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रविवार, 17 जुलाई 2016

मूर्ख हिन्दुओं की मानसिकता

अगर मूर्ख हिन्दुओं के मानसिकता के बारे में जानना हो तो... सोशियल मीडिया फेसबुक आदि में ये एक पोस्ट है जो खुद हिन्दू ही पोस्ट व शेयर कर रहे हैं... ये है वो पोस्ट की मुख्य बातें-

"जब मैं दूरदर्शन पर न्यूज़ देखता हूँ तो मुझे ये लगता है कि...मेरे देश में शांति और सदभाव है। देश धीरे-धीरे विकास भी कर रहा है, सभी कुछ सामान्य सा ही है… फिर जब में प्राइवेट न्यूज़ चैनल देखता हूँ तो मुझे पता लगता है कि पूरे देश में सांप्रदायिक दंगे चल रहे हैं, हिन्दू मुस्लिम एक-दूसरे को मार-काट रहे हैं, दलितों पर भारी अत्याचार हो रहा है, करीब-करीब सारे दलितों की हत्या हो चुकी है और सवर्ण-वर्ग दलितों के घरों को लूट रहे हैं, हिन्दुस्तान में गृह-युद्ध शुरू हो रहा है। इससे घबराकर जब मैं बचने के लिये घर से बाहर निकलता हूँ तो पाता हूँ कि बाज़ार में तो सब कुछ सामान्य सी हलचल है।

कहीं मुस्लिम वर्ग RSS के पथ संचलन पर पुष्प वर्षा कर रहा है तो कहीं गणपति के पंडाल में नमाज़ पढ़ी जा रही है… कहीं मंदिर के अंदर मुस्लिम महिला की डिलीवरी हिन्दू महिलायें करवा रही है।

पता लगा कि सारी साम्प्रदायिकता और अशांति न्यूज़ चैनल के स्टूडियो में और न्यूज़ एंकर के दिमाग में ही थी, जो कि ब्रीफ़केस में भरे हुये कागज़ की शक्ल में स्टूडियो में पहुँचाई जा रही थी।"


इसके बाद कहते हैं कि ये लड़ाई-झगडे सब मीडिया के द्वारा फैलाये गये वहम है... ऐसे हिन्दुओं को देखता हूँ तो खून खौलता है… तो क्या कश्मीरी पंडित मुसलमानों के पुष्पवर्षा से भाग गये..? जितने दंगे मुहर्रम में या आज तक हज़ारों दंगे हुये हैं वो सब दंगे नहीं बल्कि मुसलमानों की तरफ से हिन्दुओं पर किये गये पुष्पवर्षा थे..? अगर मानलें कि मीडिया ने करवाया है तो बाबर ने राममंदिर तोड़कर बाबरी मस्जिद मीडिया के उकसावे में किया है..? औरंगजेब, बाबर, खिलजी, अकबर, टीपू आदि सब AAJTAK, NDTV और ABP देखने के बाद बहक गये और लाखों करोड़ों हिन्दुओं को काट दिया..? जजिया कर लगा दिया..? उस दिन जो ओवैसी ने कहा था..? वो मीडिया की उपज थी..? हज़ारों मंदिर तोड़े गये पर ये लिख रहे हैं कि मुस्लिम तो पूजा कर रहे हैं गणेश भगवान की..? इनके हिसाब से कहीं कुछ नहीं हुआ..? कल भी जितने दंगे हुये तो इनके हिसाब से वो सामान्य हलचल है..? आजकल कश्मीर में जो कुछ हो रहा है वो सब तो बस टीवी स्टूडियो में हो रहे हैं..? इनको सारे दंगे टीवी में ही चलते दिखते हैं... बाहर नहीं..? क्यूँ ..? क्योंकि दंगों की आँच इनके घरों के आसपास अभी तक नहीं पहुँचा है तो.. इनको लगता है कि सबकुछ ठीक है.. सब कुछ सामान्य है… जैसे सावन के अंधे को चारों तरफ हरा ही हरा दिखाई देता है..?

जब तक ऐसे दिमाग से पैदल टाइप हिन्दू रहेंगे... तब तक भगवान भला करे.. हिन्दुओं का.... खुद तो मूर्ख है ही.... दूसरों को भी असावधान करते हैं.. बेवकूफ बनाते हैं...?

रविवार, 10 जुलाई 2016

छत्तीसगढ़ में भी ‘छत्तीसगढ़ी’ बनाम ‘बाहरी’ की आग, आखिर क्यों?

एक तरफ जहाँ राष्ट्रवादी विचारधारा अपनी जड़ें मजबूत करने के लिए ‘ऱाष्ट्र प्रथम’ जैसे जुमले गढ़ रही है तो दूसरी ओर स्थानीय अस्मिता की कुलबुलाहट देश के अलग-अलग हिस्सो में आंदोलन और विरोध की शक्ल में देश को झकझोरने में लगी हुई है। अब छत्तीसगढ़ में भी ‘बाहरी हटाओ’ के नारे बुलंद हो रहे हैं। अजीत जोगी की नई पार्टी बनाने के ऐलान के बाद बाहरीवाद पर हो हल्ला और तेज़ हो गया। आउटसोर्सिंग और भाषा, संस्कृति की उपेक्षा पर आंदोलन करने वाले संगठन अब खुलकर कथित बाहरियों के खिलाफ़ पोस्टरबाजी करने लगे हैं, अजीत जोगी द्वारा क्षेत्रीय अस्मिता पर राजनीतिक दाँव खेलने का विस्तार तो देखा ही जा सकता है लेकिन कुछ समय से छत्तीसगढ़ी अस्मिता के लिए आंदोलनरत ‘छत्तीसगढ़ क्रान्ति सेना’ ज़मीन से लेकर साईबर तक एक उग्र वैचारिक पृष्ठभूमि तैयार करने में जुटी हुई है, ऐसे में सवाल उठता है कि इन गतिविधियों और चेष्टाओं के पीछे राजनीतिक स्वार्थ की मंशा है या अंसतोष की पीड़ा या दोनों भावों के एकसार होने से पैदा हुई परिस्थितियाँ। 


आजादी के पूर्व भी भारत में सांस्कृतिक, भौगोलिक और राजनीतिक बिखराव रहा है जिसने आज़ाद भारत में एक राष्ट्र का स्वरूप ज़रूर लिया लेकिन जल्द ही अपने पृथक अस्तित्व के लिए संघर्ष भी करने लगा नतीज़तन भाषाई आधार पर राज्य गठन का दौर शुरू हो गया। यह स्थिति भी कोई ज्यादा चिंताजनक नहीं थी लेकिन चिंताजनक तब हुई जब अलग-अलग भाषा-भाषियों के मध्य किसी कारण से कटुता पैदा हुई फिर जिसकी परिणति साठ के दशक में कन्नड़भाषियों द्वारा मलयालम और तमिलों के ख़िलाफ़ आवाज़ बनकर उभरी जिसमें वे बाहरी लोगों के बजाय कन्नड़ लोगों को नौकरी देने की माँग कर रहे थे फिर ये आग 1965 के आसपास तमिलनाडु में लगी और तमिलनाडु से उत्तरभारतीयों को खदेड़ा जाने लगा, हमारे सामने असम, मेघालय, त्रिपुरा, पंजाब के कई उदाहरण हैं जहाँ इस विरोध ने हिंसक रूप भी ग्रहण किया और भारतीय नागरीक के बरक्स क्षेत्रवाद ने बहुतों को बाहरी बना दिया। महाराष्ट्र में मराठी अस्मिता के नाम पर आए दिन दूसरे प्रदेश से आए लोगों के साथ विवाद की परिस्थितियाँ निर्मित होती रहती है। इस वैमनस्यता के असर से पूरा देश क्षेत्रवाद के भावों से खण्ड-खण्ड होकर अस्मिता बोध के बजाय टकराव और बिखराव की ज़मीन तैयार करने लगता है। यह आरोप किसी एक प्रदेश के ऊपर नहीं है बल्कि हर प्रदेश अपनी-अपनी सीमाओं के भीतर ऐसे क्रियाकलापों को अंजाम देने में नहीं हिचकते ।

लेकिन छत्तीसगढ़ के संदर्भ में यह बातें काफी हद तक चौकाने वाली है क्योंकि छत्तीसगढ़ राज्य के स्वप्नदृष्टा कहे जाने वाले खूबचंद बघेल ने भी ऐसे विवादों को अपने आंदोलन में पनपने नहीं दिया था और सबको साथ लेकर चलने की पैरोकारी करते रहे। यहाँ रहने वाले शांतचित्त निवासियों की वज़ह से छत्तीसगढ़ की मिट्टी बाहर से आए लोगों के लिए उर्वर बनी रही इसलिए औद्योगिक, राजनीतिक और व्यावसायीक घरानों में बाहर के राज्यों से आए लोगों का कब्जा रहा है। ‘छत्तीसगढ़ क्रांति सेना’ के प्रमुख अमित बघेल कहते हैं कि ‘जो छत्तीसगढ़ की लोक कला और संस्कृति का सम्मान करता है, वह छत्तीसगढ़िया है। हम शिवसेना की तरह नहीं सोचते। हमारी सोच में स्वाभिमान है अभिमान नही्ं। हमारे बाबा डॉ. खूबचंद बघेल ने छत्तीसगढ़ भातृ संगठन का गठन किया। इस मंच से पृथक छत्तीसगढ़ राज्य की परिकल्पना की। हमें पृथक राज्य तो मिला लेकिन न्याय नहीं मिला। बाहरी लोगों ने हमेें नीचा दिखाने का प्रयास किया है। बाहरी लोगों ने छत्तीसगढ़ की संपदा पर कब्जा कर लिया है। हमारी रत्नगर्भा धरती बाँझ होती जा रही है।’

इस बात से यह अंदाज़ा लगाना आसान हो जाता है कि स्थानीय लोगों की उपेक्षा होने से ऐसा मौसम तैयार हो रहा है।

अभी हाल ही में शिक्षा विभाग के द्वारा छत्तीसगढ़ के स्कूलों में ओड़िया पढ़ाने का आदेश जारी हुआ और वहीं से क्रांति सेना का उभार भी शुरू हो गया। तब क्रांति सेना ने अपने पोस्टरों और सोशल मीडिया के ज़रिए कहा कि- ‘हमें इस देश की किसी भी भाषा और संस्कृति से वैचारिक तौर पर कोई विरोध नहीं है, लेकिन जब तक यहाँ की मातृभाषा में संपूर्ण शिक्षा की व्यवस्था नहीं हो जाती, तब तक किसी भी अन्य प्रदेश की भाषा को किसी भी रूप में स्वीकार नहीं किया जायेगा।’

इसके बाद आउटसोर्सिंग के मुद्दे पर भी इनका आंदोलन चलता रहा और जब रायपुर स्थित तेलीबाँधा तालाब का नाम बदलकर विवेकानंद सरोवर रखने का प्रस्ताव आया तब पहली दफा स्थानीय संस्कृति के संरक्षण के लिए बड़ी संख्या में लोग एकजुट होकर इस प्रस्ताव के खिलाफ़ सड़क पर उतर आए।

छत्तीसगढ़ी बनाम बाहरी विवाद पर सामाजिक कार्यकर्ता नंद कश्यप कहते हैं कि ‘इस विवाद में दो धाराएँ हैं, एक विभाजनकारी नस्लीय तरह की जो अचानक आए मूल निवासी फैशन से उपजी है, दूसरी धारा समता वाली है जो कि यह मानता है कि छत्तीसगढ़ में मौजूद प्राकृतिक संसाधनों का सिर्फ दोहन हो रहा है परंतु छत्तीसगढ़ के नौजवान किसान, मज़दूरों को इसका तनिक भी हिस्सा नहीं मिल रहा है। छत्तीसगढ़ की गरीबी इसका ज्वलंत उदाहरण है। इसलिए छत्तीसगढ़ी बनाम बाहरी भावना उभार पर है।’

इन बातों का अगर बारिकी से अध्ययन किया जाए तो लगता है कि ये ‘छत्तीसगढ़ी बनाम बाहरी’ विवाद ना होकर शोषण के विरूद्ध पैदा हुई भावना है जिसका राजनीतिक विस्तार किया जा रहा । साहित्यकार संजीव तिवारी के अनुसार ‘गैर छत्तीसगढ़िया धुन के सहारे स्थानीय नेताओं के विकास की संभावना देखते हुए ऐसे विवाद को बढ़ाते हैं जिसका उद्देश्य शीर्ष नेतृत्व में स्थापित गैर छत्तीसगढ़ियों को हटाना है।’

शायद इसीलिए अमित जोगी आउटसोर्सिंग के मुद्दे पर कहते हैं ‘कि प्रदेश सरकार को छत्तीसगढ़ के शिक्षित बेरोजगार युवाओं के हितों की रक्षा के लिए छत्तीसगढ़ में नौकरी के लिए छत्तीसगढ़ में बोले जाने वाली छत्तीसगढ़ क्षेत्र की भाषाओं के ज्ञान की अनिवार्यता का नियम बनाना चाहिए और यह बोलकर बहुत पहले ही अमित जोगी ने अपनी क्षेत्रीय राजनीति की ज़मीन तैयार करने की शुरूआत कर दी थी। इसका मतलब उपेक्षित भाषा, संस्कृति और लोगों को राजनीतिक विकल्प देने की घोषणा के पीछे ना केवल राजनीति है बल्कि विभिन्न कारणों से पैदा हुई परिस्थितियाँ हैं जिसमें स्थानीयता को अनदेखा करने के कारण उत्पन्न आक्रोश भी है जो कि स्थानीय राजनीति के उभार के लिए ईंधन की तरह है।

इसी आक्रोश की बानगी उन पोस्टरों में भी देखी जा सकती है जिसमें गैर छत्तीसगढ़ी नेताओं और मंत्रियों की तस्वीरें हैं जिसमें मुख्यमंत्री रमन सिंह की तस्वीर भी प्रमुखता से लगाई गई है।

लेकिन अब डर इस बात का है कि ये विरोध राजनीति के रास्ते ‘छत्तीसगढ़ी’ और ‘गैर छत्तीसगढ़ी’ लोगों के बीच पारस्परिक कटुता का कारण ना बन जाए। इस पर चिंता ज़ाहिर करते हुए साहित्यकार संजीव तिवारी कहते हैं कि जो मन-क्रम वचन से छत्तीसगढ़ी से प्रेम करता है वह छत्तीसगढ़िया है पत्रकार शेखर झा इसके जींवत उदाहरण हैं। बिहार के मिथिलाभाषी शेखर ने कुछ ही सालों में छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ी को पूरी तरह से आत्मसात किया यह एक उदाहरण है ऐसे कई होंगे और आज ऐसे कईयों के लिए छत्तीसगढ़ की परिस्थितियाँ प्रतिकूल हो जाए इससे पहले सरकार को छत्तीसगढ़ की संस्कृति, भाषा और लोगों के विश्‍वास पर खरा उतरना पड़ेगा अन्यथा अंसतोष की आग का राष्ट्रीय संस्कृति के लिए घातक साबित होने की संभावना बढ़ जाएगी।

छत्तीसगढ़ी को राजकाज की भाषा बनाने के लिए आंदोलन कर रहे नंदकिशोर शुक्ल कहते हैं कि ‘छत्तीसगढ़ अस्मिता की पहचान मेरी मातृभाषा छत्तीसगढ़ी सहित यहाँ की सभी मातृभाषाएँ हैं लेकिन इन मातृभाषाओं में पढ़ाई लिखाई आज तक नहीं होने दी जा रही है जिसके लिए जवाबदार गैर छत्तीसगढ़िया सरकार है जिस भाषा में पढ़ाई लिखाई नहीं होती वह भाषा मर जाती है जो मुझे मंज़ूर नहीं।’

इन तमाम बातों के मूल में एक चीज़ नज़र आती है कि स्वतंत्र भारत में सभी संस्कृतियों को फलने फूलने का संविधानिक अधिकार होने के बावजूद कथित पॉप्यूलर कल्चर को थोपकर स्थानीय संस्कृतियों, भाषाओं और लोगों की उपेक्षा की जाती रहेगी तब कभी ना कभी वह गुस्सा किसी भी रूप में बाहर आकर राष्ट्र को झकझोरता रहेगा। स्थानीयता की उपेक्षा कर राष्ट्रवाद की दुहाई देना बिल्कुल बेमानी और ख़तरनाक है।
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AKSHAY DUBEY SAATHI
http://akshaydubeysaathi.jagranjunction.com

