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गुरुवार, 4 सितंबर 2014

''दार-भात खिचरी''

मोर भाखा कतेक गुरतुर, कतेक मिठास ये बात ल तो सिरिफ छत्तीसगढ़ियाच मन हर जानथंय। जम्मो भाखा बोली ले सुरहि गाय कस सिधवी बिन कपट के निच्चट सांत रूप म हावय। ''अंधवा जभे खीर खाथे तभे, पतियाथे।'' इही कहावत ह मोर छत्तीसगढ़ी भाखा ऊपर बरोबर बईठय। बोले म रमायन, गीता के बानी कस, सुने म महतारी के लोरी कस दुलार हावय हमर छत्तीसगढ़ी भाखा म। नवा दुलहिन के पइरी के घुंघरू कस नीक भाखा म करमा, ददरिया, चंदैनी के सुर म मादर, ढोलक, गड़वा बाजा के थाप ह परथे त लागथे ए छत्तीसगढ़ी भाखा बोली ह जम्मो भाखा बोली ल पचर्रा बना
दिस। ए भाखा के नावेच हावय छत्तीसगढ़ी! छत्तीस आगर छत्तीस कोरी मनखे मन मिलके ए भाखा ल गढ़े होंही तभे छत्तीसगढ़ी भाखा बोली नोहय, ए ह हमर छत्तीसगढ़ के जम्मो संसकिरती के दरसन आय। ऐंठी, तुर्रा, गजरा, पंडवानी, बिहाव-भड़ौनी, कमरा-खुमरी, नोई दुहना, के चिन्हार, इही छत्तीसगढ़ी भाखा ह कराथे। ए भाखा ह तो छत्तीसगढ़ के परान आय। जेन दिन ए भाखा नंदा जाही वो दिन छत्तीसगढ़ घलो मेटा जाही।

संस्कृति अउ तिहार ह तो छत्तीसगढ़ के माई तिजोरी म भरे हावय। माता पहुंचनी के सीतला पूजा, अक्ती, ठाकुर देव पूजा सांहड़ा देव पूजा, देवारी के गौरी-गौरा, घरो घर घूमत छेरछेरा मंगइया के होली, मेला-मड़ई जइसन या पिरीत। अउ अपन आस्था ले जुड़े अइसन तिहार कोनो जगा देखे बर नई मिलय। इंहा के तिहार सब जगा ले घुच के रहिथे। बिहाव मंगौनी के करी लाड़ू, मोहरी दफरा निसान के बघवा कस गरजई, भड़ौनी, मायसरी लूगरा, पर्रा झुलौनी, मांदी भात, आजी गोंदली ये जम्मो ह हमर छत्तीसगढ़िया होय के पहिचान आय। लईका होय म छट्ठी-बरही, कांके पानी रिवाज ह घर म हरिक लान देथे। नानपन के गंगाजल, गजामूंग, महापरसाद, भोजली-जंवारा ह दोस्ती के पिरीत ल एक ठन गांठ म बांध देथय। दाई-ददा, कका-बबा, ममा-दाई, भौजी, भांटो केहे के चलन इहेंच हे।

छत्तीसगढ़ के पहिराव ओढ़ाव दुरिहाच ले चिनहा जाथे। गरवा चरावत राउत भइया के चंदैनी गोंदा कस रिगबिग ले कुरता, सलूखा, सादा, पिंयर पंछा मुड़ म छोटकुन खुमरी, हाथ म तेंदू सार के लउठी ह सउंहत किसन भगवान के दरसन करा देथे। सुआ पांखी लूगरा पहिरे सुवा, ददरिया गावत मोटियारी मन ल मोह लेथे। बाबू जात के हाथ के ढेरकऊवा, कान के बारी अउ माई लोगन के हाथ के अंईठी, अंगरी के मुंदरी, गोड़ के पइरी, कड़ा बिछिया, गर के सुंता, तुर्रा, गजरा, बइहां के पहुंची, कनिहा के करधन, कान म खिनवा पहिरे दाई-बहिनी मन ल देख के लागथे सिरतोन म जम्मो गहना-गुरिया ल सिंगार के लछमी दाई ह सउंहत हमर छत्तीसगढ़ म बइठे हावय। तभे तो छत्तीसगढ़ ल ''धान के कटोरा'' केहे जाथे। गमछा, लुंगी, बंडी म लपटाय बनिहार किसनहा मन धरती दाई के सेवा बजावत घातेच सुग्घर लागथे। लुगरा, पोलखा पहिरे मुड़ ल ढांके दाई-दीदी मन ल देखके लागथे कि जम्मो भारत भर के इात अउ संस्कार ह इही छत्तीसगढ़ म बसे हावय। 

