरिया में इस कदर ।
जिंदगी के भँवर से,
अब निकाल दीजिए ॥
सिहर चला हूँ मैं,
इन ग़मों की मार से ।
एक क़तरा सुकुन का,
श्रीमान दीजिए ॥
करीब आ के भी,
रूठ जाती है प्यारी खुशियाँ ।
रहे सदा साथ,
ऐसा मेहमान दीजिए ॥
रमेश यादव
ग्राम-पेण्ड्री, पोष्ट-कलंगपुर
मैं आदमी हूँ....
मैं आदमी हूँ,
इसलिए गुनाह करता हूँ ।
वफ़ा करता हूँ,
और बेवजह मरता हूँ ।।
हादसों का मारा,
बेदर्द बेचारा हूँ ।
किसी मरीज का दर्द,
पूछने से डरता हूँ ॥
दुनिया मुझे लाख,
भला बुरा कहती रहे ।
दुश्मनों तक को,
मैं अपना ही कहता हूँ ॥
मयकदे में है यहाँ,
बेहद पीने पिलाने वाले ।
गम को भी पीकर,
खुशी में भी खूब रंगता हूँ ॥
छींटा कसते हैं लोग,
यहाँ मेरे चाहने वाले ।
मोम का होकर,
पत्थरों को सुन्दर गढ़ता हूँ ॥
आदत नही कि माँगू,
हरदम फैला झोली ।
कैसी है खुदा की फितरत,
इसे गुनता हूँ ॥
थोड़ी सी मुस्कान पर,
हुआ बाग-बाग आज ।
गमजदा को खुश देखकर,
बादलों सा झरता हूँ ॥
या रब उन्हे मेरी,
सारी खुशियाँ दे दे ।
एक अज़ीज तेरे
बार-बार पाँव पड़ता हूँ ॥
इसलिए गुनाह करता हूँ ।
वफ़ा करता हूँ,
और बेवजह मरता हूँ ।।
हादसों का मारा,
बेदर्द बेचारा हूँ ।
किसी मरीज का दर्द,
पूछने से डरता हूँ ॥
दुनिया मुझे लाख,
भला बुरा कहती रहे ।
दुश्मनों तक को,
मैं अपना ही कहता हूँ ॥
मयकदे में है यहाँ,
बेहद पीने पिलाने वाले ।
गम को भी पीकर,
खुशी में भी खूब रंगता हूँ ॥
छींटा कसते हैं लोग,
यहाँ मेरे चाहने वाले ।
मोम का होकर,
पत्थरों को सुन्दर गढ़ता हूँ ॥
आदत नही कि माँगू,
हरदम फैला झोली ।
कैसी है खुदा की फितरत,
इसे गुनता हूँ ॥
थोड़ी सी मुस्कान पर,
हुआ बाग-बाग आज ।
गमजदा को खुश देखकर,
बादलों सा झरता हूँ ॥
या रब उन्हे मेरी,
सारी खुशियाँ दे दे ।
एक अज़ीज तेरे
बार-बार पाँव पड़ता हूँ ॥
रमेश यादव
ग्राम-पेण्ड्री, पोष्ट-कलंगपुर
आदमी
आँगन में अपने,
काँटे बो रहा है आदमी ।
लाश मानवता की,
काँधे ढो रहा है आदमी ॥
आँट दूसरे की बैठकर,
शेखी बघारता ।
अपनी बात पे,
धार-धार रो रहा है आदमी ॥
साख अपनी बिठाने को,
घूमता गली-गली ।
घर अन्दर पे तार-तार,
हो रहा है आदमी ॥
बैठ धरती पे,
मंगल ग्रह की सैर कर रहा ।
अपने दिल पे,
नहीं झाँक पा रहा है आदमी ॥
भारत और पाक के,
सभी अवरोध टल रहे ।
अपने मुल्क में नापाक,
हो रहा है आदमी ॥
कब्जों की अवैध बाढ़,
गाँव-गाँव चल पड़ी ।
बहती गंगा में मुँह-हाथ,
धो रहा है आदमी ॥
ऐतबार सहसा मत करो,
पड़ोस वालों पर ।
पलटते ही झट कटार,
घोंप रहा है आदमी ॥
रमेश यादव
ग्राम-पेण्ड्री, पोष्ट-कलंगपुर
भोर-बाला
नीले कैनवास पर अम्बर के
तुलिका से सूरज की
प्रकृति ने पोत दिया
सुनहला रंग ।
चार-चाँद लगाए पंछियों ने
निकल चले नीड़ों से-
तलाश में जुटाने साधन
क्षुधा-तृप्ति के ।
लिया चुंबन सांझ ने
निशि का मुंदे प्रहर की पलकें
निस्पंद सी
पड़ा दौर मदहोशी का ।
रात के प्रहर में चौथे
सितारे शिथिल नृत्य से
गायब था
वह प्यारा चाँद ।
भर गई सम्मोहन प्रकृति में,
खुल गए जूड़े,
मन्द समीर के,
खिलखिला पड़ी भोर-बाला ।
रमेश यादव
ग्राम-पेण्ड्री, पोष्ट-कलंगपुर
मंगलवार, 14 जून 2011
अच्छा हुआ बापू
अच्छा हुआ बापू
आपका पुनर्जन्म नहीं हुआ
वरना आपकी आत्मा रोती
आपके अनुयायी रहते टीप-टाप
आपको नहीं मिलती लंगोटी
आपके बताये राह पर
जब कोई नहीं चलता
तो आपको भी
हमारी तरह खलता
जीवन भर
आपके नाम पर माल उड़ाते
आपको दो अक्टूबर को
मुश्किल से दो मिनट दे पाते
तो क्या दो मिनट भी
आपका चैन से कटता
क्या आपका कलेजा भी
हमारी तरह नहीं फटता
आपके तस्वीर के नीचे
लोग बेखौफ रिश्वत लेते
और शिष्टाचार की संज्ञा देते
आपके आँखों के सामने
गौ-हत्या,भ्रूण हत्या, दहेज
जैसे दानव सिर उठाते
तो भी क्या आप
इसी तरह मुस्कुराते
बापू ! इन्सान-इन्सान के
खून का प्यासा क्यों हैं ?
