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रविवार, 10 अगस्त 2014

शहीद भाई की प्रतिमा

देश एवं नागरिकों की सुरक्षा के लिए विभिन्न स्थानों पर तैनात भारतभूमि के वीरपुत्रों के शहीद होने के बाद हर राखी में वे बहनें जो हमेशा अपने भाइयों की कलाई में राखी बांधती थी, अब उनकी आँखों में आँसू है, जो चेहरे रक्षा बंधन में भाइयों को देखकर चहक उठते थे, उनमें उदासी की लकीरें है, जो आरती की थाली भाइयों के लिए सजाई जाती थी वह सूनी पड़ी है। यह देखकर तो आसमॉं भी रोता होगा, मगर इन सच्चाइयों से जूझ रही उन बहनों को आज रक्षाबंधन के दिन देश का हर नागरिक सलाम करता है जो भाई के वियोग में शहीद प्रतिमा/फोटो को राखी बॉंधकर बहन होने का फर्ज अदा कर रही हैं। 

ऐसी ही कहानी है: 
बालोद से लगे ग्राम-झलमला के माटी पुत्र शहीद निरलेश ठाकुर की, जो अपनी बहनों का चहेता था। हमेशा अपनी मातृभूमि की सेवा और देश की हर बहनों की सुरक्षा की बात करता था 21 अगस्त 1988 में ग्राम-झलमला में पिता विष्णु ठाकुर और माँ कुमारी यह के यहाँ जन्मा निरलेश बचपन से ही पुलिस में शामिल होकर देश के लिए मर मिटने जी की बातें करता था। 21 अक्टूबर 2011 का वह काला दिन जब दरभा में नक्सलियों ने एम्बुश लगाकर सर्चिंग में निकले जवानों पर हमला कर दिया, तब निरलेश भी शहीद हो गया। तब निरलेश की दो बहनें पूर्णिमा और अगेश्वरी अपने भाई के शहीद होने पर गर्व करती है मगर हर रक्षावंधन में उनकी आँखें नम हो जाती हैं। 
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शहीद भाई की शहादत पर निरलेश की बहनें गर्व करती हैं। वहीं जब राखी लेकर प्रतिमा को बाँधती है तब पूरा गाँव रो पड़ता है। गाँव के ठीक चौराहे पर निरलेश की प्रतिमा लगी हुई है। रक्षाबंधन को जब निरलेश की बहनें घर से दिया की थाली सजाकर प्रतिमा के पास पहुँच निरलेश की प्रतिमा की आरती कर राखी बॉंध कर अपने मन को संतुष्ट कर लेती है, मगर उनकी आँखें नम हो जाती है। न जाने ऐसे कितने निरलेश हैं और है जिनकी बहनें प्रतिमा को राखी बॉंधकर रक्षाबंधन मनाती है और अपने फर्ज अदा करती है। राखी के त्यौहार में अगर सामाजिक स्तर पर बड़ी-बड़ी बातें करनेवाले लोग इन बहनों के पास जाकर एक नहीं सौ निरलेश बन सकते हैं। सौ कलाइयों की राखी की सुरक्षा की सुरक्षा मिलना इन बहनों को नसीब होगा, मगर सिर्फ बातों तक सीमित समाज के सफेदपोश लोग इन सभी से दूर रहते हैं।

रविवार, 18 अगस्त 2013

समर्पित कला साधक

छत्तीसगढ़ी लोकनृत्य परंपराओं के रक्षण हेतु पूरा शिद्दत के साथ समर्पित एक लोक कलाकार है नीलमदास मानिकपुरी। नीलम ने छत्तीसगढ़ी फोक नृत्य को प्रदेशव्यापी प्रतिष्ठा दिलाने में अहम भूमिका निभाई है। लोककला जगत से जुड़े लोगों के बीच उनका एक विशिष्ट स्थान रहा है। नृत्य साधना को समर्पित नीलमदास मानिकपुरी लोककला मंच ‘‘पहाती सुकवा’’ के माध्यम से शुरू किया है। उनका कोई गुरू नहीं है बल्कि उन्हें बहन रामेश्वरी यादव से बहुत कुछ सीखने को मिला है। वर्तमान में ‘‘अनुराग धारा’’ लोककला मंच से जुड़कर लोकनृत्य की प्रचार-प्रसार में जुटे हुए हैं, ताकि अगली पीढ़ी तक फोक नृत्य को पहुँचायी जा सके। लोककला के प्रति समर्पित नीलम से हुई दरवेश आनंद की बातचीत—