जौन किसम ले हम छत्तीसगढ़िया मन के जम्मो रासा-बासा अलग हावय उही किसम ले हमर खानपान घलो अलग हावय। बटकी म बासी चुटकी म नून नहीं त नून अउ मिरचा के भुरका चटनी कोन छत्तीसगढ़िया ल नई सुहावय। तिंवरा भाजी के गुरतुर सुवाद तो हमींच मन लेथन। देवारी के फरा, होरी के अइरसा, तीजा के ठेठरी-खुरमी, हरेली के चीला, कस खाजी, रोटी-पीठा भला हमर छोंड़ दूसर मन देखे होहीं? तभे तो हम धरती म सोना उपजाए के ताकत राखथन। अथान, चटनी के ममहई ह मुंहू म पानी लान देथे। चना-बटुरा के होरा, तेंदू-चार के पाका, जिमीकांदा के खोईला, रखिया के बरी के सुवाद ल हम छत्तीसगढ़िया ल छोंड़ के कोनो दूसर पाय होही?

जम्मो छत्तीसगढ़ के दरसन तो सिरिफ इंहा के लोककला म देखे बर मिलथे। रात भर गली के धुर्रा-माटी म रमंज-रमंज के हंसई ह मनोरंजन संग गियान के भंडार घलो होथे। सुवा, करमा, ददरिया, राऊत नाचा, पंथी ह तो इहां के थाती आय। ढोला-मारू, लोरिक चंदा ह इहां परेम के संदेस देथे त भरथरी, पंडवानी ह भक्ति भाव म बुड़ो देथे। ये सब हमर लोक कला के नकल कोनो नई कर सकय। भला हमर पंडवानी ल कोनो हिन्दी, अंगेरजी म गा सकत हें का? समे के संग अब यहू मन छत्तीसगढ़ के इतिहास बनतेच जात हे। हमन दूसरे के देखा-सीखी नकल उतार-उतार के एकर सुध्दता बिगाड़ के ''दोबी के कुकुर कस घर के न घाट के'' बरोबर बना डारत हन। आजकल छत्तीसगढ़ी एलबम ह तो बम गिरातेच हावय अउ छालीवुड ह तो इहां के संसकिरती के, लोककला के फोकला निकालत हावय।

हमर देस लोकतंत्र देस हावय। हम ल जम्मो धरम ल माने के अधिकार, भाखा, खाए-पिए के हक हावय। त एकर पाछू इंहा के संसकिरती, भाखा ल खिचरी बना देबो का? इंहा के बिहाव के नेंग-जोग, चुलमाटी, पस्तेला, भड़ौनी, छट्ठी-बरही जेन ल मेटाय बर हमन हमरेच गोंड़ म टंगिया मारत हन। इंहा के जम्मो चिनहा बाखा, संस्कार ल हमर हाथ म गंवावत जावत हन त काल के दिन म ये सब ल गोड़ म खोजबो त पाबो? का छत्तीसगढ़ के इही दुरगति करे बर हमन छत्तीसगढ़ म जनम धरे हन? का हमन ल छत्तीसगढ़िया कहाए बर, छत्तीसगढ़ी बोले बर सरम लागथे? ''घर जोगी जोगड़ा'' कस ये भुइंया के हाल होवत जात हे। कभू सोंचे हन ए म हमर कतका हाथ हे? का ए भाखा, संस्कृति ल सहेज के राखे के जुवाबदारी हमर नई बनय? का ए भाखा, संस्कृति ह देहतिया, गंवईहा मन के चिन्हारी आय? का हमन हमर भाखा, संस्कृति लोककला ल दूसर भाखा-बोली, पहिराव, ओढ़ाव, संस्कार संग मिंझार के ''दार-भात खिचरी'' बना देबो? फेर हमर का चिन्हारी रइही? अगर दार-भात खिचरी बनानच हे त अपन भाखा के, बोली के लोककला के, संस्कृति के, खान-पान के, पहिराव-ओढ़ाव के खिचरी बनावन अउ छत्तीसगढ़ के आत्मा ल जियत राखन। जोहार छत्तीसगढ़।