महापुरूषों का देश होकर भी
यह इतनी हताशा क्यों हैं ?
आप जब भी जनम लेना
मेरे सवालों के जवाब जरूर देना ।
पुष्कर सिंह 'राज’
वरना आपकी आत्मा रोती
आपके अनुयायी रहते टीप-टाप
आपको नहीं मिलती लंगोटी
आपके बताये राह पर
जब कोई नहीं चलता
तो आपको भी
हमारी तरह खलता
जीवन भर
आपके नाम पर माल उड़ाते
आपको दो अक्टूबर को
मुश्किल से दो मिनट दे पाते
तो क्या दो मिनट भी
आपका चैन से कटता
क्या आपका कलेजा भी
हमारी तरह नहीं फटता
आपके तस्वीर के नीचे
लोग बेखौफ रिश्वत लेते
और शिष्टाचार की संज्ञा देते
आपके आँखों के सामने
गौ-हत्या,भ्रूण हत्या, दहेज
जैसे दानव सिर उठाते
तो भी क्या आप
इसी तरह मुस्कुराते
बापू ! इन्सान-इन्सान के
खून का प्यासा क्यों हैं ?
महापुरूषों का देश होकर भी
यह इतनी हताशा क्यों हैं ?
आप जब भी जनम लेना
मेरे सवालों के जवाब जरूर देना ।
पुष्कर सिंह 'राज’
सोमवार, 13 जून 2011
सत्याग्रह का दमन
सत्याग्रह के दमनकारियों,
सच क्या दबनेवाला है ।
उसको तुम क्या मार सकोगे,
ईश्वर जिसका रखवाला है ॥
वृद्ध अबला पर हाथ उठाना,
ये कैसी लाचारी है ।
काला धन में नाम आयेगा,
इसीलिए झक मारी है ॥
भ्रष्टाचार के विरोध से,
इनको क्यों डर लगता है ?
शेर का खाल ओढ़कर,
गीदड़ हमको ठगता है ॥
अपनी कमजोरी छुपाने खातिर,
सच को दबाये जाते हो ।
घोटालों के सिरमौर बने हो,
देश भक्त कहलाते हो ॥
हमने तुमको सिर पर बैठाया,
देश की सत्ता सौंप दिया ।
उसके बदले देश को तुमने,
घोटालों में झोंक दिया ॥
इस गफलत में कभी न रहना,
कि सत्ता तुम्हारी बफौती है ।
अन्ना बाबा को देख लो बेटा,
तुम्हारे लिए पनौती है ॥
कहता हूँ कब तक आखिर,
सच को दबाया जायेगा ।
देश भक्तों के सर पर कब तक,
भ्रष्ट बिठाया जायेगा ॥
खत्म करो लचीला कानून,
एक नया इतिहास लिखो ।
घोटालों राजों की खातिर,
आजीवन कारावास लिखो ॥
दण्डित करके सर भ्रष्टों को,
काला-धन हम लायेंगे ।
रच देंगे इतिहास सृजन का,
देश को स्वर्ग बनायेंगे ॥
पुष्कर सिंह 'राज’
उसको तुम क्या मार सकोगे,
ईश्वर जिसका रखवाला है ॥
वृद्ध अबला पर हाथ उठाना,
ये कैसी लाचारी है ।
काला धन में नाम आयेगा,
इसीलिए झक मारी है ॥
भ्रष्टाचार के विरोध से,
इनको क्यों डर लगता है ?
शेर का खाल ओढ़कर,
गीदड़ हमको ठगता है ॥
अपनी कमजोरी छुपाने खातिर,
सच को दबाये जाते हो ।
घोटालों के सिरमौर बने हो,
देश भक्त कहलाते हो ॥
हमने तुमको सिर पर बैठाया,
देश की सत्ता सौंप दिया ।
उसके बदले देश को तुमने,
घोटालों में झोंक दिया ॥
इस गफलत में कभी न रहना,
कि सत्ता तुम्हारी बफौती है ।
अन्ना बाबा को देख लो बेटा,
तुम्हारे लिए पनौती है ॥
कहता हूँ कब तक आखिर,
सच को दबाया जायेगा ।
देश भक्तों के सर पर कब तक,
भ्रष्ट बिठाया जायेगा ॥
खत्म करो लचीला कानून,
एक नया इतिहास लिखो ।
घोटालों राजों की खातिर,
आजीवन कारावास लिखो ॥
दण्डित करके सर भ्रष्टों को,
काला-धन हम लायेंगे ।
रच देंगे इतिहास सृजन का,
देश को स्वर्ग बनायेंगे ॥
पुष्कर सिंह 'राज’
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