छत्तिसगढ़ी कविता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
छत्तिसगढ़ी कविता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 5 अप्रैल 2014

ए मीना... चल न या बाजार जाबो ना ।

ए मीना... चल न या बाजार जाबो ना ।

उहॉं जाके दूनो झन, फोटो खिचाबो ना ॥ ए मीना ...


सइकिल म बइठ के दुनो झन सुघ्घर जाबो ।

अढ़ई-आखर मया के, हम गोठ ल गोठियाबो ।

उही करा पान ठेला म, पान खाबो ना... ए मीना...


सुवा रंग पोलखा लेहूँ, गुलाबी रंग लुगरा ।

छॉंट-छॉंट के तय ह लेबे, खोपा बर फुंदरा ॥

होटल म जाके दूनो झन, भजिया खाबो ना...ए मीना ...


नाक बर नौरंगिहा फूली, कान बर बाली ।

तँय ह लेबे टिकली फुँदरी, मॉंग बर लाली ।

सॉंझकुन फेर दूनो झन, सनीमा जाबो ना...ए मीना...


तँय ह दिखथस जइसे, बिरींदाबन के रानी अस

टुरा मन कुड़काथे मोला, कइसन तँय बदनामी अस

पैरी मेला जाके दूनो, बिहाव कराबो ना... ए मीना...

सुरता

सुरता आथे महू ल बही, तोर संगे संग रेंगे के बात ।


नरवा तीर के कुआँ, बोर, अउ बारी के कॉंटा पलानी

तरिया पार के बर छइहॉं, बमरी बोइर अउ आमा चानी

जड़काला के रउनिया कस हॉंसी म

घेरी बेरी मरे के बात...



बँइहा ल सुपेती कस रउँद डरे

मया के अंचरा ल ओढ़ाके ।

परागेस, पर के जिनिस कस

जरहा रोटी जस जिनगी ल झँवा के ॥

ठट्ठा-मट्ठा म फुग्गा कस मुहू फुलाए

पिनपिनही कस रोवस घात...



आँखी के पुतरी कस अपने अपन नाचत राहस,

सुरता करके बही जस, कट्ठल-कट्ठल के हॉंसत राहस ।

जउन गली जावँव मय ह, लागे,

रधिया कस झॉंकत राहस ।

आँखी, अँगठी अउ अनार कस दॉंत मन

लागथे विरहा म राक्षस कस जात....

शुक्रवार, 26 जुलाई 2013

कौमी एकता ह आज भट्ठीच मा तो जियत हे

हमन न हिनदू हमन न मुसलिम
हमन न सिख-इसई अन
हमन तो भइया सबो परोसी
आपस में भाई-भाई अन ।

हिनदू, मुसलिम, सिख, इसई बन
इही मन हमला लड़ावत हे ।...
देस कब उबरही
नसा में कोन नइ हे
मोला ये तो बता
आज ले जे लेय नइ हे

वोखर चेहरा ला तो देखा
कोनो ला सोनिया दाई के नसा हे
कोनो ला जया बाई के नसा
कोनो ला ममता माईं के नसा हे
कोनो ल बाजपायी के नसा ।

अरे ! नसा मा तो पूरा जहान हे
बोहात गंगा मा हाथ धोय बर
का हिनदू का मुसलमान हे ।
बहुजन हो या बनियाजन
सबो एक्के टेबल मा पियत हे ।

कौमी एकता ह आज
भट्ठीच मा तो जियत हे ।
मोला कबे त पाँच परगट
आज तक पिये नइ हों
लुका चोरी घलो
एकात कप तिरे नइ हों ।

ये सब परोसी मन के
अनुभव बतात हों
दाहरा के मछरी के भोरहा मा
बाढ़ी खात हों ।

गरीब दास आधा पाव एती आव चिल्लात हे
धनीराम बोतल धरे अँटियात हे ।
अँटियाबे ते कतिक अँटियाबे
जमाय के बेर तो जोरियाबे ।

अऊ सोनइया करा
अलग बेवस्था कहाँ हे ?
एके प्लेट में खाबे ।
का केहे ? अभी तो मोर कर नइ हे
बता न यार तोला का चइए ।

अभी तोर करा नइ हे
त परोसी कब काम आही
तोला आधा चाही
त वो पूरा टेकाही

तेंहा चिंता काबर करथस यार
मोर भारत देस महान हे
दवई बर कही नी सकवँ
फेर दारू बर पूरा हिनदुस्तान हे ।