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देशबंधु/मड़ई ले संकलित : 
भागीरथी आदित्य ग्राम-अन्दोरा, गरियाबंद

रविवार, 10 अगस्त 2014

शहीद भाई की प्रतिमा

देश एवं नागरिकों की सुरक्षा के लिए विभिन्न स्थानों पर तैनात भारतभूमि के वीरपुत्रों के शहीद होने के बाद हर राखी में वे बहनें जो हमेशा अपने भाइयों की कलाई में राखी बांधती थी, अब उनकी आँखों में आँसू है, जो चेहरे रक्षा बंधन में भाइयों को देखकर चहक उठते थे, उनमें उदासी की लकीरें है, जो आरती की थाली भाइयों के लिए सजाई जाती थी वह सूनी पड़ी है। यह देखकर तो आसमॉं भी रोता होगा, मगर इन सच्चाइयों से जूझ रही उन बहनों को आज रक्षाबंधन के दिन देश का हर नागरिक सलाम करता है जो भाई के वियोग में शहीद प्रतिमा/फोटो को राखी बॉंधकर बहन होने का फर्ज अदा कर रही हैं। 

ऐसी ही कहानी है: 
बालोद से लगे ग्राम-झलमला के माटी पुत्र शहीद निरलेश ठाकुर की, जो अपनी बहनों का चहेता था। हमेशा अपनी मातृभूमि की सेवा और देश की हर बहनों की सुरक्षा की बात करता था 21 अगस्त 1988 में ग्राम-झलमला में पिता विष्णु ठाकुर और माँ कुमारी यह के यहाँ जन्मा निरलेश बचपन से ही पुलिस में शामिल होकर देश के लिए मर मिटने जी की बातें करता था। 21 अक्टूबर 2011 का वह काला दिन जब दरभा में नक्सलियों ने एम्बुश लगाकर सर्चिंग में निकले जवानों पर हमला कर दिया, तब निरलेश भी शहीद हो गया। तब निरलेश की दो बहनें पूर्णिमा और अगेश्वरी अपने भाई के शहीद होने पर गर्व करती है मगर हर रक्षावंधन में उनकी आँखें नम हो जाती हैं। 
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शहीद भाई की शहादत पर निरलेश की बहनें गर्व करती हैं। वहीं जब राखी लेकर प्रतिमा को बाँधती है तब पूरा गाँव रो पड़ता है। गाँव के ठीक चौराहे पर निरलेश की प्रतिमा लगी हुई है। रक्षाबंधन को जब निरलेश की बहनें घर से दिया की थाली सजाकर प्रतिमा के पास पहुँच निरलेश की प्रतिमा की आरती कर राखी बॉंध कर अपने मन को संतुष्ट कर लेती है, मगर उनकी आँखें नम हो जाती है। न जाने ऐसे कितने निरलेश हैं और है जिनकी बहनें प्रतिमा को राखी बॉंधकर रक्षाबंधन मनाती है और अपने फर्ज अदा करती है। राखी के त्यौहार में अगर सामाजिक स्तर पर बड़ी-बड़ी बातें करनेवाले लोग इन बहनों के पास जाकर एक नहीं सौ निरलेश बन सकते हैं। सौ कलाइयों की राखी की सुरक्षा की सुरक्षा मिलना इन बहनों को नसीब होगा, मगर सिर्फ बातों तक सीमित समाज के सफेदपोश लोग इन सभी से दूर रहते हैं।