अपना बचपन व शिक्षा- दीक्षा के संबंध में बताइए तथा लोकनृत्य की ओर कैसे विचार गया?
विद्यार्थी जीवन से ही कला में रूचि लेना शुरू कर दिया था, गाँव की लीला मंडली में। ‘‘सोनचिरइया’’ कार्यक्रम सन् 1980-81 में हो रहा था। उसे देखकर मन में कला प्रदर्शन करने का विचार आया।

आपकी कला यात्रा कहाँ से और कैसे शुरू हुई एवं किस-किस लोककला मंच से जुड़े रहकर प्रदर्शन करते आ रहे हैं आप?
‘‘पहाती सुकवा’’ खलारी से मेरी कला यात्रा शुरू हुई। इसके बाद शेखर साहू के साथ भुँइयाँ के सिंगार दल्लीराजहरा, सीताराम साहू के साथ सूरजमुखी पेण्ड्री में डांस व प्रहसन करता रहा। बाद में ‘‘लोकमंजरी’’ संस्था भिलाई से जुड़ गया और यहाँ से एक नाम मिला, पिछले 16 वर्ष तक ‘‘चंदैनी गोंदा’’ में काम किया। वर्तमान में गायिका कविता वासनिक के साथ अनुराग धारा राजनांदगाँव से जुडक़र कला यात्रा जारी है।

किसे अपना आदर्श मानते हैं?
विश्वनाथ धारगे जो सोनहा बिहान में लोरिक का किरदार निभाते थे, उससे मैं प्रभावित रहा।

आप क्लासिक डांस या फिर फोक डांस को ज्यादा महत्व देते हैं?
फोक डांस को महत्व देता हूँ लेकिन क्लासिक डांस की शिक्षा लोक कलाकार को जो डांस में रूचि रखते हैं लेना चाहिए। इससे ताल व भाव में तादात्म्य बैठता है नृत्य में कहीं चूक नहीं होती और फोक नृत्य तो अंतरात्मा की आवाज होती है इसे सीखने की जरूरत नहीं है।

आजकल छत्तीसगढ़ी एलबम का दौर चल रहा है इससे कितना संतुष्ट है एवं खुद को कहाँ पाते हैं?
वर्तमान में छत्तीसगढ़ी संगीत का स्वरूप ही बदल चुका है बंबइया ढर्रे पर चल रहा है, अपने आप को कहीं नहीं पाता। छत्तीसगढ़ी की जो मिठास है वो एकदम खो गया है। लगता है मधुर गीतों का युग खत्म हो चला है।

छत्तीसगढ़ी गीतों में इन दिनों बेहूदा शब्दों का धड़ल्ले से उपयोग किया जा रहा है, कौन जिम्मेदार है व इससे बचने क्या प्रयास किया जा सकता है?
इसे बचाने के लिए साहित्यकारों को आगे आने की जरूरत है। एक वैचारिक क्रांति की चाहिए। ऐसे गीत संगीत से कलाकारों को भी परहेज करने की आवश्यकता है। तभी लोक संस्कृति बचायी जा सकती है।

लोककला और लोक सर्जकों को बचाए रखने की दिशा में सरकार की क्या भूमिका है तथा क्या होनी चाहिए?
लोक कलाकारों के प्रति सरकार की सोच कोई खास नहीं है। पेंशन योजना भी पर्याप्त नहीं है। जीवनभर एक कलाकार घर बार त्यागकर लोगों के मनोरंजन करने व लोक विलुप्त हो रही कला को बचाने में गवाँ देता है। उसे पेंशन के बतौर चंद रूपये दिया जाता है।

आज लोककला मंच का अस्तित्व खोता जा रहा है ऐसे आयोजन में भीड़ कम होती जा रही है?