तोला जतका पीना हे
दिल खोल के पी
कभू मोरो नइ जमही
त तहूँ देख लेबे जी ।

हम सबला ल मिल-जुल के खाना हे
तुमन तो जानतेच हो यार
आज जोड़-तोड़ के जमाना हे ।

भट्ठी मा भाइचारा के
सुग्घर नजारा दिखत हे ।
का मंतरी, का संतरी
एके पलेट मा चिखत हे ।

भरे गिलास ल देखके
सबो के मुहूँ पनछावत हे
थोरको कम होत हे
त अपन-अपन ले टेकावत हे ।

नसा के ए दू बूंद हा
कतका आँखी ल मुंदही
परगती लहुलुहान होही
मानवता ला रऊँदही ।

पद, यउवन अऊ धन के नसा ले
देस कब उबरही
गाँधी बबा के सपना के भारत के
भेस कब सँवरही ।

पुष्कर सिंह ‘राज’

गाँधी ल बिजरावत हे ।...

एती ओती चारों कोती
भुँकरत मेछरावत हे
हमर गँवई के हरहा गोल्लर
किंजर-किंजर के खावत हे ।

जेखरे लउठी भँइस ओखरे
अइसन आज जमाना हे
भाई-भतिजावाद चलत हे
ग्राम-सुराज बहाना हे ।
पंचायती राज के कुरसी में बइठे
गाँधी ल बिजरावत हे ।...

पुष्कर सिंह ‘राज’

सागवाली

कहूँ ते कबे -
चाँद जइसे मुखड़े पे,
बिंदिया सितारा ।
त ओला तो नीं आय,
फिलमी पहाड़ा ॥

ओ तो बस-
खेखसी, बरबट्टी,
रमकलिया ला जानथे ।
इहीच ला अपन जिनगी के,
सब कुछ मानथे ॥

त कइसे कबे त बात बनही-
हेलन ला घलो हेमा कहिदे,
देख वो कइसे मुसकाही ।
ओखर रंगरूप के बने बरनन कर,
तोर बात बन जाही ॥

‘‘खेखसी कस आँखी हे तोर
बंगाला कस गाल ।
तरोई जइसे हाँत हावय
बरबट्टी कस लंबा बाल ।

सेमीनार कस ऊँचाई तोर
बोली मिरचा कस गोई ।
खीरा बीजा कस दाँत हावय
तोर खोपा रखिया लोई ।

लफरहा कोर के लुगरा में,
पोलिका फुग्गा बाहीं ।
ऊँचहा बानी के पनही देख,
श्रीदेवी घलो लजाही ।

कुंदरू कस तोर ओंठ मा लाली,
दरमी जइसे दमके ।
तोर खपसूरती देख अँखफुट्टा मनके,
पाँचों पसली चमके ।

कलिंदर चानी अस रूप राखके,
तँय बेचत हस भाजी ।
ये पसरा छोड़ मोर संग रहे बर,
हो जाना गोई राजी ।’’

असतिन के साँप

येती आरक्छन के आगी
वोती बेरोजगारी के ताव
बचाना हे देस ला, त
राँड़ अऊसाँड़ से बचाव ।
आटो स्पेसलिस्ट राघवन हे
तेलगी स्टाम्प घोटाला हे
बोफोर्स के बाते ल छोड़
बड़े-बड़े के मुहूँ काला हे ।
जन परतिनिधि हरे
फेर जनता के बात उठाय के
पइसा खात हे
अब तो एक ठन मुहिम लान देव ।
अइसन नेता ला
फॉंसी मा टॉंग देव ।
अऊ दुनिया ल बताव
हमर महतारी तरफ
आँखी जे उठाही
हिन्दुस्तानी उखर टेंटवा ला
अइसने दबाही ।
घर में खाय बर नहीं 
नेतागिरी के साध करत हे
गाँव बोहावत हे
रयपुर दिल्ली के बात करत हे ।
निरासरित पेनसन ला
सरपंच सचिव खात हे
पंचायत मंतरी परेवा उड़ात हे ।
अऊ काहत हे-
सान्ति चाहिए त हमर रद्दा मा आ
सबो तो खात हे यार
चुप्पे तहूँ खा ।
आम जनता ह मरत हे
सरकस के सेर हा कभू
रिंग मासटर ला चेचकारे हे ?
आज जिहाँ दंगा करात हे
काली उहाँ राहत पहुँचात हे
अइसे पसरे इँखर दुकान हे
बब्बर सेर के आगू मा कहूँ
मनखे के पहिचान हे ।
ये सब ल सोंच के लगथे
वोट देवई घलो जंजाल होगे
चुने तो रेहेन नेता दलाल होगे ।
का करन मजबूरी हे
वोटिंग तो घलो जरूरी हे
नीहीं ते आज गदहा के आगू में 
काँदी कोन डालथे
असतिन के साँप कोन पालथे ।...