मंगलवार, 14 जून 2016

डॉ.खूबचंद बघेल

भारत की आजादी के आंदोलन में सक्रिय योगदान देकर एवं तत्कालीन भारत में चल रहे राजनैतिक-सामाजिक परिवर्तन तथा आर्थिक मुक्ति आंदोलन में हिस्सा लेकर जिन्होंने इतिहास रचा है, उनमें एक सशक्त हस्ताक्षर डॉ. खूबचंद बघेल जी का भी है। छत्तीसगढ़-राज्य जो अस्तित्व में नवम्बर 2000 से आया है, उसके प्रथम स्वप्न दृष्टा, डॉ. खूबचंद बघेल जी ही थे। आज भले ही उन्हें इसकी मान्यता देने में उच्चवर्ण एवं वर्ग के लोगों को हिचकिचाहट होती है, लेकिन यही ऐतिहासिक सत्य/तथ्य है। ब्राम्हणवादी जाति व्यवस्था को विछिन्न कर समस्त मानव जाति को एक जाति के रूप में देखने की चाहत रखने वाले डॉ. बघेल के व्यक्तित्व में छत्तीसगढ़ की खुशबू रची-बसी थी। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के लिये त्याग और बलिदान करने वालों में डॉ. साहब का नाम अग्रिम पंक्ति पर है।

छत्तीसगढ़ के संस्कृति कला एवं रीति रिवाजों की महक, उनमें रची बसी थी, जो उनके द्वारा लिखित “जनरैल सिंग” नामक नाटक के इस कविता में झलकती है-

नादानी से फूल उठा मैं, ओछो की शाबासी में,
फसल उन्हारी बोई मैंने, असमय हाय मटासी में।
अंतिम बासी को सांधा, निज यौवन पूरन मासी में,
बुद्ध-कबीर मिले मुझको, बस छत्तीसगढ़ के बासी में।
बासी के गुण कहुँ कहाँ तक...
विद्वतजन को हरि दर्शन मिले, जो राजाज्ञा की फाँसी में,
राजनीति भर देती है यह, बुढ़े में सन्यासी में,
विदुषी भी प्रख्यात यहाँ थी, जो लक्ष्मी थी झाँसी में,
स्वर्गीय नेता की लंबी मुंछे भी बढ़ी हुई थी बासी में ।।
गजब विटामिन भरे हुए हे ....
डॉ. खूबचंद बघेल का जन्म छत्तीसगढ़ (तत्कालीन सी. पी. एवं बरार) के रायपुर, जिले के ग्राम पथरी में 19 जुलाई सन 1900 ईस्वी में हुआ था। ग्राम पथरी रायपुर-बिलासपुर (मुम्बई- हावड़ा रेल लाईन व्हाया नागपुर) रेल मार्ग पर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 15 किलोमीटर दूर मांढर (द.पु.रे.) सीमेंट फैक्टरी से 10 कि.मी. पूर्व में स्थित है। पिता का नाम जुड़ावन प्रसाद एवं माता का नाम केतकी बाई था। जुड़ावन प्रसाद पथरी के मालगुजार परिवार से थे। ब्राम्हणवादी जाति व्यवस्था के तहत कूर्मि जाति के होने के नाते खेती किसानी ही उनका पुश्तैनी पेशा था । पिता की मुत्यु डॉ. साहब के बाल्यकाल में ही हो गई थी। प्राथमिक शिक्षा डॉ. साहब ने अपने चाचा नकुल एवं सादेव प्रसाद बघेल के कुशल निर्देशन में गाँव के प्राथमिक शाला में पायी । प्राथमिक शिक्षा समाप्त करने के बाद गवर्नमेंट हाई स्कूल, रायपुर में भर्ती हो गये। वे एक मेघावी छात्र में, उन्हें छात्रवृत्ति मिलती थी। छात्र जीवन से ही देश सेवा के कार्य में जुड़े रहे। देशभक्ति एवं राष्ट्रीयता की भावनाने हृदय में जगह बना लिया था। 

डॉ. साहब का विवाह लगभग दस वर्ष की उम्र में अपने से तीन वर्ष छोटी राजकुँवर से, प्राथमिक शिक्षा प्राप्ति के दौरान ही हो गयी थी। उनकी पत्नी राजकुँवर से उनकी तीन पुत्रियों क्रमशः पार्वती, राधा एवं सरस्वती का जन्म हुआ। राजकुँवर बाई निरक्षर थी। कलान्तर में डॉ. भारत भूषण बघेल को पुत्र के अभाव में डॉ. साहब ने गोद लिया। 

सन् 1920 में जब नागपुर के राबर्ट्‌सन मेडिकल कालेज में डॉ. साहब शिक्षा ग्रहण कर रहे थे, तब नागपुर में विजय राघवाचार्य की अध्यक्षता में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के अधिवेशन में मेडिकल कोर के सदस्य के रूप में सम्मिलित हुये थे। सन् 1921-22 के ‘असहयोग आंदोलन’ से प्रभावित होकर डॉक्टरी की पढ़ाई छोड़ आंदोलन का प्रचार-प्रसार, रायपुर जिले के, गाँव में घूम-घूमकर करने लगे। विशेषकर डॉक्टर साहब ने छात्रों को संगठित कर, उसमें राष्ट्रीय चेतना के बीज बोने का बीड़ा उठाया। डॉक्टरी की पढाई अधुरी छोड़ नागपुर से लौट आने एवं स्वतंत्रता के राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रियता को देख, माता एवं परिवारजनों को बड़ी निराशा हुई थी, लेकिन सबके समझाने के बाद, पुनः नागपुर एल.एम.पी. की डिग्री हासिल करने पहुँचे, तभी झंडा सत्याग्रह प्रारंभ हो गया। छत्तीसगढ़ से सैकड़ों की संख्या में स्वयंसेवकों ने ‘झंडा सत्याग्रह‘ में डॉ. साहब के नेतृत्व में भाग लिया। 

सन्‌ 1923 में एल.एम.पी. (लजिसलेटिव मेडीकल प्रेक्टिशनर) की परीक्षा पास कर ली, कालांतर में एल.एम.पी. को एम.बी.बी.एस. में परिवर्तित किया गया। एल.एम.पी. की परीक्षा पास कर स्वास्थ्य विभाग में नौकरी कर ली। डॉ. साहब की प्रथम पोस्टिंग रायगढ़ शासकीय अस्पताल में हुई। 1931 में ‘जंगल सत्याग्रह’ प्रारंभ हो गया, इसमें शामिल होने डॉ. साहब ने शासकीय सेवा से त्यागपत्र दे दिया और संपूर्ण भारत में चल रहे स्वतंत्रता प्राप्ति के आंदोलन के प्रति पूर्णतया समर्पित हो गये। दलितों एवं शोषितों के सामाजिक अपमान, छूआछुत, भेदभाव के विरूद्ध संगठन की शुरूआत की एवं 1932 में तत्कालीन “मध्यभारत एवं बरार प्रांत” (सी.पी. एंड बरार प्रोविन्स) के ‘हरिजन सेवक संघ’ ईकाई के मंत्री नियुक्त किये गये। मिनीमाता एवं छत्तीसगढ़ के अन्य दलित नेताओं के साथ मिलकर शैक्षणिक, सामाजिक, राजनैतिक स्तर में सुधार के लिये काम किये। 
सन् 1932 के ‘विदेशी वस्त्र बहिष्कार आंदोलन’ में पुनः जेल गये । उनके साथ उनके 18 सहयोगियों में एक उनकी माता श्रीमती केतकी बाई भी थी। सन् 1932 के बाद “रायपुर जिला काँग्रेस कमेटी” के साथ, डिस्ट्रिक्ट कौंसिल रायपुर में फिजिकल इंस्ट्रक्टर के पद पर कार्य किया।


सामाजिक कार्य 

ऊँच-नीच, छूआछूत के चलते छत्तीसगढ़ के गाँवों में नाई, सतनामी समाज के भाईयों का बाल नहीं काटते थे। उनके मुहल्ले की सफाई भी नहीं होती थी। ग्राम-चन्दखुरी, मंदिरहसौद, ब्लाक – आरंग, जिला-रायपुर के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, जो आगे चलकर विधायक भी चुने गये, जिन्हें दुकान का धंधा करने के कारण लोग सेठ कहकर पुकारते थे - ‘स्व. अनंत राम बर्छिहा‘ ने सतनामी समाज के लोगों का बाल काटने, दाढ़ी बनाने (साँवर बनाने) एवं उनके मुहल्ले की सफाई करने का काम किया। इससे उनका अपना कूर्मि समाज नाराज हो गया, उन्हें कूर्मि जाति से बहिष्कृत कर दिया । डॉ. साहब ने इस कार्य के महत्व बताने एवं नाराज समाज को अपने गलती का एहसास करवाने के लिये “ऊँच-नीच” नामक नाटक लिखकर उसका सफल मंचन करवाया । इस नाटक का असर यह हुआ, बर्छिहा जी का सामाजिक बहिष्कार रद्द हुआ एवं उनके कार्य की सर्वत्र प्रशंसा हुई।

भारतीय मानव समाज के वर्ण से वर्ग, वर्ग से जाति, जाति से उपजाति एवं उपजाति से गोत्र के टूटन को उन्होंने अंतरआत्मा तक महसूस किया और इस सड़ी-गली जाति प्रथा को तोड़ने का संकल्प ले, सर्वप्रथम उपजाति बंधन को तोड़ा। 1936 में उपजाति बंधन तोड़कर स्वयं मनवा कूर्मि उपजाति के होने के बावजूद, दिल्लीवार कूर्मि समाज के रामचन्द्र देशमुख (संस्थापक - चंदैनी गोंदा) ग्राम-बघेरा, जिला-दुर्ग वाले के साथ अपनी द्वितीय पुत्री राधाबाई का विवाह सम्पन्न किया। उपजाति बंधन तोड़ने पर उनके स्वयं के मनवा कूर्मि समाज ने उन्हें मनवा कूर्मि उपजाति से बहिष्कृत किया, उन्हें सजा मिली। अपने मनवा कूर्मि उपजाति से बहिष्कृत होने पर उन्होंने कहा, ‘आप भले ही मुझे छोड़ दे, लेकिन मैं आप लोगों को नहीं छोड़ सकता’, इस अवसर पर अपनी बात उन्होंने कवि अतीश की एक कविता के माध्यम से कही जो निम्नलिखित है -
ये हो बिटप (वट -वृक्ष), हम पुहुप (फुल) तिहारो है । राखिहौ तो रहेंगे, शोभा रावरी (तुम्हारी) ही बढ़ायेंगे ।। बिलग किये ते, बिलग ना माने कछु, चढ़ेगे, सुर सिर न चढ़ेगें जाय सुकव अतीश हाट बाटन बिकायेंगे । देश हुँ रहेंगे, परदेश हॅुं रहेंगे जाय, जऊ देश हुँ रहे, पर रउरे (आपके ही) कहायेंगे ।
डॉ. बघेल ने अपने लेख में उपजातीय शादियों के संबंध में लिखा है, कि “जो अन्तर उपजातीय विवाह को टेढ़ी नजर से देखते हैं, यह तो संजीवनी बुटी को ‘चरौटा-भाजी’ समझने के समान मूर्खता है। जो हमें संकीर्णता से विशालता की ओर, जो हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जावे, ऐसे कदम का विरोध करने वाले लोगों के लिय हृदय में एक भारी वेदना पैदा होती है।”

उपजाति शादी की मान्यता के लिये, वर्षों तक संघर्ष कर, अंततः विजयी हुये। इसी का परिणाम है, कि आज छत्तीसगढ़ के कूर्मियों में अन्तर उपजातिय शादियों को मान्यता प्राप्त है। कुर्मियों के अखिल भारतीय स्वरूप को उन्होंने सामने लाया, पटना (बिहार) के राजेश्वर पटेल (जो सांसद भी रहे एवं 1953 ‘प्रथम राष्ट्रीय अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग’ जिसके अध्यक्ष काका कालेलकर को नियुक्त किया गया था, के पटेल जी सदस्य रहे।) के साथ अपनी तृतीय पुत्री सरस्वती का विवाह किया । “अखिल भारतीय कूर्मि क्षत्रिय महासभा” के 24 वें अधिवेशन जो कि दिनांक 7,8 एवं 9 मई 1948 यू.पी., कानपुर के जनपद हारामऊ ग्राम-पुखराया में एवं 28 वाँ अधिवेशन जो महाराष्ट्र, नागपुर में दिनांक 10,11 एवं 12 दिसम्बर 1966 को आयोजित था, कि अध्यक्षता की।

कानपुर के अध्यक्षीय भाषण का यह अंश उनके समस्त मानव जाति को एकजुट करने की इच्छा को प्रदर्शित करता है “उपजातियों का भेदभाव मिटाना इस युग का छोटे से छोटा, हल्के से हल्का कदम होगा। सही मायने में तो हमको और आपको समस्त मानव जाति के अंदर रहने वाली ब्राम्हणवादी जाति-पाति की सड़ी एवं खड़ी व्यवस्था को ही पहले दूर करना होगा। वर्ण व्यवस्था रूपी शरीर में जाति व्यवस्था एक कोढ़ है, जो सारे भारतीय मानव समाज को नष्ट कर रहा है।”

सामाजिक परिवर्तन की दिशा में उनके उपर्युक्त उद्‌गार आज भी प्रासंगिक है। क्योंकि शोषित एवं पिछड़ा अपने हित की जब बात करता है, तो उच्च वर्ण के लोग उन्हें जातिवादी करार देते हैं। क्या अपने-अपने परिवार के, जाति के, वर्ग के एवं वर्ण के हित में कार्य करना जातिवाद है? यदि ब्राम्हणवादियों का आरोप सहीं है, तो वे स्वयं, वही कार्य क्यों करते हैं?

जाति प्रथा के आधार पर छत्तीसगढ़ में एक रिवाज प्रचलित थी, जिसके तहत, किसी बारात में उपस्थिति भिन्न-भिन्न जाति के लोगों को अलग-अलग पंक्ति में बैठाकर भोजन करवाया जाता था। अर्थात्‌ व्यक्ति के जाति के, आधार पर उसकी पंक्ति तय होती थी। कूर्मि व्यक्ति तेली के साथ एक ‘पंक्ति‘ में बैठकर भोजन ग्रहण नहीं कर सकता था। यह व्यवस्था डॉ. साहब को भेदभाव पूर्ण लगी और उन्होंने इसे तोड़ने के लिये ‘पंक्ति तोड़ो‘ आंदोलन चलाया, अर्थात्‌ कोई व्यक्ति किसी के भी साथ एक पंक्ति में बैठकर भोजन कर सकता है। जाति के आधार पर पंक्ति नहीं होनी चाहिये। पंक्ति तोड़ो आंदोलन में वो सफल रहे।

सन् 1952 में होली त्यौहार के समय कराये जाने वाले ‘किसबिन नाच‘ बंद कराने के लिये ग्राम महुदा (तरपोंगी) ब्लाक-तिल्दा, जिला-रायपुर में सत्याग्रह किया पूर्णतया सफल रहे। किसबा जाति जिनका पुश्तैनी धंधा ही अपनी बहन-बेटियों को तवायफ की तरह नाच-गाने में लगाने का था, उनमें यह चलन बंद करने के लिये आपने ‘भारतवंशी, जातिय सम्मेलन’, मुंगेली, जिला-बिलासपुर में समाज सुधार की दृष्टि से किया। इस सम्मेलन का व्यापक प्रभाव उक्त जाति पर पड़ा और किसबा जातीय जीवन धारा में परिवर्तन आया । सामाजिक परिवर्तन के आंदोलन में उनके आदर्श महात्मा ज्योतिबा फुले थे। डॉ. साहब बताते थे कि महात्मा गाँधी, फुले को असली महात्मा कहते थे। शैक्षणिक एवं सामाजिक रूप से पिछड़ों के आर्थिक मुक्ति के लिये सिलयारी में ‘ग्राम उद्योग संघ’ का निर्माण, तेल पेराई उद्योग, घानी निर्माण, हाथ करघा, धान कुटाई कार्य और साबुन साजी के गृह उद्योग का प्रशिक्षण और उत्पादन तथा मार्केटिंग कार्य का संचालन आपने सहकारिता के माध्यम से किया।

सन् 1958-59 में सिलयारी में ‘जनता हाईस्कूल’ की स्थापना की। जो आज उनके नाम पर शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय है। यह कदम उन्होंने आसपास के गाँवों के शैक्षणिक स्तर को ऊँचा उठाने के लिये किया। इस स्कूल को खोलने का दूसरा कारण था, प्रदेश शासन द्वारा धरसीवाँ विधानसभा क्षेत्र की उपेक्षा। चूँकि 1952 एवं 57 में डॉ. बघेल, यहाँ से विरोधी दल के प्रत्याशी की हैसियत से एम.एल.ए. बने थे, काँग्रेस के प्रत्याशी को हराकर। 