रविवार, 18 अगस्त 2013

समर्पित कला साधक

छत्तीसगढ़ी लोकनृत्य परंपराओं के रक्षण हेतु पूरा शिद्दत के साथ समर्पित एक लोक कलाकार है नीलमदास मानिकपुरी। नीलम ने छत्तीसगढ़ी फोक नृत्य को प्रदेशव्यापी प्रतिष्ठा दिलाने में अहम भूमिका निभाई है। लोककला जगत से जुड़े लोगों के बीच उनका एक विशिष्ट स्थान रहा है। नृत्य साधना को समर्पित नीलमदास मानिकपुरी लोककला मंच ‘‘पहाती सुकवा’’ के माध्यम से शुरू किया है। उनका कोई गुरू नहीं है बल्कि उन्हें बहन रामेश्वरी यादव से बहुत कुछ सीखने को मिला है। वर्तमान में ‘‘अनुराग धारा’’ लोककला मंच से जुड़कर लोकनृत्य की प्रचार-प्रसार में जुटे हुए हैं, ताकि अगली पीढ़ी तक फोक नृत्य को पहुँचायी जा सके। लोककला के प्रति समर्पित नीलम से हुई दरवेश आनंद की बातचीत—

अपना बचपन व शिक्षा- दीक्षा के संबंध में बताइए तथा लोकनृत्य की ओर कैसे विचार गया?
विद्यार्थी जीवन से ही कला में रूचि लेना शुरू कर दिया था, गाँव की लीला मंडली में। ‘‘सोनचिरइया’’ कार्यक्रम सन् 1980-81 में हो रहा था। उसे देखकर मन में कला प्रदर्शन करने का विचार आया।

आपकी कला यात्रा कहाँ से और कैसे शुरू हुई एवं किस-किस लोककला मंच से जुड़े रहकर प्रदर्शन करते आ रहे हैं आप?
‘‘पहाती सुकवा’’ खलारी से मेरी कला यात्रा शुरू हुई। इसके बाद शेखर साहू के साथ भुँइयाँ के सिंगार दल्लीराजहरा, सीताराम साहू के साथ सूरजमुखी पेण्ड्री में डांस व प्रहसन करता रहा। बाद में ‘‘लोकमंजरी’’ संस्था भिलाई से जुड़ गया और यहाँ से एक नाम मिला, पिछले 16 वर्ष तक ‘‘चंदैनी गोंदा’’ में काम किया। वर्तमान में गायिका कविता वासनिक के साथ अनुराग धारा राजनांदगाँव से जुडक़र कला यात्रा जारी है।

किसे अपना आदर्श मानते हैं?
विश्वनाथ धारगे जो सोनहा बिहान में लोरिक का किरदार निभाते थे, उससे मैं प्रभावित रहा।

आप क्लासिक डांस या फिर फोक डांस को ज्यादा महत्व देते हैं?
फोक डांस को महत्व देता हूँ लेकिन क्लासिक डांस की शिक्षा लोक कलाकार को जो डांस में रूचि रखते हैं लेना चाहिए। इससे ताल व भाव में तादात्म्य बैठता है नृत्य में कहीं चूक नहीं होती और फोक नृत्य तो अंतरात्मा की आवाज होती है इसे सीखने की जरूरत नहीं है।

आजकल छत्तीसगढ़ी एलबम का दौर चल रहा है इससे कितना संतुष्ट है एवं खुद को कहाँ पाते हैं?
वर्तमान में छत्तीसगढ़ी संगीत का स्वरूप ही बदल चुका है बंबइया ढर्रे पर चल रहा है, अपने आप को कहीं नहीं पाता। छत्तीसगढ़ी की जो मिठास है वो एकदम खो गया है। लगता है मधुर गीतों का युग खत्म हो चला है।

छत्तीसगढ़ी गीतों में इन दिनों बेहूदा शब्दों का धड़ल्ले से उपयोग किया जा रहा है, कौन जिम्मेदार है व इससे बचने क्या प्रयास किया जा सकता है?
इसे बचाने के लिए साहित्यकारों को आगे आने की जरूरत है। एक वैचारिक क्रांति की चाहिए। ऐसे गीत संगीत से कलाकारों को भी परहेज करने की आवश्यकता है। तभी लोक संस्कृति बचायी जा सकती है।