सबो डहर घोटाला हे

भीतरी मा दारु बेचाय
बाहिर धरमसाला हे
काला-काला देखबे बाबू !
सबो डहर घोटाला हे ।...

मेहनत करइया भूख मरे
हरामखोर मन राज करे ।
जनता ल लूटइया मन के
गर मा लटकत माला हे ।...

काय अलकरहा बात होगे
लोकतंत्र अब मजाक होगे
काली तक के चोर डाँकू
आज हमर रखवाला हे ।...

हाबय पोचई फेर दिखथे रोंट्ठे
नाम बड़े हे दरसन छोटे
सच्चई के अयनक मा देखबे त
बड़े-बड़े के मुहूँ काला हे ।...

कागज मा योजना बनात हे
कागजेच मा योजना चलात हे
संतरी से लेके मंतरी तक
परसेंट के बोलबाला हे ।...

अजगर मन भोगावत हे

अजगर मन भोगावत हे 
छत्तीसगड़ के करमचारी
न संसारी न बरम्हचारी
बीच मझधार मा लटकत हे 

पक्का कोनों जनम के
कुकरमी होही
तभे ये कंस के राज में
भटकत हे ।

येला निकाल, वोला निकाल
निकलई-निकलई मा
करमचारी के पोटा सुखागे
झटका के बाते ल छोंड़
इँहा तो तनखा घलो नंदागे । 

जेखर आघू जर, न पीछू पीपर
अइसन करमचारी ल दंदरावत हे
कमइया मन लाँघन मरे
अजगर मन भोगावत हे ।

इँहा के बरदिहा
अड़बड़ जिपरहा
रहि-रहि के लार चुहत हे
दुहानू त दुहानू
ये तो बकठी ल घलो दुहत हे ।

त का होइस
एकेच बार तोय कतका निचोबे
एक दिन हमरो पारी आही
तब तँय मुड़ धर के रोबे ।

हमर सुनइय्या कोन हे

पी. डबलू. डी. के बोर्ड सनान हे
रोड ल देखबे त गिट्टी खदान हे ।
नाम हाइवे ! काम पयडगरी के करथे
डोकरा-ढाकरा के चलना मना हे
कल के मरइया आजे मरथे ।
छत्तीसग़ड़ के सीमा मा बोर्ड धँसाय हे
जाके पढ़ न यार साफ-साफ लिखाय हे-
सावधान !
आँखी ल उघार के आबे
ये छत्तीसग़ड़ के सड़क ए
येती कहाँ आवत हस
ये डहर तो नरक हे ।
सरकारी इसकुल के मासटर हा
अपन इसकुल के अउकात ला जानथे
तेखरे सेती त अपन लइका ला
सरसती सिसु मंदिर मा लानथे
एक ला मा एक ला मौसी
ये कइसन तरीका हे
साक्छरता चलाना हे
टीका लगाना हे
सब गुरजी के ठेका हे ?
बाँकी करमचारी तनखा सन झटका
गोंहगों ले धुनत हे
गुरजी बिचारा लइका पढ़ाके
छेरी-पठरु गिनत हे ।
लइकाच ला पढ़वाव
नइते छेरी-पठरू गिनवाव
दूनों कराहू त तो
सिक्छा के हाल बेहाल हे
कुछु कही दिही मासटर
त हो जही टरान्सफर
नेतागिरी तो घलो जी के जंजाल हे ।
सिक्छा बिभाग बर सरकार के
रही अइसने चाल हा
सरकारी इसकुल बचे नीहीं
लगीच जही ताला ।
सरकारी असपताल
मजबूरीच मा मरीज जाथे
त मरीच के आथे ।
काबर !
इहाँ बर आय दवई हा तो
मेडकल मा बेंचाथे ।
आरक्छन के डाकटर
काय इलाज करही
गोड़ ल देखाबे त
बाहाँ ल धरही ।
कोनों ल कुछु आते होही
त सरकारी असपताल मा
काबर दिमाग खपाही
अपन घर मा बलाके
पइसा नीं कमाही ।
हर तरफ हे भस्टाचारी
लबरा के राज मा
सच्चई मउन हे
बतावन त बतावन काला
इहाँ हमर सुनइय्या कोन हे ?