राजनैतिक कार्य
डॉ. साहब सन् 1931 तक शासकीय अस्पताल में डॉक्टर रहे, शासकीय सेवा से त्यागपत्र दे पूरी तरह से स्वाधीनता आंदोलन में कूद गये। 1931 में “जंगल सत्याग्रह” में पुनः जेल गये, काँग्रेस के पूर्णकालिक सदस्य बन, स्वतंत्रता संग्राम के लिये, महात्मा गाँधी द्वारा चलाये जाने वाले आंदोलन में शामिल हुये। 1932 में रायपुर जिला काँग्रेस कमेटी के डिस्ट्रिक्ट कौंसिल रायपुर में फिजिकल इन्सट्रक्टर के पद पर नियुक्ति किये गये। “भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस” द्वारा चलाये जा रहे स्वाधीनता संग्राम में समय-समय पर आयोजित विभिन्न आंदोनल में सक्रियता से भाग लिया। 1932 में “द्वितीय सविनय अवज्ञा आंदोलन” में शामिल हुये। सन् 1935 के अधिनियम 'The Govt. of India Act' के आधार पर भारत में संघात्मक प्रणाली स्थापित की गई, जिसके फलस्वरूप 1937 में निर्वाचन हुये काँग्रेस को अभुतपूर्ण सफलता मिली। डॉ. साहब ने काँग्रेस कार्यकर्ता के रूप में सक्रियता से इन चुनावें में हिस्सा लिया। ग्यारह प्रांतों में से 8 प्रांतों में काँग्रेस को बहुमत मिला, जिसमें “सी.पी.एवं बरार” भी शामिल था। द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटिश सरकार को सहयोग कर, पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्ति का प्रस्ताव काँग्रेस द्वारा 1940 में पास किया गया परंतु ब्रिटिश सरकार ने युद्ध के बाद 1942 में भारत को आजाद करने से इंकार कर दिया। जिसके फलस्वरूप गाँधी जी ने 1941 में सत्याग्रह आंदोलन शुरू किया। “करो या मरो आंदोलन” 'Do or Die' में सक्रियता से भाग लिया और जेल गये। 8 अगस्त 1942 में शुरू “भारत छोड़ो आंदोलन” में अपने साथियों सहित 21 अगस्त 1942 को जेल गये एवं ढाई वर्षों तक जेल में रहे।

जून 1946 में प्रांतीय व्यवस्थापिका सभा के निर्वाचन हुये सी.पी. एवं बरार में काँग्रेस को 112 स्थानों में से 92, स्थान मिले। रविशंकर शुक्ला के प्रधान मंत्रित्व (तब मुख्यमंत्रियों को इसी नाम से जाना जाता था) में सी. पी. एवं बरार, प्रांत में सरकार बनी। डॉ. साहब इस चुनाव में धरसींवा विधानसभा से विधायक चुने गये। काँग्रेस की अंतरिम सरकार में संसदीय सचिव के रूप में कार्य किया। तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हसन के साथ, उन्होंने स्वास्थ्य विभाग का भी काम सम्हाला। तत्कालीन मुख्यमंत्री रविशंकर शुक्ल से “किसानों से प्रशासन द्वारा चंदा वसुली” के प्रकरण में मतभेद हो गया, और अपने पद से इस्तीफा दे दिया । 19 मई 1951 में आचार्य कृपलानी के नेतृत्व में बने “किसान मजदूर प्रजा पार्टी” में शामिल हो गये। सन्‌ 1952 का आम चुनाव हुआ, डॉ. खूबचंद बघेल “किसान मजदूर प्रजा पार्टी” से पुनः धरसींवा विधानसभा क्षेत्र के विधायक चुने गये, उन्होंने काँग्रेस को 53.21 प्रतिशत मत प्राप्त कर हराया था। सन् 1952 में जयप्रकाश नारायण के समाजवादी पार्टी एवं आचार्य कृपलानी के “किसान मजदूर प्रजा पार्टी” को मिलाकर “प्रजा सोशलिस्ट पार्टी” का गठन किया गया। सन् 1957 के आम चुनाव में “प्रजा शोलिस्ट पार्टी” प्रसोपा (झोपड़ी छाप) के बैनर तले पुनः धरसींवा विधानसभा से निर्वाचित घोषित किये गये। सन् 1954 में ठाकुर प्यारेलाल सिंग के निधन के पश्चात छत्तीसगढ़ में समाजवादी आंदोलन एवं प्रसोपा का कमान डॉ. खूबचंद बघेल के हाथों सौंपा गया।

राजनीति के महत्व को बताते हुये डॉ. साहब ने सन 1965 की अपनी डायरी में लिखा है, कि- “राजनीति को रचनात्मक कार्यकर्ता पाप समझते हैं, किन्तु आज राजनीति राष्ट्र की दिशा-निर्देश, नीति निर्धारण करती है। क्या इसे ऐसे लोगों के हाथ सौंपकर निश्चिंत हो जाया जाय जो जाने-अनजाने रचनात्मक कार्यों का नाश कर देगें? ऐसी स्थिति में क्या मात्र निष्ठा से काम चल जायेगा ? अतः राजनीति को पाप समझना छोड़ दें। राजनीति उतनी ही गंदी होती है, जितना हम उसे बनाते हैं। मैं सत्तालोलुप राजनीति का समर्थक नहीं पर आधारभूत राजनीति का समर्थक हूँ, जिसका प्रभाव आम जनता के जीवन की जड़ों तक पहुँचता है। अतः चुनौती देने वाली समस्याओं को राजनीति का नाम देकर, उससे पीछा छुड़ाने का प्रयास सामाजिक कार्यकर्ता ना करें यही मेरी उनसे अपेक्षा है।”

भारत के राजनैतिक परिदृष्य पर, इतिहास के पन्नों से सन् 1955 की डायरी में लिखते हैं- “मुट्ठी भर लोगों की जगह ‘बहुजन समाज’ का राज पहिले आदिम काल में सहज स्वाभाविक रूप से स्वतंत्र था।” सन् 1951 में काँग्रेस से त्यागपत्र देकर जब आचार्य कृपलानी के साथ “किसान मजदुर प्रजा पार्टी” में आये तो पं. द्वारिका प्रसाद मिश्र ने उन्हें धमकाते हुये कहा था- “डॉ. सोच लो तुम्हें मिटा दिया जायेगा।” इसका जवाब डॉ. साहब ने कुछ इस तरह दिया था- “आप मुझसे मेरा सब कुछ छीन सकते हो, मेरी गरीबी नहीं छीन सकते। मेरी बूची टांडी के पसिया को नहीं छीन सकते।” आचार्य कृपलानी के साथ काँग्रेस त्यागने वाले छत्तीसगढ़ में ठाकुर प्यारेलाल सिंह (रायपुर), ज्वाला प्रसाद मिश्रा (अकलतरा) विश्वनाथ यादव, तामस्कर वकील (दुर्ग) आदि थे। ये सभी नेता अपने समय के प्रखर स्वतंत्रता सेनानी एवं गाँधीवादी थे।

छुईखदान तहसील कार्यालय हटाये जाने के विरोध में प्रदर्शन कर रहे, निहत्थे लोगों पर शासन द्वारा गोली चलाई गई। जिसमें कुछ महिलायें भी शहीद हुई, अनेक घायल हुये। इस गोली चालन के विरूद्ध में उन्होंने ठाकुर प्यारेलाल सिंह के साथ मिलकर प्रांतव्यापी आंदोलन चलाया। इसी प्रकार लोहाँडीगुड़ा जिला-बस्तर में आदिवासियों पर दिनांक 31/03/1961 में हुये अत्याचार, गोली चालन का उन्होंने प्रभावी ढंग से विरोध किया।

डॉ. बघेल ने रायपुर का कुप्रसिद्ध तकाबी कांड, जिसमें किसानों को लूटा गया था, के विरूद्ध अपनी आवाज बुलंद की। तकाबी कांड में फंसे अधिकारियों को अंत में सजा मिली, सजा से बचने, संबंधित व्यक्तियों ने डॉ. बघेल की अनुपस्थिति में, उनके घर डाका डलवाकर, कांड से संबंधित कई फाइलें गायब करवा ली थी।

बैतूल जिले के कुछ लोगों ने डॉ. बघेल को “सायना बांध” में हुए घपले की खबर दी, डॉ. साहब ने वहाँ पहुँचकर घपले की पूरी फाइल बनाई। मुख्यमंत्री काटजू के पास चर्चा के लिय स्वयं गये। पूरी चर्चा के बाद कैलाशनाथ काटजू, मुख्यमंत्री मध्यप्रदेश ने पूछा “डॉ. बघेल आखिर आप सायना गये क्यों थे ? क्या वहाँ आपकी कोई रिश्तेदारी है ?” डॉ. बघेल बोल - डॉ. काटजू आप ठीक-ठीक बताएँ की आप जाँच कराने तैयार हैं, कि नहीं ? अन्यथा मैं इस घपले को आमजनता तक ले जाऊँगा, और वह स्वयं निर्णय लेगी। 

एक उच्चपुलिस अधिकारी ने रायपुर के अपने कार्यकाल में किसी मामले की डॉक्टर साहब द्वारा आलोचना किये जाने को लेकर इंदौर में उन पर मुकदमा चलाया। डॉ. साहब इंदौर जाकर मुकद्मा लड़े और विजयी हुये।

डॉ. कैलाशनाथ काटजू के मुख्यमंत्रित्व के दौरान सन् 1960-61 में विन्ध्यप्रदेश, मध्यभारत एवं छत्तीसगढ़ में अकाल पड़ा। विन्ध्य एवं मध्यभारत को गेहूँ निर्यात की छूट और छत्तीसगढ़ के धान निर्यात पर पाबंदी लगा दी गई। डॉ. साहब ने मुख्यमंत्री से, छत्तीसगढ़ के किसानों के हित में प्रतिबंध हटाने की अपील की, मुख्यमंत्री नहीं माने। डॉ. साहब ने इस तुगलकी, आदेश का उल्लंघन करते हुये, अपने साथियों के साथ ‘धान सत्याग्रह’ आंदोलन चलाया। महाराष्ट्र-मध्यप्रदेश सीमा पर स्थिति बाघ नदीं से 1 बोरा धान को स्वयं नाव द्वारा निर्यात कर (म.प्र. से महाराष्ट्र ले जाकर) आंदोलन की शुरूवात की और जेल गये। इस आंदोलन में स्व. बृजलाल वर्मा, पूर्व केन्द्रीय मंत्री, हरिप्रेम बघेल पूर्व विधायक एवं अन्य साथीगण शामिल थे।

सन् 1962 में विद्याचरण शुक्ल के विरूद्ध “महासमुंद लोकसभा” सीट से चुनाव लड़ा, जिसमें विद्याचरण 2,500 मतों से विजयी हुये थे। इस लोकसभा चुनाव में (आमचुनाव) महासमुंद लोकसभा के अन्तर्गत आने वाले, सारंगढ़ विधानसभा से, वहाँ के राजा साहब ने चुनाव लड़ा। उनके विरूद्ध केवल प्रसोपा का एक प्रत्याशी ही था, जिसकी उम्मीद्वारी वापस लेने से, वे निर्विरोध निर्वाचित हो सकते थे। इसके लिये राजा साहब ने डॉ. बघेल को 30,000/- रूपया (तीस हजार) घूस के रूप में देने की पेशकश की। सिद्धांत के पक्के डॉ. बघेल देवभोग से सराईपाली तक विद्याचरण से आगे रहे पर सारंगढ़ में 12,000 मतों से पिछड़कर 2500 (ढाई हजार ) मतों से हार गये। डॉ. बघेल ने विद्याचरण के विरूद्ध चुनाव याचिका दायर की और विद्याचरण का निर्वाचन रद्द कर दिया गया।

“मांछी खोजे घाव अऊ राजा खोजे दाँव” वाली काहवत चरितार्थ करने, पं. द्वारिका प्रसाद मिश्र (जिसके विरूद्ध भी 1962 के चुनाव जीतने में कदाचरण की याचिका न्यायालय में दायर कर दी गई थी।) ने कोचक कर घाव बनाया एवं समाजवादी पार्टी के मुखिया डॉ. बघेल को घेरा। इस षड़यंत्र में विद्याचरण को भी शामिल किया गया, क्योंकि उनके विरूद्ध भी चुनाव याचिका थी, दुश्मन (डॉ. बघेल) का दुश्मन (विद्याचरण) दोस्त बन गये। सिलयारी घानी संघ जो सहकारी क्षेत्र में था, की जाँच (ऑडिट) करवाकर कुछ गलतियाँ निकाली गई।

डॉ. बघेल का इसमें कोई हाथ नहीं था, उन्हें तो राजनीति से ही फुर्सत नहीं थी। पं. द्वारिका प्रसाद मिश्र ने डॉ. बघेल को कहा, कि आपके द्वारा संचालित संघ में पैसे की गड़बड़ी है और इससे आपके प्रतिष्ठा को गहरा आघात लग सकता है। आप काँग्रेस में आते हैं, तो इसे नजर अंदाज किया जा सकता है। डॉ. बघेल ने सोचा जिस छत्तीसगढ़ की सेवा विरोधी पार्टी में रहकर वो नहीं कर नहीं पा रहे है, वह सत्ता के माध्यम से अच्छा हो पायेगा। प्रतिष्ठा भी बची रहेगी। डॉ. बघेल ने काँग्रेस प्रवेश करना स्वीकार कर लिया, लेकिन कभी भी काँग्रेस में चैन से नहीं रह पाये। सन्1966 में तत्कालीन मुख्यमंत्री डी.पी. मिश्र थे, बस्तर में राजा प्रवीरचंद भंजदेव के कारण बस्तर के 12 विधा सभा सीटों में काँग्रेस की दाल नहीं गलने वाली थी। राजा प्रवीरचंद भंजदेव ने न केवल बस्तर जिला काँग्रेस अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दिया था, वरन्‌ काँग्रेस भी छोड़ दी। द्वारिका प्रसाद मिश्रा बस्तर के 12 सीट काँग्रेस की झोली में डालकर, इंदिरा गाँधी को खुश करना चाहते थे। प्रवीरचंद भंजदेव एवं 300 आदिवासियों की पुलिस गोली चालन कर हत्या करवा दी गई। इस घटना का मार्मिक चित्रण डॉ. बघेल ने लोगों के सामने रखा, आम जनता को इस काण्ड की बर्बरता का विवरण दिया। इस कांड से दुखी डॉ. साहब ने काँग्रेस से इस्तीफा दे दिया।

भिलाई स्टील प्लांट की स्थापना में जिन किसानों की जमीन अर्जित की गई, उनके परिवार से एक व्यक्ति को अनिवार्य रूप से कारखाने में रोजगार दिलवाने श्री तामस्कर जी के साथ मिलकर किसानों एवं मजदूरों का विशाल प्रदर्शन डॉ. बघेल के नेतृत्व में किया गया। शासन ने स्थानीय लोगों को प्राथमिकता देना स्वीकार किया। हीराकुंड बांध निर्माण से जिन किसानों की जमीन, डुबान में आ गई थी, उसके मुआवजे के लिये आंदोलन चलाया, इस आंदोलन में श्री रामकुमार अग्रवाल रायगढ़ ने साथ दिया। किसानों को उनका हक मिला।

1964 में जब ‘सी.पी.एवं बरार‘ प्रांत के प्रधानमंत्री (मुख्यमंत्री तब इसी नाम से जाने जाते थे। ) के चुनाव में बृजलाल बियानी भी एक उम्मीद्वार थे, पं. रविशंकर शुक्ला के विरूद्ध, बियानी को समर्थन देने के बदले डॉ. बघेल को 3 लाख रूपये देने का प्रस्ताव गोपाल दास मेहता ने रखा। डॉ. बघेल उसूल के पक्के, निष्ठावान राजनीतिज्ञ थे, यह प्रस्ताव ठुकराकर, पं. रविशंकर शुक्ल के लिये प्रधानमंत्री पद का रास्ता प्रशस्त किया। 1964 में स्वास्थ्य विभाग के सचिव आई.सी.एस., मि. सिन्हा थे, डॉ. हसन, स्वास्थ्य मंत्री (केबिनेट) थे। सचिव की लापरवाही से विधानसभा में डॉक्टरों की नियुक्ति को लेकर प्रश्न उठने की नौबत आ गई। मि. सिन्हा को बुलाकर डॉ. साहब ने खरीखोटी सुनाई, सिन्हा जी ने अपनी पत्नी के माध्यम से काजू किसमिस, अंगुर सेवफल से भरी टोकरी राजकुँवर देवी (डॉ. साहब की पत्नी) तक डॉ. साहब की अनुपस्थिति में पहुँचवाई।

डॉ. बघेल ने पत्नि से पूछा इसे कौन लाया ? तुरंत अपने चपरासी गोपाल के हाथ उस टोकरी को सिन्हा के घर वापस पहुँचवा दिया। गाँधी जयंती के उपलक्ष्य में चंदा इकट्ठा करने नेवरा, लखनलाल मिश्र, भुजबल सिंह एवं जगन्नाथ बघेल के साथ गये। एक राईसमिल के मालिक ने उनसे कहा, आप कोड़हा मध्यप्रदेश से बाहर भेजने का परमिट मुझे दिला दीजिये, मैं अकेला 7500/- (साढ़े सात हजार रूपये) चंदा देता हूँ। डॉ. बघेल ने इंकार कर दिया। घर-घर जाकर रूपये इकट्ठा कर लाये। गाँधी जयंती सम्पन्न हुई।