लोककला और लोक सर्जकों को बचाए रखने की दिशा में सरकार की क्या भूमिका है तथा क्या होनी चाहिए?
लोक कलाकारों के प्रति सरकार की सोच कोई खास नहीं है। पेंशन योजना भी पर्याप्त नहीं है। जीवनभर एक कलाकार घर बार त्यागकर लोगों के मनोरंजन करने व लोक विलुप्त हो रही कला को बचाने में गवाँ देता है। उसे पेंशन के बतौर चंद रूपये दिया जाता है।

आज लोककला मंच का अस्तित्व खोता जा रहा है ऐसे आयोजन में भीड़ कम होती जा रही है?

टी. वी. सीरियल प्रभावित कर रहा है। भीड़ जरूर कम होती है लेकिन आज भी कहीं पर लोककला आयोजित होती है लोग देखने आते हैं। नई पीढ़ी में रूचि कम तो है किन्तु पुराने दर्शक आज भी है।
छत्तीसगढ़ी फिल्मों के प्रति आपकी नजरिया व कितने फिल्म में अभिनय कर चुके है?
डांड़ नामक फिल्म में अभिनय व ग्रुप डांस कर चुका हूँ। इसके अलावा 3-4 फिल्म में भी काम करने का मौका। मिला अभिनय भी किया लेकिन छत्तीसगढ़ की महक नहीं मिलती। मोर छंइया भूंइया के बाद लोक संस्कृति की छाप छोडऩे वाली फिल्म नहीं बनी। साउथ इंडियन व बंबइया पैटर्न में ज्यादातर फिल्म बन रही है।

सरकार द्वारा दिए जाने वाले सम्मान को कैसे देखते हैं?
ऐसे कलाकारों को ढूंढकर सम्मान दिए जाने की जरूरत है जो 20-25 साल से लोककला के क्षेत्र में कार्य करते आ रहे हैं। सरकार गिने-चुने लोगों को ही सम्मान बाँट रही है यह कलाकारों की उपेक्षा है। इसी तरह राज्योत्सव व जिला उत्सव के आयोजन पर स्थानीय कलाकार को स्थान नहीं दिया जाता है। बाहरी कलाकारो पर करोड़ों खर्च कर दिया जाता है ऐसा करने के बजाय राज्य के बेरोजगार कलाकारों की रोजी रोटी के बारे में सरकार को सोचना चाहिए।

छत्तीसगढ़ी संस्कृति का दूसरे प्रांतों में कितना दखल अथवा प्रभाव देखते हैं आप?
छत्तीसगढ़ के कलाकार अन्य प्रांतों से प्रभावित होते हैं, दूसरे नहीं, जबकि हमारी संस्कृति बेहद प्रभावशील है। छत्तीसगढ़ में आकर गुजर बसर करने वाले लोग चाहे वह राजस्थानी हो बिहारी हो उड़िया, तेलगू, बंगाली हो अपना लोक गीत सुनते हैं लेकिन छत्तीसगढ़िया ऐसा नहीं करते। जब हम अपनी संस्कृति का सम्मान नहीं करेंगे, तो कोई व्यक्‍ति बाहरी कैसे करेगा।