कबाड़ कस जवानी हे

बचपन टीना-टप्पर हे
कबाड़ कस जवानी हे
बीता भर पेट के
मूड़ भर कहानी हे ॥

बताव बँगला गाड़ी के
हमला का बानी हे ।
गाँधी के लँगोटी हे
हाँत भर के छानी हे ॥

उँखर बर छत्तीसगड़
खइ अऊखजानी हे ।
हमर जिहाँ रोजी-रोटी
उही राजधानी हे ॥

जरे हमर किसमत भइया
जरे जिनगानी हे ।
थारी मा उँखर दूद-भात
आँखी मा हमर पानी हे ॥

कोन कथे सुराज हे
सुघ्घर जिनगानी हे ।
पीरा के पहाड़ मा
भटकत परानी हे ॥


चुनाव-चालीसा

जगर-बगर देखत हे
मुसुर-मुसुर हाँसत हे
एकेच बार अऊ भइया रे
हाँत जोड़े काहत हे ।

सियान मन सहीं कथे-
घुरवा के दिन बहुरथे ।
चुनाव के समे का परगे
पुदगू के घलो भाव बढ़गे ।

पाँच साल ले तुम कूद-कूद कमाहू
हमला सुक्खा ठेंगवा देखाहू ।
हमूँ देखबो काखर करा जाहू
हमर मदद बिना कतका वोट पाहू ।

अतका सुनके नेता के जेब ले
रुपया अऊ बोतल निकलत हे
पुदगू के कतिक सइत्ता
देखके तुरत फिसलत हे ।

देखव आज के राजनीति
पइसा चुनाव जितावत हे
राजा पलत हे पाल्हर इहाँ
परजा मन सोंटावत हे ।

बिसमता के दिवाल उंडा के
कब गूँजही गाँधी के नारा-
‘रामराज सा प्यारा भइया
ग्राम सुराज हमारा ।’

शनिवार, 9 जून 2012

सरपंच-पति के पीरा

लंदर-फंदर करके
तोला सरपंच बनाय हँव
फेर अब मोला लागथे
अपने गोड़ मा टंगिया चलाय हँव ।
जब ले तँय सरपंच बने
का-का करत हस
मोर बर पॉंच मिनट
वोला पॉंच घंटा ले धरत हस ।
मँय इहॉं बेचैन हँव
ते ओखर चैन बर तेल लगावत हस ।
मोर बर समे नइ हे
वोला धर के मटकावत हस ।
मोर जेब ले निकलत हे
ओमें जा के भरावत हे ।
मोला देखबे त हाड़ा के हाड़ा
ये घोसघोस ले मोटावत हे ।
ये सब बात चलत हे
त मोला सक्की झन मानो ।
हमर दुनों के बने जमथे
फेर बात ओखरे आथे
त हमर बीच में ठनथे ।
मोर नराजगी वाजिब हे भई
ये ला सब कुछ मानेंव
येखर बिन सुन्ना घर-संसार हे
ये परबुधनिन ल तो देख
ये ला तो बेग से पियॉंर हे ।
जब ले एला धरे हे
मोला अड़बड़ चमकावत हे ।
मोला खाना परसे ल छोड़के
अपने जूठा ल मँजवावत हे ।
छोड़ बाई ये पँचसलिया भरम ल
मत समे बेकार कर ।
बने मनखे के जनम धरे हस
आना.., मनखे ले पियॉंर कर ।