डॉ. बघेल ने पं. रविशंकर शुक्ला से मतभेद के कारण मंत्री मण्डल से इस्तीफा दिया था। कारण पं. जी के प्रधानमंत्री बनने की खुशी में, महासमुंद के सेठ नेमीचंद श्री श्रीमाल ने उन्हें चाँदी से तौलने की योजना बनाई। इसे मूर्तरूप देने के लिये प्रशासन के माध्यम से आदिवासी क्षेत्र पिथौरा, सराईपाली, बसना, महासमुंद, बागबाहरा के किसानों से चंदा जबरदस्ती वसूल किया जाने लगा। लोगों ने अपना खेती-बाड़ी गाय-बकरी-मुर्गी यहाँ तक कि घर के जेवर एवं बर्तन बेचकर चंदा चुकाया। इसकी तिखी प्रतिक्रिया हुई, कुछ आदिवासियों ने नागपुर (सी.पी. एवं बरार की राजधानी) जाकर डॉ. बघेल को अपनी व्यथा कथा सुनाई। उन्हें परस्पर विश्वांस नहीं हुआ उन्होंने प्रधानमंत्री पं. रविशंकर शुक्ल से मिलकर इस विषय में चर्चा की, पंडितजी ने कहा- “राजनीति में यह सब चलता है हालांकि मैंने शासकीय कर्मचारियों को ऐसा कोई आदेश नहीं दिया है, इसलिये रोक लगाने के आदेश की जरूरत नहीं है। “डॉ. बघेल ने छत्तीसगढ़ के इसी शोषण, पीड़ा, लूट के विरूद्ध व्यथित दुखी होकर अपना इस्तीफा दिया था।

ग्राम-मौहागाँव सिलयारी त. व जि. रायपुर के एक अनुसूचित जाति के किसान को सरकार द्वारा पंप लगाने के लिये 6,000/- (छः हजार) रूपये मंजूर किया गया। तत्कालीन तहसीलदार ने उसे 4,000/- (चार हजार) रूपये ही देकर, बाँकी अपने पास रख लिया, इसकी शिकायत उक्त किसान ने डॉ. साहब से की। वे उस समय धरसींवा के विधायक थे। तहसीलदार के विरूद्ध मामला दायर किया, रायपुर के वकील डॉ. बघेल के तरफ से खड़ा होने तैयार नहीं हुये, दुर्ग से तामस्कर वकील को लाकर भ्रष्टाचार का मुकदमा जीते। तहसीलदार को बर्खास्त कर दिया गया।

डॉ. बघेल का जीवन, ऐसे कितनों ही घटनाओं से भरा पड़ा है। उन्होंने अपने 39 वर्ष (सन् 1931 से 1969) के राजनैतिक जीवन में जीवन पर्यंत दलित-शोषित, मजदूर, किसानों एवं गरीब जनता की आवाज बुलंद की और बदले में कभी भी कुछ पाने की कामना नहीं की। खासकर आर्थिक लाभ कभी नहीं उठाया। प्रजातंत्र की महत्ता को आमजनता तक पहुँचाने सतत्‌ संघर्ष किया ।

छत्तीसगढ़-राज्य आंदोलन
वैसे सप्रे स्कूल में सन् 1946 में आयोजित ‘प्रदेश काँग्रेस कमेटी‘ की बैठक में तामस्कर वी.वाय. ने, छत्तीसगढ़ को अलग राज्य का दर्जा दिलाने की बात रखी थी, लेकिन “प्रदेश काँग्रेस कमेटी” में, जिसके अध्यक्ष पं. रविशंकर शुक्ला थे, वी.वाय.तामस्कर के प्रस्ताव को अनसुनी कर दी।

डॉ. बघेल के मन में पृथक छत्तीसगढ़-राज्य के माँग ने, तब घर कर लिया, जब सन् 1948 में उन्होंने रविशंकर शुक्ल मंत्री मंडल से, पिथौरा, बसना-सरायपाली के पिछड़े, आदिवासियों से जबरन चंदा वसूल की गई थी। डॉ. बघेल इस प्रकरण से इतने द्रवित हुये, कि उन्होंने शुक्ल मंत्रीमंडल से ही इस्तीफा दे दिया। उन्होंने एक लेख लिखा, र्शीर्षक था- “क्षुब्ध-छत्तीसगढ़” इस लेख से रायपुर-बिलासपुर और दुर्ग ये तीन जिले और हाल के विलीनीकरण से शामिल हुये, 14 राजवाड़े यही छत्तीसगढ़ का इलाका है। सत्ता के मद में माते लोगों को भुलावे में डालने के लिये, छत्तीसगढ़ के परम पुनीत जागरण के कोलाहल को पाकिस्तानी नारा कहकर दफना देना चाहते हैं। वे कहते हैं “छत्तीसगढ़िया चेतना की आवाज लगाने वाले देश के दुश्मन हैं। उनके साथ शासन रियायत ना करेगा। उन्हें कुचल देगा। देखो खबरदार कोई साथ मत देना, नहीं तो आफत मोल लोगे।”

छत्तीसगढ़ के हित में जो अपना हित समझते है, वे हमारे भाई है, जो छत्तीसगढ़ का राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं अन्य तरीकों से शोषण करना चाहते है, हमारे प्रेम के पात्र नहीं हो सकते। क्या यह विचार देशद्रोह पूर्ण है? यदि हो, तो हम अपना बचाव नहीं करना चाहते। यदि हमारे विचार में भूल हो तो, हमें प्रेम से समझाया जाय। हम वायदा करते हैं, कि समझ लेने पर हम अपनी भूल सुधार लेगें, परंतु यदि धमकी के बल पर हमें दबाने की कोशिश की गई, तो हमारा हृदय स्वीकार नहीं कर सकेगा।

डॉ. रामलाल कश्यप जी (पूर्व कुलपति पं.र.वि.वि. रायपुर) ने जब वे जबलपुर कृषि महाविद्यालय में अध्ययनरत थे, तो डॉ. बघेल से पूछा- आप छत्तीसगढ़ी आंदोलन के प्रेणता माने जाते हैं, तो आपके छत्तीसगढि़या की परिभाषा क्या है ? डॉ. बघेल ने उत्तर दिया “जो छत्तीसगढ़ के हित में अपना हित समझता है। छत्तीसगढ़ के मान- सम्मान को अपना मान-सम्मान समझता है और छत्तीसगढ़ के अपमान को अपना अपमान समझता है, वह छत्तीसगढि़या है। चाहे वह किसी भी धर्म, भाषा, प्रांत जाति का क्यों न हो।”

ठाकुर प्यारेलाल सिंह द्वारा सम्पादित, प्रकाशित अर्ध सप्ताहिक पत्र “राष्ट्रबंधु” में डॉ. बघेल के लेख प्रमुखता से प्रकाश्ज्ञित होते थे। अन्होने आचार्य कृपलानी के लेखों का, अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद, भी किया। बलौद की एक सभा में डॉ. साहब ने कहा था- “आज प्रत्येक छत्तीसगढ़िया समझ रहा है, कि आज प्रजातांत्रिक राज्य हो गया है, किन्तु असली स्वराज तो कोषों दूर है।” वे मानते थे कि छत्तीसगढ़-राज्य के असली शोषक एवं शोषित कभी एक साथ नहीं रह सकते। शोषण, अन्याय और दमन जहाँ है, वहाँ स्वराज्य हो नहीं सकता, यह उनकी निश्चित धारणा थी। उनका तो बस एक ही लक्ष्य था- “छत्तीसगढ़ के सोये स्वाभिमान को जगाना उसके गौरव गरिमा को उजागर करना उसे शोषण, अन्याय और दमन से मुक्त करना।” 

सन् 1956 में छत्तीसगढ़ राज्य की कल्पना को साकार रुप देने जुझारु एवं कर्मठ कार्यकर्ताओं का एक वृहद सम्मेलन राजनांदगाँव में आयोजित किया गया। दाऊ चन्द्रभूषण दास इसके संयोजक थे। पहले सत्र की अध्यक्षता बैरिस्टर मोरध्वजलाल श्रीवास्तव एवं दूसरे सत्र की अध्यक्षता बाबू पदुमलाल पन्नालाल बक्शी ने की। इसमें सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ से लगभग दो हजार सक्रिय कार्यकर्ता शामिल हुये। सम्मेलन में 'छत्तीसगढ़ी महासभा'' का गठन हुआ और डॉ. खूबचन्द बघेल इस महासभा के सर्वसम्मति से अध्यक्ष निर्वाचित हुये। दशरथलाल चौबे सचिव तथा केयूर भूषण एवं हरि ठाकुर को संयुक्त सचिव के पद पर मनोनित किया गया। डॉ. साहब ने अपने अध्यक्षीय भाषण में पृथक छत्तीसगढ़ राज्य के माँग पर (औचित्य पर) व्यापक प्रकाश डाला फलस्वरुप सर्वसम्मति से ''छत्तीसगढ़ राज्य'' निर्माण का प्रस्ताव पारित किया गया। इतिहास ने एक नया मोड़ लिया। पृथक छत्तीसगढ़ राज्य के स्थापना के संघर्ष की नींव डल गई। 

25 सितम्बर 1967 को 'छत्तीसगढ़ी महासभा' को पुनर्गठित करने भोला कूर्मि छात्रावास, रायपुर में एक सभा आयोजित की गई। इसमें छत्तीसगढ़ के 500 सक्रिय कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। अध्यक्षता साहित्यकार बाबू मावली प्रसाद श्रीवास्तव ने की। डॉ. खूबचन्द बघेल सर्वसम्मति से इसके अध्यक्ष चुने गये। तथा परसराम यदु, रेशमलाल जाँगड़े, पं. द्वारिका प्रसाद तिवारी ‘विप्र’, तथा पं. गंगाधर दुबे उपाध्याय चुने गये। साहित्यकार हरि ठाकुर सचिव तथा रामाधार चन्द्रवंशी कोषाध्यक्ष निर्वाचित हुये। डॉ. साहब, राज्यसभा सदस्य केन्द्रीय स्टील माइन्स एवं मिनरल समिति एवं नेशनल रेल्वे यूजर्स सलाहकार समिति के सदस्य थे। स्थानीय लोगों को सरकारी एवं गैरसरकारी संस्थाओं के नौकरियों में प्राथमिकता दिलवाने कई आंदोलन छेड़े। दिनांक 8 फरवरी 1967 को दुर्ग जिले के अहिवारा में भातृसंघ का विशाल सम्मेलन बृजलाल वर्मा जी, की मुख्यआतिथ्य में राजा नरेशचन्द्र सिंह ने उद्धाटन किया। छत्तीसगढ़ राज्य की माँग को लेकर डॉ. साहब ने पूरे छत्तीसगढ़ का सघन दौरा कर प्रचार-प्रसार किया। आज छत्तीसगढ़ में जो जनचेतना दिखाई देती है, उसके पीछे डॉ. साहब का पसीना एवं परिश्रम है। ''छत्तीसगढ़ भातृ संघ'' आगे चलकर इतना प्रभावी हुआ कि पं. श्यामाचरण शुक्ल की सरकार ने शासकीय कर्मचारियों को इसकी सदस्यता ग्रहणकर कार्यकलापों में हिस्सा लेने पर पाबंदी, सामान्य प्रशासन विभाग के ज्ञापन क्रं 0527/567/ध/62 दिनांक 23.09.1971 द्वारा लगायी थी। इस ज्ञापन को श्री प्रकाश चन्द्र सेठी की सरकार (म.प्र.शासन) ने दिनांक 19.05.1974 के ज्ञापन क्रमांक 5-/75/3/1 द्वारा निरस्त किया। आज डॉ. बघेल संपूर्ण छत्तीसगढ़ शासन ने उनके नाम से प्रतिवर्ष 2 लाख रुपये के पुरुस्कार दिये जाने की घोषण की है।

सांस्कृतिक एवं साहित्यिक कार्य
छत्तीसगढ़ी साहित्य के क्षेत्र में उनका विशेष योगदान रहा है। डॉ. बघेल मौलिक चिंतक थे। नित्य सुबह चार बजे उठकर ध्यान और चिंतन में मग्न हो जाते थे। उनकी लेखनी काफी सशक्त थी। डॉ. बघेल को हर वक्त छत्तीसगढ़ियों की पिछड़ी मानसिकता, दब्बुपन, आर्थिक गुलामी की पीड़ा सताती थी। आखिर मेरे छत्तीसगढ़ में क्या कमी है? यह हमेशा वो चिंतन करते रहते थे। छत्तीसगढ़ी में उन्होंने तीन नाटक लिखे पहला 'ऊंच-नीच' समाज में व्याप्त छुआ-छूत और जातिवाद पर करार प्रहार करते हुये। दूसरा 'करम-छँड़हा' छत्तीसगढ़ के आम आदमी की गाथा उसकी बेबसी का वर्णन एवं तीसरा ''जनरैल सिंग'' जो छत्तीसगढ़ के दब्बुपन को दूर करने का रास्ता सुझाया। इन नाटकों को मंचित करने का दायित्व भी उन्होंने स्वयं निभाया। 1962 के भारत-चीन युद्ध के समय ''भारतमाता'' नामक नाटक लिखकर मंचित करवाया। मंचन के माध्यम से पथरी, कुरुद आदि गाँवों से धन एवं सहयोग एकत्रित कर प्रधानमंत्री राहत कोष में भिजवाया। रायपुर के समाचार-पत्रों अन्य प्रचार माध्यमों में लेख लिखकर हमेशा अपने विचारों से लोगों को अवगत कराते रहते थे। महात्मा ज्योतिबा फुले, महात्मा गाँधी एवं डॉ. राममनोहर लोहिया के विचारधाराओं से ओतप्रोत ये लेख रायपुर से प्रकाशित साप्ताहिक ''राष्ट्रबंधु'' के माध्यम से प्रसारित होते रहते थे।

अपने विचारों को लिपिबद्ध करने के लिये रोज डायरी एवं रजिस्टर का इस्तेमाल किया करते थे। अपने लेखन में डॉ. साहब ने अपने विचारों के अलावा महत्वपूर्ण घटनाओं को भी स्थान दिया हैं। वे सारी घटनायें जो उनके 'सामाजिक परिवर्तन’ के आंदोलन एवं राजनैतिक संघर्ष के दौरान घटी का विस्तृत विवरण उनकी डायरी एवं रजिस्टरों में मिलती है। अपने लेखन एवं बातों को लोगों तक रोचक ढंग से पेश करने के लिये शेरों-शायरी, कहावतें, मुहावरों का उपयोग कर चुटिला बनाना उनकी खूबी थी। शेर जो उन्हें प्रिय था, हमेशा युवकों को प्रेरणास्वरुप सुनाया करते थे:-
क्या हुआ मर गये, वतन के वास्ते।
बुलबुले भी होते हैं कुर्बान, चमन के वास्ते॥
खाली न बैठ, कुछ-ना-कुछ किया कर।
कुछ ना मिले तो, पैजामा उधेड़कर सिया कर॥

साँस्कृतिक चेतना फैलाने उन्होंने अपने दामाद दाऊ रामचन्द्र देशमुख को प्रेरित कर ''चंदैनी गोंदा'' नामक सांस्कृतिक संस्था का सृजन करवाया। जिसकी ख्याति ना केवल छत्तीसगढ़ में, बल्कि सम्पूर्ण भारत में फैली। इस साँस्कृतिक संस्था का शुभारंभ एवं समापन डॉ. बघेल के जन्म स्थली ग्राम-पथरी से हुआ।

डॉ. बघेल के बारे में अपने विचार व्यक्त करते हुये, छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार मधुकर खेर लिखते हैं- प्रचार तंत्र का स्वन्तत्र एवं जाल न होने के कारण डॉ. बघेल के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को स्थान नहीं मिल पाया जिसके वो हकदार थे।

डॉ. खूबचन्द बघेल को प्रोफेसर रंगा, चौधरीचरण सिंह एवं महेन्द्र सिंग टिकैत से कम नहीं आँका जा सकता। 1965 के भीषण अकाल के दौरान 'टाइम्स' अमेरिका की महिला पत्रकार संवाददाता लिखती हैं- मेरे 2 घंटे तक डॉ. खूबचन्द बघेल का इन्टरव्यू लेने के बाद छत्तीसगढ़ जैसे पिछड़े क्षेत्र में ऐसा जुझारु, कर्मठ, नेतृत्व भी हो सकता है, इस बात पर मुझे आश्चर्य है।