शुक्रवार, 9 सितंबर 2011

महिला साक्षरता एवं आर्थिक सशक्तिकरण


नाबार्ड के सौजन्य एवं सहयोगी जनकल्याण समिति गुण्डरदेही के सहयोग से अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस के अवसर पर प्रेरणा सम्मेलन का आयोजन दिनांक 8 सितम्बर 2011 को सामुदायिक भवन गुण्डरदेही में आयोजित किया गया जिसके मुख्यअतिथि श्री डी.आर.साहू, सी.ई.ओ. जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक मर्यादित दुर्ग एवं विशेष अतिथि श्री प्रमोद जैन पूर्व जिला पंचायत सदस्य ने मॉं सरस्वती की प्रतिमा पर दीप प्रज्जवलन एवं माल्यार्पण कर कार्यक्रम का शुभारम्भ किया । शमशाद बेगम ने महिला साक्षरता एवं आर्थिक सशक्तिकरण पर प्रकाश डालते हुए कहा- महिला बेटी व बहू के रूप में दोनों परिवारों को तारती है साथ ही महिलाओं का आर्थिक स्तर पर भी साक्षर होना बहुत ही आवश्यक है इसके लिए यह जरूरी है कि उनमें संगठन क्षमता हो, बैंक लिंकेज हो तथा व्यवसायिक गुण भी उनके अंदर समाहित हो । महिलाएँ बाहरी संस्था या एजेंसी के चक्कर में न पड़े वे सीधे बैंक से संबंध बनायें और उसका भरपूर लाभ उठायें । श्री प्रमोद जैन ने समिति के कार्यों से प्रभावित होना बतलाते हुए कहा- गुण्डरदेही विकासखंड की महिलाशक्ति से कलेक्टर महोदय बहुत प्रभावित हैं मैं इस मंच के माध्यम से महिलाओं को अपने संगठन क्षमता को बनाये रखनें की अपील करता हूँ और आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में तेजी से अग्रसर होने के लिए एकमात्र बैंक का ही रास्ता चुननें की सलाह देता हूँ आप सभी को अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ । घनश्याम दास बैरागी ने कहा साक्षरता के माध्यम से महिलाएँ संगठित हुई उनको पालने-पोसने का काम समिति द्वारा सन् 2006 से लगातार किया जा रहा है । अब वक्त आ गया है कि हमारी ग्रामीण आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में आगे बढ़ें और रोजगार कार्य करें जैसे- साबुन निर्माण, वॉशिंग पाउडर, टेंट, शामियाना, बड़ी, पापड़, आचार बनाना साथ ही साथ शासन-प्रशासन को सहयोग करते हुए मध्यान्ह भोजन एवं रेडी-टू-इट का  संचालन भी करें । महिलाओं के अधिकारों एवं विचारों को आज महत्व दिया जा रहा है क्योंकि वे घर का संचालन करती है, जब वे आर्थिक रूप से सशक्त होंगी तभी वे आर्थिक आजादी प्राप्त कर सकेंगी और उन्हें पूर्णतः सम्मान मिलेगा । श्री डी. आर. साहू सी.