पुष्कर सिंह ‘राज

मंगलवार, 22 मई 2012

मोबइल-महिमा

एक जघा अइसने
रमायन होवत रहय
परसंग मा सीता ढेंक-ढेंक के
रोवत रहय ।
परबुद्ध टीकाकार
हॉंत मटकात चिल्लावत रहय,
सीता हरन के घटना ल
सुग्घर ढंग ले बतावत रहय ।
सुन के मँय गुनेंव-
सीता हरन के घटना कहूँ
मोबइल जुग मा हो जातिस,
त असोक बाटिका मा
सीता ल हनुमान
मुंदरी के जघा मोबइल धरातिस ।
मोबइल ल चिन के
सीता के मुहूँ हरियातिस,
वो अपन दुख ल
राम ल बतातिस-
हलो राम !
मँय सीता गोठियावत हँव
हरन मोर कइसे होइस
डिटेल मा बतावत हों
राम कथे-
डिटेल मा नहीं
सार्ट मा बताना हे
रिचार्ज तो मोला कराना हे |
सीता कथे-
सुन्ना कुरिया देखके
रावन हबक ले अइस हे
लाल-लाल, बड़े-बड़े
आँखी ल देखाइस हे ।
कर्रेंवॉं मेछा देखके
बुध मोर पतरागे
दिन दहाड़े राम
मोला अँधरौटी छागे ।
उड़नखटोला मा
मोला ले जइस हे
असोक बाटिका मा
लेग के बइठइस हे
ते बेरा ले आज तक
बाट तोर जोहत हौं
सुरता करके राम
रात-दिन रोवत हौं |
झटले आजा राम
मोला दुख ले उबार ले
अतियाचारी रावन ला
जान ले मार दे
राम कथे-
सीता ! मँय झटकन आत हों ।
फेर थोरकिन पता लगाके
रावन के नम्बर बता तो ।
तिरजटा ला पुछके
सीता नमबर बतात हे
त रिसे-रिस में राम
रावन ला फोन लगात हे ।
हलो रावन..!
मँय राम गोठियावत हँव
सीता ला लहुटा दे
सिरयसली बतावत हँव
कहूँ नी मानस
त मोला लंका आन दे
फेर झन कबे काबर
बंगाला अस सान दे |
आहूँ ते तोर दसो मुड़ी ला
धर के निचोहूँ |
जम्मो लहू ल तोर
लंका में रुतोहूँ ।
जरा सोंचव भइया
वो समे कहूँ रतिस मोबइल
त रमायन में
रस कहॉं झलकतिस
राम-रावन लड़ई घलोक
साटकट निपटतिस ।
ये सबो हमर बिचार हरे
कल्पना के गागर ए
रमायन तो गंगा ए भइया
रमायन भव-सागर ए ।
रमायन ल समझगे
वो हा इंसान ए
जेनला समझ नइ अइस
वोखर बर भगवान हे ।
एती-ओती करके हम
जिनगी पहावत हन
हीरा अस देंह ला
बिरथा गँवावत हन
आओ जम्मो मिलके
हम राम-रस पावन
ये मानुस तन ला भइया
सफल बनावन ।

-पुष्कर सिंह ‘राज’





कवि सम्मेलन

एक जघा अइसने
कवि सम्मेलन होत रथे
संचालन करत कवि कथे-
सुनइय्या मन ले बिनती हे
थोक चेतलगहा गुनो
कवि सम्मेलन सुरू होत हे
सांति के साथ सुनो ।
अतका सुनके
एक झन बाई के मती छरियागे
वो हा रहय सांति के दाई
झगरी बाई आगू मा आगे ।
काखर मा दम हे
हमर रहत ले
सांति के साथ सुनही
ओखर ददा ल पता चलही
त धोबी अस नी धुनही ।
कवि थोरकन सोंच के कथे-
माता सारदा के हम
पइयाँ परत हन
सरसती बंदना के साथ
कार्यकरम सुरू करत हन
अतका सुन के सारदा
रिसेरिस मा झुपत हे,
तभिन सांति-सांति कहत रेहेव
अब मोर बेटी
सरसती, बंदना दिखत हे ।
अरथ के अनरथ देख
कवि कउवाय रथे
खिसियाके कथे-
अच्छा त भई
सब जोर के ताली बजा देव
अउ आरती ला मारो गोली
परेम के साथ कविता के मँजा लेव ।
अतका मा
आरती के दाई भारती आगे
ओखर देहें मा तो
मानो चण्डी समागे ।
अरे में देखहूँ
आरती ल छो़डके
परेम कइसे कविता संग जाही
ओखर बाबू हा जानही
त बारा नी बजाही ।
ये सबो ला सुनके
कवि मन एती-ओती झकत हे
वोला देख के सुनइय्या मन
पेट धर-धर के झाँकत हे ।

-पुष्कर सिंह ‘राज’

सोमवार, 11 जुलाई 2011

गरज-गरज के बरस रे बादर

गरज-गरज के बरस रे बादर
गरज-गरज के बरस

दंद में उसनागे तन
आस में मुरझागे मन
नान्हे-नान्हे पियासे धान बर
झप-झप पानी परस । 
गरज-गरज....

बारी के सब नार-बिंयार
जम्मो में चढ़गे दिंयार
भाजी पाला के दसा ल
आके थोकिन हरख । 
गरज-गरज....

सूरूज खेलय आँखी-मिचौली
कोयली के नंदागे बोली
कलल-कलल जम्मो परानी
अब तो आके टपक । 
गरज-गरज....