ऐसे बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी जुझारु, जबरदस्त राजनेता, सामाजिक परिवर्तन के प्रणेता, छत्तीसगढ़ राज्य के प्रथम स्वप्न ट्टष्टा एवं महान सपूत जिन्होंने आम जनता को स्वतन्त्रता के बाद भारतीय संविधान के तहत प्राप्त प्रजातांत्रिक अधिकारों की सतत्‌ रक्षा के लिये लोगों को जागृत करने का संघर्ष किया। प्रजातंत्र को वीरकाल तक स्थापित रखने के महत्व और उस पर आघात करने वाले कारणों एवं लोगों के विरुद्ध सतत्‌ संघर्ष करते रहने का संदेश दिया। संसद के शीतकालीन सत्र में भाग लेने वे दिल्ली गये हुये थे। इसी दौरान 22 फरवरी सन् 1969 को हृदयकालीन रुक जाने से उनका दिल्ली में निधन हुआ। उनकी अंत्येष्टी रायपुर के महादेव घाट में की गई। ऐसे महान व्यक्तित्व को उनके ही प्रेरणा वाक्य से श्रद्धाँजली अर्पित करते हैं- 
दिये बिना संताप किसी को,
झुके बिना यदि खल के आगे।
संतो का कर सकुँ अनुसरन,
तो थोड़े में ही सब कुछ जागे॥

शुक्रवार, 10 जून 2016

गँवात जाथे हमर महतारी भासा

छत्तिसगढ़ राज ल बने सोला बछर होगे हे तभो ले छत्तिसगढ़िया अऊ छत्तिसगढ़ भासा के कोनों बिकास नई होय सके हे। सबो राज म उहाँ के लइका मन बड़ मान-सम्मान ले अपन महतारी भासा ल गोठियाथे। अऊ तो अऊ हमरो राज म आके अपन भासा म गोठियाथे, फेर हमर राज म अइसे नई हे, हमरे राज के भाई-बहिनी मन अपन भासा म नई गोठियावय तेखरे सेती हमर महतारी भासा ह कहुँ गँवावत जात हे। छत्तिसगढ़ म छत्तिसगढ़ी भासा ल सबो कोती नई बोलय, कोनो-कोनो कोती दु-चार मनखे मन जेन अपन छत्तिसगढ़ी भासा म गरब करथे, तेन मन बोलेथे, गुनथे अऊ लिखथे घलोक। बस उही मन छत्तिसगढ़ी भासा ल जगाय के परियास करत हे। जउँन मन ठेठ छत्तिसगढ़िया हाबय तेन मन ये सब देख के अब्बड़ कलपत हे कि उँखर राज म उँखरे भासा ल गोठियाय बर संगी-संगवारी मन लजाथे, अऊ दुसर भासा ल बड़ गोठियाथे।
आघु के बाढ़त बेरा म अइसने रही त आघु के अवइया लइका मन ह छत्तिसगढ़ी भासा ल भुला जाही। येखर असतित्व के नास हो जाही, छत्तिसगढ़ के बिकास के साँथ उँखर भासा ल सबो जगह बिकसित करना होही। छत्तिसगढ़ी भासा के जनवइया मन ल येखर बर विचार करके अपन मेहनत ले एला आघु बढ़ाय बर अपन-अपन योगदान देना चाही। छत्तिसगढ़िया संगी-संगवारी मन ल अपन भासा ल गोठियाय बर उही बाहिर के अवइया मनखे मन ले सिखना चाहि, जउँन मन बाहिर राज ले आके अपन बोली-भासा ल घलोक नई भुलाय। अपने बोली-भासा म अपन संगी-संगवारी मन ले गोठियाथे, अऊ वोमन ल अपन महतारी भासा ले अब्बड़ मया रहिथे। जेन मनखे मन अपन महतारी भासा छत्तिसगढ़ी म पढ़े-लिखे हाबय तेखरो अतेक पढ़े के बाद कोनों बिकास नई हो सके हे, वहु मन भटकत हे, अऊ दूसर भासा बोलइया लइका मन दुरिहा-दुरिहा म जा के बसे हे नउकरी करथे, कहिके अऊ कोनों मनखे छत्तिसगढ़ी भासा नई सिख सकत हे, एखर कारन हावय के छत्तिसगढ़ भासा के कोनों बिकास अभी तक ले नई हो सके हे। 

छत्तिसगढ़ी भासा ल आघु बढ़ाये बर इहाँ के सियान, साहितकार, अधिकारी, मंतरी अऊ आम मनखे ल अपन-अपन कोती ले पराथमिक सिच्छा म लागु करना पड़ही। जेकर से लइका मन एखर बारे म जान सके अपन भाखा ल सीख सकय अऊ अपन महतारी भासा ल आघु बढ़ाय सकय, फेर छत्तिसगढ़ी भासा ल राज-काज के भासा म घलोक मिलाय बर परही तब हमर भासा के पहिचान होही। 
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अनिल कुमार पाली 
तारबाहर, बिलासपुर (छ.ग.) मोबा. 7722906664



दार-भात अउ खिचरी


हमर लोक कला के नकल कोनो नई कर सकय। भला हमर पंडवानी ल कोनो हिंदी, अंगेरजी म गा सकत हे का? समे के संग अब यहू मन छत्तिसगढ़ के इतिहास बनतेच जात हे। हमन दूसरे के देखा-सीखी नकल उतार-उतार के एकर सुद्‌धता बिगाड़ के ''धोबी के कुकुर कस घर के न घाट के'' बरोबर बना डारत हन। आजकल छत्तिसगढ़ी एलबम ह तो बम गिरातेच हाबय अउ छालीवुड ह तो इहाँ के संसकिरती के, लोककला के फोकला निकालत हावय।
मोर भाखा कतेक गुरतुर, कतेक मिठास ये बात ल तो सिरिफ छत्तिसगढ़ियच मन हर जानथंय। जम्मो भाखा बोली ले सुरहि गाय कस सिधवी बिन कपट के निच्चट सांत रूप म हाबय। ''अंधवा जभे खीर खाथे तभे, पतियाथे।'' इही कहावत ह मोर छत्तिसगढ़ी भाखा ऊपर बरोबर बइठथे। बोले म रमायन, गीता के बानी कस, सुने म महतारी के लोरी कस दुलार हावय हमर छत्तिसगढ़ी भाखा म। नवा दुलहिन के पइरी के घुँघरू कस नीक भाखा म करमा, ददरिया, चंदैनी के सुर म मादर, ढोलक, गँड़वा बाजा के थाप ह परथे त लागथे ए छत्तिसगढ़ी भाखा बोली ह जम्मो भाखा बोली ल पचर्रा बना दिस। ए भाखा के नावेच हावय छत्तिसगढ़ी ! छत्तिस आगर छत्तिस कोरी मनखे मन मिलके ए भाखा ल गढ़े होंही तभे छत्तिसगढ़ी भाखा बोली नोहय, ए ह हमर छत्तिसगढ़ के जम्मो संसकिरती के दरसन आय। ऐंठी, तुर्रा, गजरा, पंडवानी, बिहाव-भड़ौनी, कमरा-खुमरी, नोई-दुहना, के चिन्हार, इही छत्तिसगढ़ी भाखा ह कराथे। ए भाखा ह तो छत्तिसगढ़ के परान आय। जेन दिन ए भाखा नंदा जाही वो दिन छत्तिसगढ़ घलो मेटा जाही।

संस्कृति अउ तिहार ह तो छत्तिसगढ़ के माई तिजोरी म भरे हावय। माता पहुँचनी के सीतला पूजा, अक्ती, ठाकुर देव पूजा साँहड़ा देव पूजा, देवारी के गउरी-गउरा, घरो घर घूमत छेरछेरा मँगइया के होली, मेला-मड़ई जइसन मया पिरीत। अउ अपन आसथा ले जुड़े अइसन तिहार कोनो जगा देखे बर नई मिलय। इँहा के तिहार सब जगा ले घुँच के रहिथे। बिहाव मँगौनी के करी लाड़ू, मोहरी, दफड़ा, निसान के बघवा कस गरजई, भड़ौनी, मायसरी लूगरा, पर्रा झुलउनी, माँदी भात, आजी गोंदली ये जम्मो ह हमर छत्तिसगढ़िया होय के पहिचान आय। लइका होय म छट्ठी-बरही, काँके पानी रिवाज ह घर म हरिक लान देथे। नानपन के गँगाजल, गजामूँग, महापरसाद, भोजली-जँवारा ह दोसती के पिरीत ल एक ठन गाँठ म बाँध देथय। दाई-ददा, कका-बबा, ममा-दाई, भऊजी, भांटो केहे के चलन इहेंच हे। 

छत्तिसगढ़ के पहिराव ओढ़ाव दुरिहच ले चिनहा जथे। गरवा चरावत राउत भइया के चंदैनी गोंदा कस रिगबिग ले कुरता, सलूखा, सादा, पिंयर पंछा मुड़ म छोटकुन खुमरी, हाथ म तेंदूसार के लउठी ह सउँहत किसन भगवान के दरसन करा देथे। सुआ पाँखी लूगरा पहिरे सुवा, ददरिया गावत मोटियारी मन ल मोह लेथे। बाबू जात के हाथ के ढेरकऊवाँ, कान के बारी अउ माई लोगन के हाथ के अइँठी, अँगरी के मुँदरी, गोड़ के पइरी, कड़ा बिछिया, गर के सुँता, तुर्रा, गजरा, बइहाँ के पहुँची, कनिहा के करधन, कान म खिनवा पहिरे दाई-बहिनी मन ल देख के लागथे सिरतोन म जम्मो गहना-गुरिया ल सिंगार के लछमी दाई ह सउँहत हमर छत्तिसगढ़ म बइठे हावय। तभे तो छत्तिसगढ़ ल ''धान के कटोरा'' केहे जाथे। गमछा, लुँहगी, बंडी म लपटाय बनिहार किसनहा मन धरती दाई के सेवा बजावत घातेच सुग्घर लागथे। लुगरा, पोलखा पहिरे मुड़ ल ढाँके दाई-दीदी मन ल देखके लागथे कि जम्मो भारत भर के इात अउ संस्कार ह इही छत्तिसगढ़ म बसे हावय। 

जउन किसम ले हम छत्तिसगढ़िया मन के जम्मो रासा-बासा अलग हावय उही किसम ले हमर खानपान घलो अलग हावय। बटकी म बासी चुटकी म नून निहीं त नून अउ मिरचा के भुरका चटनी कोन छत्तिसगढ़िया ल नई सुहावय। तिंवरा भाजी के गुरतुर सुवाद तो हमिच मन लेथन। देवारी के फरा, होरी के अइरसा, तीजा के ठेठरी-खुरमी, हरेली के चीला कस खाजी, रोटी-पीठा भला हमर छोंड़ दुसर मन देखे होहीं? तभे तो हम धरती म सोना उपजाए के ताकत राखथन। अथान, चटनी के ममहई ह मुहूँ म पानी लान देथे। चना-बटुरा अऊ तिवरा के होरा, तेंदू-चार के पाका, जिमीकाँदा के खोईला, रखिया के बरी के सुवाद ल हम छत्तिसगढ़िया ल छोंड़ के कोनो दूसर पाय होही? 

जम्मो छत्तिसगढ़ के दरसन तो सिरिफ इहाँ के लोककला म देखे बर मिलथे। रात भर गली के धुर्रा-माटी म रमंज-रमंज के हँसई ह मनोरंजन संग गियान के भंडार घलो होथे। सुवा, करमा, ददरिया, राऊत नाचा, पंथी ह तो इहाँ के थाती आय। ढोला-मारू, लोरिक चंदा ह इहाँ परेम के संदेस देथे त भरथरी, पंडवानी ह भक्ति भाव म बुड़ो देथे। ये सब हमर लोक कला के नकल कोनो नई कर सकय। भला हमर पंडवानी ल कोनो हिन्दी, अंगेरजी म गा सकत हें का? समे के संग अब यहू मन छत्तिसगढ़ के इतिहास बनतेच जात हे। हमन दूसरे के देखा-सीखी नकल उतार-उतार के एकर सुद्‌धता बिगाड़ के ''धोबी के कुकुर कस घर के न घाट के'' बरोबर बना डारत हन। आजकल छत्तिसगढ़ी एलबम ह तो बम गिरातेच हावय अउ छालीवुड ह तो इहाँ के संसकिरती के, लोककला के फोकला निकालत हावय। 

हमर देस लोकतंतर देस हाबय। हम ल जम्मो धरम ल माने के अधिकार, भाखा, खाए-पिए के हक हावय। त एकर पाछू इहाँ के संसकिरती, भाखा ल खिचरी बना देबो का? इहाँ के बिहाव के नेंग-जोग, चुलमाटी, पस्तेला, भड़ौनी, छट्ठी-बरही जेन ल मेटाय बर हमन हमरेच गोड़ म टँगिया मारत हन। इहाँ के जम्मो चिनहा बाखा, संस्कार ल हमर हाथ म गँवावत जावत हन त काल के दिन म ये सब ल गोड़ म खोजबो त पाबो? का छत्तिसगढ़ के इही दुरगति करे बर हमन छत्तिसगढ़ म जनम धरे हन? का हमन ल छत्तिसगढ़िया कहाए बर, छत्तिसगढ़ी बोले बर सरम लागथे? ''घर जोगी जोगड़ा'' कस ये भुइयाँ के हाल होवत जात हे। कभू सोंचे हन एमा हमर कतका हाथ हे? का ए भाखा, संसकिरिति ल सहेज के राखे के जुवाबदारी हमर नई बनय? का ए भाखा, संसकिरिति ह देहतिया, गँवईहा मन के चिन्हारी आय? का हमन हमर भाखा, संसकिरिति लोककला ल दूसर भाखा-बोली, पहिराव, ओढ़ाव, संसकार संग मिंझार के ''दार-भात खिचरी'' बना देबो? फेर हमर का चिन्हारी रइही? अगर दार-भात खिचरी बनानच हे त अपन भाखा के, बोली के लोककला के, संसकिरिति के, खान-पान के, पहिराव-ओढ़ाव के खिचरी बनावन अउ छत्तिसगढ़ के आत्मा ल जियत राखन। 
जोहार छत्तिसगढ़।
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भागीरथी आदित्य, ग्राम-अन्दोरा, गरियाबंद 









शनिवार, 9 जनवरी 2016

कविता के थरहा- बिसम्भर यादव ‘मरहा’

बिसम्भर यादव ‘मरहा’
बिना पढ़े लिखे अउ बिना लिखित संग्रह के अनगिनत रचना मुँहुअखरा होना बड़ अचरच के बात आए। एला माता सरसती के किरपा अउ कवि के लगन, त्याग-तपसिया अऊ साधना के परिनाम केहे जही मंच म खड़ा होके सरलग 8-10 घण्टा कविता पाठ करना कउनो हाँसी ठट्ठा नोहे फेर “मरहा’’ जी हा ए रिकार्ड बनइस तहाँ ले कई जघा “मरहा’’ नाइट के आयोजन घलो करे गिस। बच्छर के 365 दिन मा 300 दिन कवि सम्मेलन के मंच मा रहय। “मरहा’’ जी हा कतको धारमिक, अध्यात्मिक अउ समाजिक आयोजन मा अकेल्ला कवि पाठ
करय। तकरीबन 65-70 साल के उम्मर तक साइकिल के केरियल मा बेग ला दबा के पूरा छत्तीसगढ़ ला घुमे रिहिस। कभ्भू पइसा कउड़ी के बात नइ करय। तारिक वाले पाकिट डायरी ला जेब मा रखे रहय साल भर के एडवांस बुकिग चलय। सरल, सादगी जिनगी, नसा पानी ले कोसों दूर, चाय तक ला घलो नइ पियय। एकरे सेती दाँत, कान अऊ आँखी जियत भर ले सलामत रिहिस। मंच के परस्तुति अइसन रहय के कउनों सुनइया असकट नइ मरय अऊ टस ले मस नइ होवय।
मरहा के कविता मा हाँसी ठट्ठा के लहजा देखे ला मिलय तेखरे सेती सुनइया मन हाँसय अउ ताली बजावय (थपड़ी पिटय)। कविता के भाव के संग “मरहा’’ जी हा एकसन मिलावय कवि अऊ सोरोता के तार सरलग एके मा जुड़े रहय। कविता रचे के पाछु एकेच ठन सोच रिहिस। समाज सुधार के, फेर जर बुखार ला टोरे बर कुनेन खवाय के पहिली मंदरस चटाय बर परथे। वइसनेच बियंग के ठोसरा मारे के पहिली गुदगुदावय अउ हँसवावय। ओखर कविता नानकुन लइका ला लेके बुढ़वा-सियान तक बर रहय। कविता पाठ सुरू करे के पहिली गायितरी मंत्र अउ माता सरसती के बन्दना करय। लइका मन बर बाजा मनके गोठ-बात कविता मा तमूरा तार के अवाज गजब ढंग ले निकालय। जे ला सुन के सब हाँसी के मारे सब लोट-पोट हो जावय। घर-परिवार, सास-बहु, बेटी-बेटा, राजा-परजा, परोसिन-मितान के हुबहु दरसन मिलथे। चारा अऊ मछरी के गोठ बात जइसन रचना के माध्यम ले मनखे ला सुधरे अउ लोक-परलोक बनाय के सीख देवय। केहे जाथे सियान मन के चुँदी हा घाम म निहीं बल्कि तजुरबा अऊ अनुभव मा पाकथे, अपन सपूरन जिनगी के अनुभव ला कविता मा बाँटिस। येदे रचना मा ऐ बात के झलक देखे बर मिलथे- नाचा वाले ल अवघट मा तीन झन चोर मन छेंक लिस, उँखर मोटरा-चोटरा ला खोधिया के देखिस कुछु माल-मत्ता नइ मिलीस त खिसिया के बंदुक ला टेका के नाचे बर किहिस। जीव के डर म नाचा वाले मन नाचे ला लागिन फेर नौ झन नचइया अऊ तीन झन देखइया कहाँ ले मजा आही जोक्कड़ मनिज्जर ह बड़ हुसियार रिहिस ऐ बिपत्ति ले निपटे के उदिम सोचिस अउ साखी बनाके बोलिस-तबला बाजे धिन-धिन, मंजीरा बाजे किन-किन।
एकेक झन ल तिन-तिन, एकेक झन ल तिन-तिन ॥