ओ. जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक मर्यादित दुर्ग ने कहा- बेटा-बहू की कुण्डली मिलाई जाती है इसके साथ ही सास और बहू की कुण्डली भी मिलाना चाहिए । यह भी साक्षरता की एक सीढ़ी मानी जानी चाहिए क्योंकि यह सब एक-दूसरे के पूरक हैं । मैं इस साक्षरता दिवस के अवसर पर यह अपील करता हूँ की महिला आर्थिक रूप से सशक्त होने के लिए अपने व अपने घर परिवारों को सूदखोरों के चँगुल से मुक्त रखें और बैंक की महत्वपूर्ण योजनाओं का लाभ लें । जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक ने 283 संयुक्त देयता समूहों को दो करोड़ अठहत्तर लाख रूपये का ऋण दिया है केवल गुण्डरदेही विकासखंड में क्योंकि इस ब्लाक की महिलाओं में आर्थिक सशक्तिकरण का गुण भरा हुआ है और वे पैसा लेना व देना अच्छी तरह से जानती है तभी तो यहॉं की ऋण वापसी की दर 100% है । बैंक एसएचजी, जेएलजी लोन प्रकरणों में सुझाव आमंत्रित करती है जिस पर  हमारी बैंक तत्काल निर्णय लेनें पर विचार करेगी मैंने अपनें बैंकिंग जीवन में महिला आर्थिक सशक्तिकरण का ज्वलंत उदाहरण पहली बार देख रहा हूँ । श्री घनश्याम दास वैष्णव ने जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक गुण्डरदेही द्वारा 114 समूहों को एक करोड़ चौव्वन लाख रूपये, सिकोसा 79 समूहों को नब्बे लाख रूपये एवं अर्जुन्दा द्वारा 90समूहों को 54 लाख रूपये ऋण प्रदान करनें की जानकारी दिया । इस अवसर पर श्री एन. आर. साहू शाखा प्रबंधक गुण्डरदेही, श्री आर. के. मारकण्डे सिकोसा, श्री एस. के. सिवान अर्जुन्दा शाखा प्रबंधकों एवं श्री पी.एल. हिरवानी समन्वयक विकासखण्ड स्त्रोत केन्द्र गुण्डरदेह, श्री चतुर सिंह सिन्हा उच्चवर्ग शिक्षक चिचबोड़, पत्रकार श्री टी.एस. पिपरिया कोड़ेवा नई दुनिया भिलाई, श्री विरेन्द्र चन्द्राकर पूर्व सरपंच खप्परवाड़ा-डौकीडीह, पुरईन बाई नेताम अध्यक्ष स्वसहायता समूह घीना, पंचबाई साहू अध्यक्ष जागृति स्वयं सहायता समूह तमोरा, हर्षा साहू सरपंच मटेवा, उत्तरा बाई ठाकुर मितानीन भाठागाँव-बीअहिल्या बाई एवं महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान हेतु शाल, श्रीफल, प्रशस्ति-पत्र भेंट कर सम्मान किया गया । इस अवसर पर रैली का आयोजन भी किया गया । सम्मेलन का संचालन शमशाद बेगम ने एवं आभार प्रदर्शन रफीक ने किया । कार्यक्रम हेमा सोनी हीरूखपरी, माधुरी साहू, लक्ष्मी साहू, मीना साहू, संगीता, पुष्पलता, रामसिंग अग्रवाल, पुनीता सार्वा, जानकी साहू, महिला कमाण्डो का भरभूर सहयोग रहा |