रात में चन्दा देखय नटेर
पउर साल कस का होगे फेर ?
पाँव परथन हे महराज
जल्दी जल्दी धमक । 
गरज-गरज....


रमेश यादव
ग्राम-पेण्ड्रीपोष्ट-कलंगपुर

बिहान होगे रे

बिहान होगे रे
उठो उठो भइया,
बिहान होगे रे
चिरइ चहचहावत हे,  
हवा सुरसुरात हे ।
झिंगुरा झिन-झिन करत जाय
घुघवा घुघवात हे ।

रतिहा के संगी मितान होगे रे
तरिया मा भाप उड़त जाय,
जाड़ म दाढ़ी कँपकँपाय
बाहरी अँगना म नाचय
ढेंकी अउ बाहना मन बाजय ।

कोठा म बछरु के रंभान होगे रे
दाई ह छरा छिटकत हे
कुकरा कुकरूँस-कूँ बासत हे
खड़फड़ी गाय के खड़खड़ाय
गोल्लर भूँकरूस-भूँ भूँकरत हे

पहाती के सुकवा के मुसकान होगे रे
रंधनी के छानी गुँगवाय
भउजी ह पानी भरे ला जाय
चूरी खनखनात हे
पैरी छन-छन बाजत जाय

चंदा बंडरागे उत्ती लाल होगे रे
पाहटिया नोई घर के आय
डोकरा खोर-खोर खाँसत हे
बाबू पहाड़ा पढ़त जाय
नोनी कविता बाँचत जाय
छानी में कउंवाँ के कउवाँन होगे रे

कुरिया म जाँता घरघराय
चुलहा म चाय खलबलाय
कोटना म भूँसा ल बोरय
ददा गरवा निकलाय
सोनहा अँजोर के छरियान होगे रे
उठो-उठो भइया बिहान होगे रे...

रमेश यादव
ग्राम-पेण्ड्रीपोष्ट-कलंगपुर

धरती गोहरात हे..

धरती गोहरात हे...
खोंधरा मा बइठे सल्हइ ह,
गोड़ेला के पिला चिरई ह
चिंव-चिंव कहिके चिल्लात हे,
चलव उठव धरती दाई गोहरात हे ...

सुते के समे नाँहकगे
दबका के दिन बाँहकगे
अब कोन हबकाही तुँहला
सब अपने-अपने बाँचगे ।
तुँहला बलाय बर,
ओदे सूरूज भाई आत हे ...

करम के खेती हे परिया,
तरसत हे खेत के परिया
मया के माला अरोये,
रसता जोहत हे बहुरिया ।
सोन-सोन के फूल-फूले,  
बंबूर ह मुसकात हे ...

आन के लउठी काम नइ आय
अपन लउठी म साँप मरथे
आन के भरोसा मा काम नइ करे,
अपने बाँह ले काम सरकथे
खुशी के खजाना ह,  
भीतरे-भीतर खलखलातहे

रमेश यादव
ग्राम-पेण्ड्रीपोष्ट-कलंगपुर

छत्तिसगढ़ के पीरा

भुँइया ले उगाथन हमन,
सोना अउ हीरा ।
भ्रष्ट नेता अउ अफसर हरे,
घुनहा कीरा ।।
कतको खाही तभो ले,
उँट के मुह मा जीरा ।
इही तो आय हमर,
छत्तिसगढ़ के पीरा ।।

-खोरबाहरा राम साहू

बबा अउ नाती

चोर अउ पुलिस,
दूनो हरे साँथी ।
पुलिस ह बबा,
अउ चोर हरे नाती ।।
ए मन के ,
एके हरे जाती ।
जइसे दीया अउ,
ओकर बाँती ।।
ये दूनो मन ले ,
बच के राहव ।
मोर संगी,
अउ मोर साँथी ।।

-खोरबाहरा राम साहू

मत होवय हाँसी

बी.ए. पढ़इया बनगे बइला ।
एम. ए. डिगरी वाले,
इहाँ धोवत हे मइला ।
बी.काम. करइया,
जिनगी मा होगे बेकाम ।
एम.ए. वाले मन बर,
घलो नइहे काम ।
जउन पढ़ेहे बी.ए.सी.,
वहू मन हा धोवथे,
होंटल मा कप-बसी ।
चोरी हारी ले
बाँचव संगी,
तुँहर मन के
मत होवय हाँसी ।

खोरबाहरा राम साहू

भारतीय गणना

आप भी चौक गये ना? क्योंकि हमने तो नील तक ही पढ़े थे..!