नाचा वाले मन इसारा ला समझ के एकेक झन चोर ऊपर तीन-तीन झन झुमिन अऊ उँखर छति-गति ला करिन।
देसभक्ति कविता ल पढ़य त सुनइया मन के रुआँ ठाढ़ हो जाय। सैंकड़ों बलिदानी सहिद मन के लयबद्ध सरसपाट बोल ल सुनके साँस रूके असन लगे… खून खऊल जाय। देस के माटी बर जिये अऊ मरे के गोठ ल बहुँतेच असरदार ढंग ले करे फेर भरस्टाचार के खिलाफ नेता मन ला अनुसासित अऊ सिस्ट ढंग ले बेखौफ दहाड़े। काखरो डर तरास नइ घेपय (पंच से लेकर परधानमंतरी तक बइमान हे) अइसे कहय अउ चैलेंज करे। मेहा गलत बोलत होहूँ त मोला जेल भेजवाव। ‘मरहा’ ओखर उपनाम हरय जउन हा जादा प्रचलित होगे। केहे जथे जथा नाम तथा गुन, दुबर-पातर देंह हा “मरहा’’ के नाम मा सउँहत फभे, “मरहा’’ जी अपन कविता मा भरस्टाचारी परखत्ता मन ला साँड़-गोल्लर के संगिया देय अउ सदाचारी जीवन बितइया आम जन जेन हा लुट अउ सोसन के सिकार होथे ओखर प्रतिनिधित्व “मरहा’’ करे। जेखरे सेती हमर छत्तिसगड़ के महान संत कवि पवन दिवान हा टेमरी गाँव के एक कवि सम्मेलन के मंच म बिसम्भर यादव के कविता “मरहा’’ के आँसू ल सुन के ओखर टाइटिल “मरहा’’ रखदिस अऊ ए जन कवि हा “मरहा’’ के नाम ले जग जाहरित होगे। मोला “मरहा’’ जी के संग कवि सम्मेलन के डेढ़ सौ मंच मा सँघरे के मउका लगे रिहिस संचालन करत मंच म आमंतरित करँव त ओखर सम्मान मा बोलँव-
गोल्लर कस भुँकरत हे चर-चर के हरहा।




सही मायने मा समाज के पीरा ला गोहरइया जनहित बर जियइया हा बहुत बड़े माने जाथे सादा जीवन उच्च विचार ला आत्मसात करे रिहिस बरम्हलीन स्वामी सुजनानंद जी महराज विमल वैदिक सेवा आश्रम पैरी के सानिध्य पाके समाज सुधार के बीड़ा उठाय के संकल्प लेइस अँचल म अइसे कउनो बिद्वान साधू-संत महापुरुस नइ बाँचिस होही जेखर संगति नइ करिस होही। कवि के साथ-साथ जाने माने रंगकरमी घलो रिहिस चंदैनी-गोंदा अऊ कारी लोक नाट्य मा जेखर अभिनय देखे ला मिलथे। संतोसी सदा सुखी ओखर जीवन के मूलमंत्र रिहिस बहुत कम साधन मा जीवन गुजारे के प्रयास करय सादा धोती-कुरता के संग हाफ जाकिट जेमा सम्मान मा मिले मेडल मन ला गुथे रहय। जेहा ओखर बिसेस पहिचान रहय। जउन घर मा ठहरय उहाँ के बहू-बेटी संग गोठियाय-बतराय अऊ असीस देय बिना उहाँ ले नइ टरे। कवि भाई मन ले परिवारिक नत्ता जोड़य, दुख-सुख के चिंता करय। अवसान के एक महिना पहिली ओखर घर मा मुलाकात करे बर गे रेहेंव उठे-बइठे के गतर नइ रिहिस खटिया म सुते-सुते किहिस इच्छा मृत्यु होतिस त मय मर जातेंव। अब जिये के साद नइ हे फेर भीसमपितामह ल इच्छा मृत्यु रेहे के बाद घलो बान के सइया म सुते ला पड़ीस। मोर संतान नइ होय के ओला घात चिंता रिहिस मोर हाल-चाल पुछीस त बताय हँव कि नवा सगा अवइया हे… त तपाक ले पुछिस नोनी हरे ते बाबू..! मय केहेंव आने वाला हे। आसीरबाद देबे तभे सरग जाबे। 
तारिख 3 अगस्त 2011 सनिच्चर के रात 9 बजे मोर घर बेटा जन्मीस, उही अठोरिया सनिच्चर 10 अगस्त 2011 के रात 9 बजे 80 बरस के उमर मा परलोक सिधारिस। नाम्ही साहितकार मन घर म जाके आखरी भेंट करिन अउ दुख के बेरा मा उँखर परवार ल ढाँढस बँधइन। काठी म गाँव वाले अऊ सगा सोदर संग कविमन घलो संघरे रिहिन जिहाँ देखे बर मिलिस, दु-तीन बच्छर के जुन्ना आदमकद के बर रूख ला गमलासुद्धा उठाके मरघट्ठी मा लेगे रिहिस, जउन ला काँटा मा चमाचम रूँधा करके जगोइन। मर के घलो मनखे ला रूख लगाय के संदेस दिस। जियत ले घूम-घूम के उपदेस बाँटिन अऊ अपनो ऊपर घलो लागू करिस। ये हा समाज बर बहुँत बड़े सीख आय। निमगा ग्यान बँटइ के कउनो मोल नइ हे। वो गियान ल अपन आचरन म उतारना घलो जरूरी रहिथे। “मरहा’’ जी के जिनगी मा ये बात परगट रूप ले दिखथे। का भइस ओखर जिनगी के दिया ह सुन्ना म बुतागे। समाज अऊ सरकार डाहर ले जादा सोर-गोहार नइ करिस, फेर मोला पक्का बिसवाँस हे कि उँखर सिरजे कविता के एक-एक सब्द, एक-एक बोल ह समाज म अँजोरी बगराके जम्मो मइनखे ला बने रद्दा देखाही।
- केशव राम साहू
गुण्डरदेही, जिला-बालोद (छ.ग.)
मोबा. 9993291095

रविवार, 22 नवंबर 2015

मनखे बर बरदान... तुलसी के बिरवा

संगवारी हो हमर संस्किरिति अऊ परमपरा म रूख.राई के बड़ महातम बताय गे हे। वो रूख-राई म तुलसी के बिरवा हे जेकर नाव घलो ल बड़ पबरित के साथ लेय जाथे। जम्मो बिरवा म तुलसी के बिरवा ल परमुख बताय गे हे। हमर घर म माइलोगन मन तुलसी के बिरवा के पूजा-पाठ कई जुग ले करत आवत हे। तुलसी के बिरवा हिन्दुमन के अलावा बौद्ध, जैन अऊ सिख धरम म समान रूप ले सनमानित हे। पराचीन संत के संगे-संग पुरान अऊ नीति सास्त्र के लोककथा मन म तुलसी के बरनन घातेच मिलथे। ग्रीस के चर्च म तुलसी
के पूजा आज भी होथे अऊ सेंत बिजली जयंती के दिन तुलसी के परसाद ल माइलोगन घर-घर म बगराथे। पुरान के कथा अनसार सागर मंथन म चउदा रतन निकलिस जेमा एक तुलसी घलो रिहिस तुलसी म लवछमी के निवास होथे एकरे सेति पंचामरित य तुलसी के दल डाले जथे। माने जथे के भगवान बिन तुलसी के कोनो परसाद ल गरहन नई करय। तुलसी के महिमा के बखान करत गाँव के माइलोगन गीत गाथे के- 
‘‘पानमंजरी काढा बनाबो जरी पेंड़ कंठी माला। 
तोर महिमा ल गाबो जय हो उसी माता।।’’ 

पदमपुरान के अनुसार जे घर म तुलसी के बिरवा हाबे उहाँ तिरदेव बरमहा, बिस्नु अऊ महेस के बास होथे। तुलसी के जरी म जम्मो तीरथ, बीच म जम्मो देवता अऊ उपर के डारा म जम्मो बेद के निवास माने गे हे। संस्किरित म तुलसी ल ‘‘हरिपिरया’’ केहे गेहे। पुरान के कथा के अनुसार राजा भिरगु ले नारद केहे रिहिस के तुलसी के बिरवा के पुजा करे ले ओतके कन फल मिलथे जतका गंगा नहाय म। मरनी के बेरा म जेन मनखे ह तुलसी के बिरवा तीर अपन परान तियागही ओला जमराज ह नई देख पाय चाहे मनखे कतको पापी राहय। बरम्हवैबर्त पुरान म बताय गेहे -

‘‘त्रिलोकेषु च गुल्घाणं वृक्षाणां देवं पुजने।
प्रधान रूपा तुलसी भविष्यति वरानने।।’’

संगवारी हो एखर मतलब हे के तीनो लोक म जतका बिरवा हे ओ जम्मो म तुलसी सरेस्ठ हे। पुरान म तुलसी ल भगवान किरिस्न धरमपत्नि केहे गे हे एकरे सेती हर जग, हवन, उपासना अऊ पुजा-पाठ म तुलसी जरूरी हे। तुलसी के बिरवा अँगना के न सिरफ सोभा बढाथे बल्कि घर के मनखे मन ल सुद्ध हवा घलो देथे। तुलसी, पीपर, बर अऊ लीम ए चारो रूख ह रतिहा म घलो आकसिजन देथे बाकी जम्मो रूख-राई मन रतिहा कारबन डाइ आकसाइड छोंरथे। एकरे सेती ए चारो रूख धारमिक महत्व के संगे-संग अधयातमिक महत्व घलो राखथे। नारद पुरान म केहे गेहे के हुलसी के बिरवा ल पानी अरपित करइया, तुलसी के जरी करा के माटी के टिका लगइया, तुलसी के चारोखुँट काँटा के घेरा करइया अऊ तुलसी के पत्ता ले भगवान बिस्नु के पुजा करइया ल जनम-मरन के चक्कर ले मुक्ति मिल जथे। बाहनमन ल तुलसीदल अरपित करे ले तीन पीढ़ी तक ले बरम्हलोक म जघा मिलथे। तुलसी के अतेक महातम के एला जुठा हाथ म छूए तक नई जाय। परसाद के साथ तुलसीदल के परयोेग सुभ फलदाईं माने जथे। जऊन घर म तुलसी के बिरवा रइथे। वो घर म सुख, समरिद्धि, सांति अऊ संपननता रइथे। घर के वास्तु दोस ह घलो तुलसी के बिरवा लगाय ले सिरा जथे। तुलसी के पत्ती म कईठन गुन समाय रहिथे। मलेरिया के हवा ल सिरवाय बर तुलसी के पत्ती रामबान आवय। 

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दिनेश रोहित चतुर्वेदी
खोखरा, जांजगीर

शनिवार, 21 फ़रवरी 2015

छत्तीसगढ़ धान का कटोरा है

कारण और निदान

कर्म संस्कृति का जनक है और संवाहक भी। व्यक्तिसः या सामूहिक रुप से किये गये धर्मनिष्ठ कर्म का कालान्तर में पुनरावृत्ति होते रहने से सांस्कृतिक अस्तित्व का आविर्भाव होता है। ऐसे बहुत से कर्म हैं जिसे हम कर्तव्य निर्वहन, हित संवर्धन या मानवता की वेदी पर रखकर जाने-अनजाने संपादित तो करते हैं, किंतु उनका
दूरगामी परिणाम इतना सुखद और लोक-मंगलकारी होगा, इसकी कल्पना भी नहीं किये होते हैं। कुछ ऐसी ही एक घटना इतिहास के गर्भ में छुपी हुई है, जिसके कारण छत्तीसगढ़ “धान का कटोरा” बन गया। कविवर श्री लक्ष्मण मस्तुरिया का गीत मोर छत्तीसगढ़ ला कहिथे भइया “धान के कटोरा”, इसे वर्तमान में जन-जन तक रमा दिया है। 
पूरी दुनिया में छत्तीसगढ़ ही एक ऐसा प्रदेश है जिसे “धान का कटोरा से संबोधित किया जाता है। इस प्रकार का संबोधन अन्य देश या प्रदेश के लिए नहीं मिलता। एक दूसरा संबोधन - उत्तरी अमेरिका के प्रेयरी प्रदेश के लिये है। उसे “रोटी की टोकरी” कहा जाता है। प्रेयरी प्रदेश “रोटी की टोकरी” है तो छत्तीसगढ़ “धान का कटोरा”। इन दोनों शब्दों के वजन और अर्थगत अंतर से आप सभी भलीभाँति परिचित हैं, तथापि अंतरपक्ष पर विहंगम दृष्टि डालने पर -
  • “कटोरा” धातु निर्मित होता है, इस कारण यह काफी मजबूत, वजनी और मूल्यवान होता है, किंतु “टोकरी” बाँस से बनी होने के कारण कमजोर, हल्की और सस्ती होती है। 
  • “रोटी की टोकरी” से आशय है- गेहूँ उत्पादक क्षेत्र और “धान का कटोरा” से आशय धान उत्पादक क्षेत्र से है। धान के फसल के लिए खेत में पानी देर तक भरा रहना चाहिये। इसलिये धान क्षेत्र के लिए “कटोरा” और गेहूँ फसल के लिये जमीन में केवल नमी चाहिये। इसलिये गेहूँ क्षेत्र के लिये “टोकरी” शब्द का उपयोग पूर्वजों द्वारा किया गया है। क्योंकि “कटोरा” में भरा हुआ पानी देर तक रहता है और “टोकरी” में पानी भरें भी तो वह शीघ्र रीस जाता है। दोनों प्रदेशों की भौगोलिक स्थितियाँ ठीक इसके अनुकूल हैं। 
  • कीमत की दृष्टि से धान मँहगा अनाज है। गेहूँ धान की तुलना में सस्ता है। 
  • धान में भरण-पोषण की क्षमता अधिक होती है। प्रति एकड़ उत्पादन भी अधिक होता है। परिणाम स्वरूप धान उत्पादक क्षेत्र धन-जन से सुसंपन्न होते हैं, जबकि गेहूँ में भरण-पोषण की क्षमता कम तथा प्रति एकड़ उत्पादन भी कम होने के कारण वहाँ की स्थिति धन-जन से कमजोर होती है। 
इस प्रकार छत्तीसगढ़ भारत-माता की गोद पर बसा विश्व का एक ऐसा महान प्रदेश है जिसे “धान का कटोरा” जैसे संपन्नता बोधक शब्द से नवाजा गया है। तभी तो लक्ष्मण मस्तुरिया अपने गीत में आगे कहते हैं- लक्ष्मी दाई के कोरा भइया, “धान के कटोरा”। 

प्रश्न अब भी अपने जगह पर स्थिर है कि छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा होने का गौरव कैसे प्राप्त हुआ ? इसका रहस्य इस ऐतिहासिक घटना के गर्भ में निहित है। 

इस वसुंधरा पर भगवान का अवतार किसी कारण विशेष के निमित्त ही नहीं प्रत्युत अनेकानेक कारणों से होते हैं। उन समस्त कारणों के मूल में जनकल्याण एवं धर्म स्थापना की भावना होती है। इसी तारतम्य में एक बार धर्म स्थापना एवं जनकल्याण के निमित्त भगवान शंकर भगवती सती के साथ ग्राम चौरेल के गौरैया प्राँगण में पधारकर लीला सम्पन्न किये। यह लीला प्रचलित किवदंतियों पर आधारित त्रेतायुगीन है। 

त्रेतायुग में तपस्वी वेशधारी एवं पत्नी-वियोग से व्यथित श्रीरामचंद्र जी को देखकर भगवती सती को उनके सच्चिदानंद होने पर संदेह उत्पन्न हो गया। इस संदेह के निवारणार्थ जब भगवान शंकर ने परीक्षा लेने की बात कही तो भगवती सती ने सीता का रूप धारण कर श्रीरामचंद्र जी की परीक्षा ली। इस घटना के पश्चात भगवान शंकर और सती इसी “गौरैया” स्थान पर पधारे। 

संध्याकालीन भोजन हेतु भगवती सती चावल चुनकर जल लेने बावली चली गईं। भगवान शंकर समय का उपयोग करते हुए ध्यान में बैठ गये। जब सती जल लेकर वापस लौटीं तो देखती हैं कि- गौरैया नामक चिड़िया चुने हुए चावल को चुग रही है। सती के पास आने पर गौरैया चिड़िया अपने चोंच में कुछ दाने दबाकर उड़ गई। देखने में यह घटना बहुत छोटी और सामान्य लगती है, किंतु चिड़िया के इस कार्य से भगवती सती धर्म-संकट में पड़ गईं। चावल चिड़िया द्वारा जूठा कर दिया गया। जूठे चावल को जान बूझकर स्वामी को खिलाना धर्म विरुद्ध है और दूसरा चावल भी नहीं है जिससे भोजन बनाया जा सके। स्वामी को बिना भोजन कराये भूखे विश्राम कराना भी पत्नी धर्म के विरुद्ध है। इस धर्म संकट का मूल कारण चावल चूगने वाली गौरैया चिड़िया थी। इस कारण उस चिड़िया के इस व्यवहार से क्षुब्ध भगवती सती माता ने धर्म-संकट के निवारणार्थ भगवान शंकर से प्रार्थना करने लगी। इससे भगवान शंकर का ध्यान भंग हो गया सती माता ने पूरा वृतांत सुनाकर नारी धर्म निर्वाह के मार्ग में उत्पन्न समस्या का समाधान करने तथा उस चिड़िया से चावल वापस लाने के लिये निवेदन की। चावल के वापस नहीं आने से क्षेत्रवासियों के समक्ष क्षुधा पूर्ति की विकट समस्या आ जाती। भगवान शंकर ने सती के वचनों में जनकल्याण की पवित्र भावना देखकर अपना तीसरा नेत्र खोल दिया। वहाँ से क्रोध का जन्म हुआ जो गौरैया चिड़िया का पीछा करने लगा। 

गौरैया चिड़िया तब तक काँकेर की उत्तरी पहाड़ी तक पहुँच चुकी थी। वहाँ देवपरियाँ संध्या भ्रमण कर रही थी। उनके पास जाकर गौरैया चिड़िया त्राहिमाम! त्राहिमाम!! क्रंदन करने लगी। 

देवपरियाँ असहाय चिड़िया की करुण पुकार सुनकर रुक गई। प्रथम देवपरी कौतुहलवश पूछने लगी -क्या बात है ? किससे रक्षा? कौन सा संकट?