सोमवार, 25 जुलाई 2011

गुण्डरदेही के महिला सशक्तिकरण

गुण्डरदेही के महिला सशक्तिकरण से प्रेरणा लेनी चाहिए
संयुक्त देयता समूह का  सम्मेलन 1500 महिलाओं ने दी भागीदारी
6 महिलाओं का हुआ सम्मान

वृक्षारोपण एवं संयुक्त देयता समूहों का सम्मेलन कार्यक्रम सोहन पोटाई सांसद लोकसभा क्षेत्र कांकेर, अध्यक्षता श्री विरेन्द्र कुमार साहू विधायक गुण्डरदेही एवं विशिष्ट अतिथि श्रीमती रीना कंगाले कलेक्टर दुर्ग ने सम्मेलन का शुभारंभ मॉं सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण  एवं दीप प्रज्जवलन कर किया ।
श्री विरेन्द्र कुमार साहू विधायक ने कहा- गुण्डरदेही विधानसभा क्षेत्र की समूहों की महिलाएँ इतनी जागरूक हैं कि वे आमंत्रण के महत्व को जानती हैं। और अपनी जागरूकता का परिचय देते हुए पहुँच जाती हैं । शमशाद बेगम के द्वारा लगातार महिलाओं को प्रेरित एवं जागरूक करने का कार्य किया जा रहा है। यह प्रयास किया जा रहा है कि राशन दुकान, मध्यान्ह भोजन, रेडी टू ईट कार्यक्रम महिला समूहों को सौंपा जाय।
शमशाद बेगम ने बतलाया कि नाबार्ड के सौजन्य से ऐसी खेती हर मजदूर महिलाएँ जो अधिया, रेगहा, कट्टू में खेत लेकर किसानी कार्य करती हैं उन्हें संगठित व चिन्हित कर कम से कम 04 अधिकतम 10 की संख्या में समूह बनाकर जिला सहकारी केन्द्रिय बैंक मर्यादित दुर्ग-गुण्डरदेही की मदद से प्रति एकड़ 4600 रूपये का ॠण उपलब्ध कराया जा रहा है। सन् वर्ष 2011 में 56 समूहों का गठन कर बैंक से 44 लाख रूपये का ॠण दिलवाया गया था जिसकी ॠण वापसी 100 प्रतिशत रही । वर्ष 2011 में 262 समूहों का गठनकर बैंक द्वारा 227 समूहों को 1,83,36,300 रूपये का ॠण दिया गया है जो कृषि कार्य को बढ़ावा देने के लिए उचित माध्यम व पहल है जिसके लिए जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक गुण्डरदेही, सिकोसा, अर्जुन्दा बधाई के पात्र हैं।
श्रीमती रीना कंगाले कलेक्टर दुर्ग ने महिलाओं को संबोधित करते हुए कहा मैं गुण्डरदेही के महिला समूहों  में आई जागरूकता प्रत्यक्ष रूप से देखकर बहुत प्रभावित हुई हूँ इससे ब्लाक एवं जिले के समस्त अधिकारी जनप्रतिनिधियों को प्रेरणा लेनी चाहिए। यह भी बात देखने में आई है कि जहॉं-जहॉं पर महिला समहों के द्वारा राशन दुकानों का संचालन किया जा रहा है वहां पर शिकायतें कम हुई है। मैं यह भी चाहती हूँ कि राशन दुकान, मध्यान्ह भोजन, रेडी टू ईट कार्यक्रम महिला समूहों के द्वारा संचालित किया जाय। इसके लिए इन्हें विशेष प्रशिक्षण भी दिया जाना चाहिए जिससे महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा मिलेगा और वे आर्थिक रूप से सशक्त होंगी। समिति द्वारा नाबार्ड के सौजन्य एस.एच.जी. रिसोर्स सेन्टर का संचालन बहुत ही सराहनीय है। मैं यह पूरा प्रयास करूँगी कि महिलाओं में आर्इ इस जागरूकता को और बढ़ावा मिले।
श्री सोहन पोटाई सांसद कांकेर ने कहा महिलाओं की जागरूकता के कारण ही शराब बंदी पर अंकुश लगा है और छत्तीसगढ़ शासन ने सख्त कदम उठाते हुए अवैध शराब बिक्री पर पूरी तरह से अंकुश लगा दिया है। वर्ष 2013 तक पूरे प्रदेश को संपूर्ण शराबबंदी व नशामुक्त प्रदेश बनाने का संकल्प लिया है। खेतीहर मजदूर महिलाओं के लिए जो समूह बनाकर उन्हें आर्थिक रूप से बैंक के माध्यम से ॠण उपलब्ध कराया जा रहा है यह बहुत ही प्रशंसनीय है । इससे ये खेतिहर मजदूर महिलाएँ सूदखोरों के चँगुल से मुक्त रहेंगी और अपने आपको आर्थिक रूप से सशक्त होंगी, इसे और बढ़ावा देने के लिए शासन-प्रशासन स्तर पर पहल करने की कोशिश करूँगा।
इस अवसर पर विभिन्न संयुक्त देयता समूहों को गुण्डरदेही, सिकोसा, अर्जुन्दा ब्रांचों के माध्यम से 10 लाख रूपये का ॠण अतिथियों के द्वारा प्रदान किया गया। 6 सक्रिय महिलाओं को जिसमें माधुरी साहू हरियाली संयुक्त देयता समूह पैरी, द्रुपद कोसरे धनहा संयुक्त देयता समूह बोरगहन, शीतला संयुक्त देयता समूह सिर्राभांठा, पीलिया साहू किरण संयुक्त देयता समूह कजराबांधा, लक्ष्मी अग्रवाल चेतना देयता समूह खपरी-ब एवं श्रीमती शमशाद बेगम अध्यक्ष सहयोगी जनकल्याण समिति को कलेक्टर दुर्ग एवं अतिथियों द्वारा शाल, श्रीफल भेंटकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में एन. आर. साहू गुण्डरदेही, सिवाना जी, मारकण्डे जी ब्रांच मैनेजर जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक का सहयोग प्रशंसनीय रहा। कार्यक्रम का संचालन प्रमोद जैन एवं आभार प्रदर्शन अश्वनी यादव ने किया।

भारतीय गणना

आप भी चौक गये ना? क्योंकि हमने तो नील तक ही पढ़े थे..!