चिड़िया- भगवान शंकर जी के क्रोध से रक्षा। मेरे प्राण-रक्षा का संकट, देवियों ! 

दुसरी देवपरी- भगवान शंकर के क्रोध से तुम्हारी रक्षा? तुम्हारे प्राण का संकट ? बात समझ नहीं आ रही है, स्पष्ट करो। 

चिड़िया- आप सभी देख रहे है मै एक छोटी सी चिड़िया हूँ। मुझे गौरैया के नाम से जानते हैं। मेरा जीवन प्रकृति पर आधारित है। प्रकृति द्वारा जो मेरे भोजन के योग्य मिलता है वही मेरा भोजन होता है। आज मुझे चावल मिला। मैं उसे खा ही रही थी कि माता सती आ पहुँचीं। मुझे क्या पता था कि माता सती ने भोजन पकाने के लिए उसे चुन कर रखी हैं। मुझे चावल चुगते हुए देखकर चावल जूठा हो जाने की बात को नारी धर्म पालन मे अवरोध उत्पन्न होने का विषय बना लीं, और भगवान शंकर का ध्यान भंग कर धर्म पालन करने के लिये मार्ग प्रशस्त करने का हठ करने लगीं। भगवान शंकर का तीसरा नेत्र खुल गया। जिससे उत्पन्न क्रोध मेरा पीछा कर रहा है। मेरी रक्षा कीजिये। 

तीसरी देवपरी- प्रकृति आधारित दैनिक क्रियाओं पर सामान्य व्यक्ति भी क्रोध नहीं करता। भगवान शंकर कैसे क्रोधित होंगे ? 

प्रथम देवपरी - हाँ गौरैया ! यह कैसे संभव है? भगवान तो करुणानिधान हैं, क्रोध कैसे करेंगें। 

चिड़िया - पर सच्चाई तो यही है देवियों। मैं क्या करूँ ? 

तीसरी देवपरी - अगर तुम्हारी बातें सत्य हैं तो इस घटना के पीछे कोई लीला का आभाश होता है। इस लीला के लिए तुम निमित्त बनी हो तो इसे अपना सौभाग्य मानो गौरैया; भगवान शंकर के शरण में जाओ। 

पहली और दूसरी परी - हाँ गौरैया ! भगवान शंकर के शरण में जाओ, तुम्हारा अवश्य कल्याण होगा। 

चिड़िया- जैसी आप लोगों की आज्ञा। 

देवपरियों से चर्चा के दौरान चिड़िया की चोंच में दबा चावल जमीन पर गिर गया। अब तक क्रोध गौरैया चिड़िया के पास तक पहुँच चुका था। जब उसे अपने गिरफ्त मे लिया तो क्रोध के ताप से चिड़िया का शरीर झुलसने लगा। ब्याकुल होकर चिड़िया भगवान शंकर का स्मरण कर बोली - हे देवाधिदेव ! मुझे अपने शरण में लीजिये। मेरे प्राण की रक्षा कीजिये। मेरी गलतियों पर मुझे क्षमा कीजिये प्रभु !

इस प्रकार भगवान शंकर के शरणागत होते ही गौरैया चिड़िया की शारीरिक व्याकुलता समाप्त हो गई और क्रोध के साथ जाने लगी। इस किवदंती के अनुसार पूर्व में गौरैया चिड़िया का रंग सफेद था, किंतु क्रोध के ताप के प्रभाव से उसका पंख हल्का भूरा और काला हुआ है। ज्ञातव्य है कि गौरैया चिड़िया को ब्राह्मण पक्षी भी कहा जाता है। ब्राहमणों की धर्मपरायण्ता, न्याय प्रियता एवं पवित्रता का भाव प्रथमतः उनके स्वेत वस्त्रों से सूचित होता है। कुछ ऐसे ही भाव से गौरैया चिड़िया को उनके श्वेत वर्ण और गृहों में वास करने के कारण ब्राह्मण पक्षी तो आज भी कहा जाता है, किंतु उनका वर्ण इस घटना के बाद से बदल गया। 

गौरैया चिड़िया त्राहिमाम् ! त्राहिमाम्! करती हुई भगवान शंकर और माता सती के समक्ष उपस्थित हुई। भगवान शंकर ने सती को प्रश्न भरे नजरों से देखा तो माता सती ने अपनी योग शक्ति से एक नारी प्रतिमा को अवतरित किया और उस प्रतिमा को प्राण-दान देने के लिये भगवान शंकर से निवेदन की। भगवान शंकर ने उस प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा की और पूरे क्षेत्र में अधिष्ठात्री देवी के रूप में पूज्य होने का आशीर्वचन प्रदान किया। 

भगवान शंकर अर्थात्‌ गोंड़ जाति का ईष्ट देव “गौरा” तथा सती अर्थात “गौरी” दोनों की दिव्य शक्ति से उत्पन्न होने के कारण उसे “देवी गौरैया माता” के नाम से प्रसिद्धि मिली। ज्ञातव्य है कि सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ दंडकारण्य का महत्वपूर्ण अंग रहा है। दंडकारण्य गोंडवाना प्रदेश में आता है यहाँ गोंड़ जाति की बहुलता रही है। गोंड़ जाति में आज भी गौरी-गौरा की पूजा एवं विवाहोत्सव बड़े धूमधाम के साथ दीपावली की रात को मनाया जाता है, जिसमें सभी ग्राम एवं नगरवासी शामिल होते हैं। इस देवी के अवतरण का कारण गौरैया चिड़िया रही है। इस कारण चिड़िया के नाम के आधार पर भी “देवी गौरैया माता” के नाम से विख्यात हुई ऐसा माना जा सकता है। माता सती ने भगवान से पुनः निवेदन की- “हे स्वामी ! इस क्षेत्रवासीयों के जीवन निर्वाहक सामाग्री चावल को गौरैया चिड़िया द्वारा उठा लिया गया है। इससे क्षेत्रवासी अतृप्त क्षुधा से ग्रसित हो जायेंगे। उनकी भोजन व्यवस्था का उपाय कीजिये।” 

भगवान शंकर लोककल्याण की भावना देखकर तनिक मुस्काए, फिर गौरैया चिड़िया के चोंच से गिरे हुए चावल को आशीष देते हुए कहा- तुम उसी स्थान से नदी के रूप में प्रवाहित होकर देवी गौरैया का पग-प्रक्षालन करते रहोगे। देवी गौरैया के चरण-स्पर्श होने पर तुम्हारे जल का जहाँ तक विस्तार होगा वह पूरा क्षेत्र चावल उत्पादन के लिए प्रसिद्ध होगा। 

इस प्रकार नदी की उत्पत्ति चावल के गिरे हुए दानों से हुई मानी जाती है। चावल को संस्कृत में “ताँदुल” कहा जाता है। इस कारण नदी का नाम “ताँदुला” पड़ा। 

ज्ञातव्य है कि ताँदुला, शिवनाथ नदी तथा शिवनाथ महानदी की सहायक नदी है। महानदी बेसीन संपूर्ण छत्तीसगढ़ में फैले होने के कारण ताँदुला का जल संपूर्ण छत्तीसगढ़ में सिंचित होता है। इस कारण देश में सर्वाधिक चावल का उत्पादन छत्तीसगढ़ में होता है। संभवतः यही कारण है कि छत्तीसगढ़ को “धान का कटोरा” होने का गौरव प्राप्त हुआ है। 

देवी गौरैया माता का यह पावन प्रांगण ग्राम-चौरेल की पूर्वी सीमा पर स्थित है। प्रांगण के पूर्वी भाग से ताँदुला नदी प्रवाहित होती है, जो वास्तु के विचार से अत्यंत उत्तम है। 

“चौरेल” का अर्थ है- चावल+रेला (प्रचुरता) अर्थात जहाँ प्रचुर मात्रा में चावल होता हो। बुजुर्गों के अनुसार चौरेल के चावल की प्रसिद्धि बालोद, दुर्ग, राजनादगाँव, बेमेतरा, और कबीरधाम जिले तक फैली हुई थी, किंतु वर्तमान वैज्ञानिक उर्वरकों एवं औषधियों के प्रयोग से स्थिति में अब परिर्वतन मिलता है। 

एक दूसरी किवंदती के अनुसार चौरेल का प्राचीन नाम “चौरागढ़” था। यहाँ चौरस नामक सम्राट का साम्राज्य था। उस सम्राट का विवाह “बोड़की” नामक कन्या से हुआ था। बोड़की रामायण की शबरी जिसने भगवान श्रीरामचंद्र जी को जूठे बेर खिलाई थी, की सगी बहन थी। बोड़की की प्रतिमा चौरेल भाँठा (मैदान) में आज भी अनगढ़ शिला-रूप में स्थित है। उस मैदान को “बोड़कई भाँठा” के नाम से जाना जाता है, चूँकि बोड़की भील जाति की आदिवासी महिला थी। आदिवासियों की प्रवृत्ति के अनुरूप बोड़की की प्रवृत्ति भी मदिरापान करने की रही होगी। शायद इसी कारण बोड़कई भाँठा में महुआ वृक्षों की अधिकता रही हो, जो आज भी आंशिक रूप में मिलता है, किंतु उस मैदान को “मउहारी भाँठा” न कहकर “बोड़कई भाँठा” के नाम से जाना जाता है, क्योंकि उसी मैदान पर संभवतः बोड़की का निवास भवन रहा हो। “चौरस” नामक सम्राट के नाम पर इस राजधानी का नाम “चौरागढ़” पड़ा था, जो अब परिवर्तित होकर “चौरेल” के नाम से जाना जाता है। यह चौरेल, गुण्डरदेही-विकासखण्ड, जिला-बालोद में स्थित है। 

इस प्रकार भगवान की अमृत कथा को अपने हृदय में सहेज कर रखने वाले चुनिंदा स्थानों में एक नाम चौरेल भी है, जहाँ माँ गौरैया वास करती हैं। 
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चंद्रकुमार चंद्राकर, अर्जुन्दा





गुरुवार, 4 सितंबर 2014

''दार-भात खिचरी''

मोर भाखा कतेक गुरतुर, कतेक मिठास ये बात ल तो सिरिफ छत्तीसगढ़ियाच मन हर जानथंय। जम्मो भाखा बोली ले सुरहि गाय कस सिधवी बिन कपट के निच्चट सांत रूप म हावय। ''अंधवा जभे खीर खाथे तभे, पतियाथे।'' इही कहावत ह मोर छत्तीसगढ़ी भाखा ऊपर बरोबर बईठय। बोले म रमायन, गीता के बानी कस, सुने म महतारी के लोरी कस दुलार हावय हमर छत्तीसगढ़ी भाखा म। नवा दुलहिन के पइरी के घुंघरू कस नीक भाखा म करमा, ददरिया, चंदैनी के सुर म मादर, ढोलक, गड़वा बाजा के थाप ह परथे त लागथे ए छत्तीसगढ़ी भाखा बोली ह जम्मो भाखा बोली ल पचर्रा बना
दिस। ए भाखा के नावेच हावय छत्तीसगढ़ी! छत्तीस आगर छत्तीस कोरी मनखे मन मिलके ए भाखा ल गढ़े होंही तभे छत्तीसगढ़ी भाखा बोली नोहय, ए ह हमर छत्तीसगढ़ के जम्मो संसकिरती के दरसन आय। ऐंठी, तुर्रा, गजरा, पंडवानी, बिहाव-भड़ौनी, कमरा-खुमरी, नोई दुहना, के चिन्हार, इही छत्तीसगढ़ी भाखा ह कराथे। ए भाखा ह तो छत्तीसगढ़ के परान आय। जेन दिन ए भाखा नंदा जाही वो दिन छत्तीसगढ़ घलो मेटा जाही।

संस्कृति अउ तिहार ह तो छत्तीसगढ़ के माई तिजोरी म भरे हावय। माता पहुंचनी के सीतला पूजा, अक्ती, ठाकुर देव पूजा सांहड़ा देव पूजा, देवारी के गौरी-गौरा, घरो घर घूमत छेरछेरा मंगइया के होली, मेला-मड़ई जइसन या पिरीत। अउ अपन आस्था ले जुड़े अइसन तिहार कोनो जगा देखे बर नई मिलय। इंहा के तिहार सब जगा ले घुच के रहिथे। बिहाव मंगौनी के करी लाड़ू, मोहरी दफरा निसान के बघवा कस गरजई, भड़ौनी, मायसरी लूगरा, पर्रा झुलौनी, मांदी भात, आजी गोंदली ये जम्मो ह हमर छत्तीसगढ़िया होय के पहिचान आय। लईका होय म छट्ठी-बरही, कांके पानी रिवाज ह घर म हरिक लान देथे। नानपन के गंगाजल, गजामूंग, महापरसाद, भोजली-जंवारा ह दोस्ती के पिरीत ल एक ठन गांठ म बांध देथय। दाई-ददा, कका-बबा, ममा-दाई, भौजी, भांटो केहे के चलन इहेंच हे।

छत्तीसगढ़ के पहिराव ओढ़ाव दुरिहाच ले चिनहा जाथे। गरवा चरावत राउत भइया के चंदैनी गोंदा कस रिगबिग ले कुरता, सलूखा, सादा, पिंयर पंछा मुड़ म छोटकुन खुमरी, हाथ म तेंदू सार के लउठी ह सउंहत किसन भगवान के दरसन करा देथे। सुआ पांखी लूगरा पहिरे सुवा, ददरिया गावत मोटियारी मन ल मोह लेथे। बाबू जात के हाथ के ढेरकऊवा, कान के बारी अउ माई लोगन के हाथ के अंईठी, अंगरी के मुंदरी, गोड़ के पइरी, कड़ा बिछिया, गर के सुंता, तुर्रा, गजरा, बइहां के पहुंची, कनिहा के करधन, कान म खिनवा पहिरे दाई-बहिनी मन ल देख के लागथे सिरतोन म जम्मो गहना-गुरिया ल सिंगार के लछमी दाई ह सउंहत हमर छत्तीसगढ़ म बइठे हावय। तभे तो छत्तीसगढ़ ल ''धान के कटोरा'' केहे जाथे। गमछा, लुंगी, बंडी म लपटाय बनिहार किसनहा मन धरती दाई के सेवा बजावत घातेच सुग्घर लागथे। लुगरा, पोलखा पहिरे मुड़ ल ढांके दाई-दीदी मन ल देखके लागथे कि जम्मो भारत भर के इात अउ संस्कार ह इही छत्तीसगढ़ म बसे हावय। 

जौन किसम ले हम छत्तीसगढ़िया मन के जम्मो रासा-बासा अलग हावय उही किसम ले हमर खानपान घलो अलग हावय। बटकी म बासी चुटकी म नून नहीं त नून अउ मिरचा के भुरका चटनी कोन छत्तीसगढ़िया ल नई सुहावय। तिंवरा भाजी के गुरतुर सुवाद तो हमींच मन लेथन। देवारी के फरा, होरी के अइरसा, तीजा के ठेठरी-खुरमी, हरेली के चीला, कस खाजी, रोटी-पीठा भला हमर छोंड़ दूसर मन देखे होहीं? तभे तो हम धरती म सोना उपजाए के ताकत राखथन। अथान, चटनी के ममहई ह मुंहू म पानी लान देथे। चना-बटुरा के होरा, तेंदू-चार के पाका, जिमीकांदा के खोईला, रखिया के बरी के सुवाद ल हम छत्तीसगढ़िया ल छोंड़ के कोनो दूसर पाय होही?

जम्मो छत्तीसगढ़ के दरसन तो सिरिफ इंहा के लोककला म देखे बर मिलथे। रात भर गली के धुर्रा-माटी म रमंज-रमंज के हंसई ह मनोरंजन संग गियान के भंडार घलो होथे। सुवा, करमा, ददरिया, राऊत नाचा, पंथी ह तो इहां के थाती आय। ढोला-मारू, लोरिक चंदा ह इहां परेम के संदेस देथे त भरथरी, पंडवानी ह भक्ति भाव म बुड़ो देथे। ये सब हमर लोक कला के नकल कोनो नई कर सकय। भला हमर पंडवानी ल कोनो हिन्दी, अंगेरजी म गा सकत हें का? समे के संग अब यहू मन छत्तीसगढ़ के इतिहास बनतेच जात हे। हमन दूसरे के देखा-सीखी नकल उतार-उतार के एकर सुध्दता बिगाड़ के ''दोबी के कुकुर कस घर के न घाट के'' बरोबर बना डारत हन। आजकल छत्तीसगढ़ी एलबम ह तो बम गिरातेच हावय अउ छालीवुड ह तो इहां के संसकिरती के, लोककला के फोकला निकालत हावय।

हमर देस लोकतंत्र देस हावय। हम ल जम्मो धरम ल माने के अधिकार, भाखा, खाए-पिए के हक हावय। त एकर पाछू इंहा के संसकिरती, भाखा ल खिचरी बना देबो का? इंहा के बिहाव के नेंग-जोग, चुलमाटी, पस्तेला, भड़ौनी, छट्ठी-बरही जेन ल मेटाय बर हमन हमरेच गोंड़ म टंगिया मारत हन। इंहा के जम्मो चिनहा बाखा, संस्कार ल हमर हाथ म गंवावत जावत हन त काल के दिन म ये सब ल गोड़ म खोजबो त पाबो? का छत्तीसगढ़ के इही दुरगति करे बर हमन छत्तीसगढ़ म जनम धरे हन? का हमन ल छत्तीसगढ़िया कहाए बर, छत्तीसगढ़ी बोले बर सरम लागथे? ''घर जोगी जोगड़ा'' कस ये भुइंया के हाल होवत जात हे। कभू सोंचे हन ए म हमर कतका हाथ हे? का ए भाखा, संस्कृति ल सहेज के राखे के जुवाबदारी हमर नई बनय? का ए भाखा, संस्कृति ह देहतिया, गंवईहा मन के चिन्हारी आय? का हमन हमर भाखा, संस्कृति लोककला ल दूसर भाखा-बोली, पहिराव, ओढ़ाव, संस्कार संग मिंझार के ''दार-भात खिचरी'' बना देबो? फेर हमर का चिन्हारी रइही? अगर दार-भात खिचरी बनानच हे त अपन भाखा के, बोली के लोककला के, संस्कृति के, खान-पान के, पहिराव-ओढ़ाव के खिचरी बनावन अउ छत्तीसगढ़ के आत्मा ल जियत राखन। जोहार छत्तीसगढ़।

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देशबंधु/मड़ई ले संकलित : 
भागीरथी आदित्य ग्राम-अन्दोरा, गरियाबंद

रविवार, 10 अगस्त 2014

शहीद भाई की प्रतिमा

देश एवं नागरिकों की सुरक्षा के लिए विभिन्न स्थानों पर तैनात भारतभूमि के वीरपुत्रों के शहीद होने के बाद हर राखी में वे बहनें जो हमेशा अपने भाइयों की कलाई में राखी बांधती थी, अब उनकी आँखों में आँसू है, जो चेहरे रक्षा बंधन में भाइयों को देखकर चहक उठते थे, उनमें उदासी की लकीरें है, जो आरती की थाली भाइयों के लिए सजाई जाती थी वह सूनी पड़ी है। यह देखकर तो आसमॉं भी रोता होगा, मगर इन सच्चाइयों से जूझ रही उन बहनों को आज रक्षाबंधन के दिन देश का हर नागरिक सलाम करता है जो भाई के वियोग में शहीद प्रतिमा/फोटो को राखी बॉंधकर बहन होने का फर्ज अदा कर रही हैं। 

ऐसी ही कहानी है: 
बालोद से लगे ग्राम-झलमला के माटी पुत्र शहीद निरलेश ठाकुर की, जो अपनी बहनों का चहेता था। हमेशा अपनी मातृभूमि की सेवा और देश की हर बहनों की सुरक्षा की बात करता था 21 अगस्त 1988 में ग्राम-झलमला में पिता विष्णु ठाकुर और माँ कुमारी यह के यहाँ जन्मा निरलेश बचपन से ही पुलिस में शामिल होकर देश के लिए मर मिटने जी की बातें करता था। 21 अक्टूबर 2011 का वह काला दिन जब दरभा में नक्सलियों ने एम्बुश लगाकर सर्चिंग में निकले जवानों पर हमला कर दिया, तब निरलेश भी शहीद हो गया। तब निरलेश की दो बहनें पूर्णिमा और अगेश्वरी अपने भाई के शहीद होने पर गर्व करती है मगर हर रक्षावंधन में उनकी आँखें नम हो जाती हैं। 
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शहीद भाई की शहादत पर निरलेश की बहनें गर्व करती हैं। वहीं जब राखी लेकर प्रतिमा को बाँधती है तब पूरा गाँव रो पड़ता है। गाँव के ठीक चौराहे पर निरलेश की प्रतिमा लगी हुई है। रक्षाबंधन को जब निरलेश की बहनें घर से दिया की थाली सजाकर प्रतिमा के पास पहुँच निरलेश की प्रतिमा की आरती कर राखी बॉंध कर अपने मन को संतुष्ट कर लेती है, मगर उनकी आँखें नम हो जाती है। न जाने ऐसे कितने निरलेश हैं और है जिनकी बहनें प्रतिमा को राखी बॉंधकर रक्षाबंधन मनाती है और अपने फर्ज अदा करती है। राखी के त्यौहार में अगर सामाजिक स्तर पर बड़ी-बड़ी बातें करनेवाले लोग इन बहनों के पास जाकर एक नहीं सौ निरलेश बन सकते हैं। सौ कलाइयों की राखी की सुरक्षा की सुरक्षा मिलना इन बहनों को नसीब होगा, मगर सिर्फ बातों तक सीमित समाज के सफेदपोश लोग इन सभी से दूर रहते हैं।

रविवार, 1 जून 2014

टूथपेस्ट के अन्य उपयोग

ब्रश करना हमारे दिनचर्या के महत्वपूर्ण कामों में से एक है। ब्रश करने के लिए लोग कई अलग-अलग तरह के टूथपेस्ट उपयोग करते हैं ताकि दांत मोती जैसे चमकने लगे, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि टूथपेस्ट सिर्फ दांत को मोतियों सा चमकदार बनाने के काम ही नहीं आता बल्कि इसके कई और उपयोग भी हैं। यदि आप भी टूथपेस्ट की इन उपयोगिताओं से अनजान हैं तो चलिए आज जानते हैं टूथपेस्ट के ऐसे ही कुछ उपयोगों के बारे में....
  • यदि कोई जल जाए तो जलन से तुरंत राहत व छालों से बचने के लिए टूथपेस्ट लगाएं जलन में आराम मिलेगा व जले का निशान भी नहीं रहता है। कीड़े के काटने पर भी टूथपेस्ट लगा लेने पर राहत मिलती है।
  • टूथपेस्ट का यूज करके घर पर ही मैनिक्योर किया जा सकता है। थोड़ी मात्रा में टूथपेस्ट लेकर उसे पानी में घोल लें। अपने हाथों को उस पानी में डूबो लें कु छ देर तक हाथों को उसमें डूबा रहने दें फिर हाथों को हल्के-हल्के से मसाज करें। टूथ ब्रश से नाखून के आसपास की सफाई करें। घर पर ही मैनिक्योर करने का ये सबसे आसान तरीका है।
  • आऊच! क्या शेव करते वक्त आपने अपने आप को चोट पहुंचा ली इसमें कोई आश्चर्य नहीं है। बाथरूम के धुंध से ढ़के कांच के कारण चेहरा साफ दिखाई जो नहीं दे रहा था। अगली बार ऐसा न हो इसके लिए कांच पर नॉन जेल टूथपेस्ट लगाकर नहाने से पहले वाइप करें। आप नहाकर आ जाएंगे तब भी कांच धुंधला नहीं पड़ेगा।
  • कपड़े पर टमाटर सॉस या स्याही का दाग लग जाए तो टूथपेस्ट लेकर उसे कपड़े पर मलें थोड़ी देर रहने दें फिर कपड़े को धीरे-धीरे मलें दाग दूर हो जाएगा। घर की दीवार बच्चे कलर से खराब कर दे तो टूथपेस्ट लगाकर रगड़कर साफ कर दें रंग साफ हो जाएगा।
  • अगर लगातार नेल पालिश लगाने से आपके नाखूनों की चमक फीकी पड़ गई हो तो नाखूनों से नेल पॉलिश को हटाएं और कुछ देर तक हल्के हाथों से नाखूनों पर टूथ पेस्ट से मालिश करें। नाखून चमकने लगेंगे।
  • पिंपल की समस्या में टूथ पेस्ट बहुत उपयोगी साबित हो सकता है। अगर आपको किसी पार्टी में जाना हो और चेहरे पर पिंपल निकल आए तो रात को सोने से पहले उस पर टूथपेस्ट लगा लें। रातभर में टूथपेस्ट पिंपल का तेल सोख लेगा और सुबह तक पिंपल बैठ जाएगा। इस नुस्खे को वो लोग न अजमाएं जिन्हें टूथपेस्ट से एलर्जी है।
  • माना जाता है कि बच्चों की दूध की बॉटल अगर ठीक से साफ न हो तो वह कई बीमारियों का कारण बन सकती है। इसीलिए अगर बच्चों की दूध की बॉटल को अच्छे से साफ करके स्मैल फ्री बनाने के लिए बॉटल साफ करने के ब्रश पर थोड़ा सा टूथपेस्ट लगाएं और बॉटल साफ करें।
  • हाथ में अगर किसी तरह की स्मैल आ रही हो और आपको तुरंत मुक्ति चाहिए तो हाथ में थोड़ा सा टूथपेस्ट लेकर हाथों को साफ करें हाथ जर्म फ्री के साथ ही स्मैल फ्री हो जाएंगे। अगर गहनों की चमक फीकी पड़ गई हो और उन्हें फिर से चमकाना हो तो गहनों पर टूथपेस्ट लगाकर टूथ ब्रश से साफ करें तो गहने नए से चमकने लगेंगे।

गुरुवार, 15 मई 2014

उपयोगी बातें

कुछ ऐसी बातें जिनके बारे में आपको और हमें जानकारी नहीं होती लेकिन मुसीबत के समय यह बहुत मददगार साबित होगी।



मोबाईल इमरजेंसी नंबर
दुनिया भर में मोबाईल का इमरजेंसी नंबर 112 है । अगर आपका मोबाईल कवरेज एरिया से बाहर हैं तो 112 नंबर द्वारा आप उस क्षेत्र के नेटवर्क को सर्च करें लें। मुख्य बात यह है कि यह नंबर तब भी काम करता है जब आपका की पैड लॉक हो।

मोबाईल की बैटरी में अभी जान अभी बाकी है
मोबाईल जब बैटरी लो दिखाये और उस दौरान आपको जरुरी कॉल करनी हो, ऐसे में आप *3370# डॉयल करें, आपका मोबाईल फोन फिर से चालू हो जायेगा और आपका सेलफोन बैटरी में 50% का इजाफा दिखायेगा। मोबाईल का रिजर्व स्टॉक दोबारा चार्ज हो जायेगा, जब आप अगली बार मोबाईल को हमेशा की तरह चार्ज करेंगे।

मोबाईल चोरी होने पर
मोबाईल फोन चोरी होने की स्थिति में सबसे पहले जरुरत होती है, फोन को निष्क्रिय करने का जिससे चोर उसका दुपयोग न करें सके । अपने फोन के सीरयल नंबर को चेक करने के लिये *#06# दबायें। इसे दबाते ही आपके मोबाईल स्क्रीन पर 15 डिजिट का एक कोड नंबर आयेगा। इसे अपनी डायरी में नोट करें सुरक्षित रख लें। जब कभी आपका फोन खो जाये, उस दौरान अपने सर्विस प्रोवाइडर को ये कोड देंगे तो वह आपके हैण्डसेट को लॉक करें देगा।

कार की चाभी खो जाने पर
अगर आपकी कार की “रिमोर्ट-कीलेस-इंट्री’’ है, और गलती से कार की चाभी कार में बंद रह गयी है और दूसरा चाभी घर पर है तो आपका मोबाईल काम आ सकता है। घर में किसी व्यक्ति के मोबाईल फोन पर कॉल करें। घर में बैठे व्यक्ति से कहें कि वह अपने मोबाईल को होल्ड रखकर कार की चाभी के पास ले जायें और चाभी के अनलॉक बटन को दबाये साथ ही आप अपने मोबाईल फोन को कार दरवाजे के पास रखें, दरवाजा खुल जायेगा।

रविवार, 16 मार्च 2014

सराररा सुन ले मोर कबीर

होली का पर्व अटूट प्रेम का प्रतीक है। भक्त पर भगवान का अटूट प्रेम। प्रकृति भी प्रेम-रंग से सराबोर हो जाती है। पलास वृक्ष के लाल पुष्प- गुच्छों की छटा, भौरों का गुंजार, कोयल की मीठी कूक जन-मन में अद्भुत खुशियों का संचार करती है। लोग झूमते हैं, गाते हैं, एक-दूसरे से गले मिलते हैं जिससे शारीरिक ऊष्मा में वृद्धि हो जाती है। इस ऊष्मा का शमन करने के लिए पलास के रंग का एक-दूसरे पर छिड़काव कर स्नान किया जाता है। ताकि बंधुत्व (प्रेम) भाव का जोश लंबे समय तक बना रहे। लिया है।


आप भी इस बात से परिचित होंगे कि- होली में फाग-गीत गाने के पूर्व कबीर के दोहे बोले जाते हैं और दोहे के पूर्व-‘सनु ले सराररा मोर कबीर’! कहा जाता है। फाग-गीत में कबीर का क्या संबंध है और कबीर से सराररा का क्या संबंध हो सकता है? प्रत्येक फाग-गीत गायकों के द्वारा इस परंपरा का निर्वहन किया जाता है। चूँकि परंपराएँ जन-कल्याण के लिए होती हैं। इस लिए इस परंपरा का भी कोई कल्याणकारी उद्देश्य होगा। इस पर भी विचार किया जाना चाहिए ।
आज तक के इतिहास में कबीर वह व्यक्तित्व है जो सर्वधर्म समभाव के सिदृधांत पर चलकर बुलंदी के साथ अपनी बात समाज के सामने रखी। उन्होने जातिवाद, वर्ग भेद, पॅूंजीवाद आदि सामाजिक दोषों को कभी स्थान नहीं दिया। कारण की सभी प्राणी एक ही परमात्मा के संतान हैं।, सभी में समान गुण हैं। सभी का शरीर पंचतत्वों से बना है और अंत में पंचतत्वों में ही होना है। इसलिए सर्वशक्तिमान, चराचर के स्वामी परमपिता परमात्मा से अटूट प्रेम करने का संदेश आजीवन समाज को देते रहे। यही जीवन कल्याण का वह मार्ग है जो आत्मा को परमात्मा से जुड़ना है। शायद इसी भाव धारा के कारण फाग-गीतों के पूर्व कबीर के दोहे प्रतीकात्मक रूप से बोले जाते हैं ताकि समस्त प्राणी जगत में परस्पर प्रेम का संदेश फैले। 

दूसरी बात कबीर का सराररा से संबंध की है, तो इस जानने के लिए कृपया आगामी होली पर्व की प्रतीक्षा करें ....

चन्द्रकुमार चन्द्राकर 
अर्जुन्दा
दिनांक - १६-०३-२०१४

भारतीय गणना

आप भी चौक गये ना? क्योंकि हमने तो नील तक ही पढ़े थे..!