टी. वी. सीरियल प्रभावित कर रहा है। भीड़ जरूर कम होती है लेकिन आज भी कहीं पर लोककला आयोजित होती है लोग देखने आते हैं। नई पीढ़ी में रूचि कम तो है किन्तु पुराने दर्शक आज भी है।
छत्तीसगढ़ी फिल्मों के प्रति आपकी नजरिया व कितने फिल्म में अभिनय कर चुके है?
डांड़ नामक फिल्म में अभिनय व ग्रुप डांस कर चुका हूँ। इसके अलावा 3-4 फिल्म में भी काम करने का मौका। मिला अभिनय भी किया लेकिन छत्तीसगढ़ की महक नहीं मिलती। मोर छंइया भूंइया के बाद लोक संस्कृति की छाप छोडऩे वाली फिल्म नहीं बनी। साउथ इंडियन व बंबइया पैटर्न में ज्यादातर फिल्म बन रही है।

सरकार द्वारा दिए जाने वाले सम्मान को कैसे देखते हैं?
ऐसे कलाकारों को ढूंढकर सम्मान दिए जाने की जरूरत है जो 20-25 साल से लोककला के क्षेत्र में कार्य करते आ रहे हैं। सरकार गिने-चुने लोगों को ही सम्मान बाँट रही है यह कलाकारों की उपेक्षा है। इसी तरह राज्योत्सव व जिला उत्सव के आयोजन पर स्थानीय कलाकार को स्थान नहीं दिया जाता है। बाहरी कलाकारो पर करोड़ों खर्च कर दिया जाता है ऐसा करने के बजाय राज्य के बेरोजगार कलाकारों की रोजी रोटी के बारे में सरकार को सोचना चाहिए।

छत्तीसगढ़ी संस्कृति का दूसरे प्रांतों में कितना दखल अथवा प्रभाव देखते हैं आप?
छत्तीसगढ़ के कलाकार अन्य प्रांतों से प्रभावित होते हैं, दूसरे नहीं, जबकि हमारी संस्कृति बेहद प्रभावशील है। छत्तीसगढ़ में आकर गुजर बसर करने वाले लोग चाहे वह राजस्थानी हो बिहारी हो उड़िया, तेलगू, बंगाली हो अपना लोक गीत सुनते हैं लेकिन छत्तीसगढ़िया ऐसा नहीं करते। जब हम अपनी संस्कृति का सम्मान नहीं करेंगे, तो कोई व्यक्‍ति बाहरी कैसे करेगा।

मंगलवार, 31 मई 2011

दाऊ ढाल सिंह दिल्लीवार

शब्द संसार की अपनी सीमाएँ हैं पर शब्द ही अभिव्यक्ति के संबल और साक्षी होते हैं समय के! संसार के शब्द प्रतिभा और क्षमता की उँचाईयाँ नापने में सदा असमर्थ रहे हैं! हमें सूझता नहीं कि दाऊजी के विराट व्यक्तित्व और प्रतिभा की, मेधा की उँचाईयों को किन शब्दों में व्यक्त करें..।

सामाजिक, राजनैतिक क्षेत्रों में आपकी अनेक कीर्तिमान उपलब्धियाँ और आपके गौरवशाली अवदान का साक्षी न केवल समाज बल्कि समूचा छत्तीसगढ़ व देश है। दाऊ ढाल सिंह दिल्लीवार दुर्ग जिले की जमीनी राजनीतिके प्रथम पुरूष थे। दाऊ ढाल सिंह दिल्लीवार जी का जन्म दुर्ग जिले के गुण्डरदेही तहसील के ग्राम पिरीद के मालगुजार परिवार में दाऊ श्री बलराम सिंह के यहाँ 27 नवबंर 1897 में हुआ था। अंग्रेजों की हुकुमत के दौर में जब छत्तीसगढ़ काफी पिछड़ा हुआ था।

दाऊ ढाल सिंह उस काल में मेट्रिक उत्तीर्ण थे। उन्होंने मीडिल तक की शिक्षा अरजुन्दा में और हार्इस्कूल की शिक्षा राजनांदगाँव से पूरी की। वे बचपन से ही गाँधीजी से प्रभावित थे। दाऊ ढाल सिंह की किशोरावस्था में गाँधी जी का सत्य, अहिंसा और असहयोग पर आधारित आंदोलन चरम पर था। दाऊ ढाल सिंह का किशोर मन आजादी की लड़ाई में कूदने को मचल उठा और सन् 1926 में दाऊ ढाल सिंह जी भारत को आजाद कराने स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। अंग्रेजों के प्रति मन में अपार घृणा और फिरंगियों के विरूद्ध दिल में लगी आग को बुझाने क्रांतिकारियों की टोली में शामिल हो गये।

दाऊ ढाल सिंह जी की बेजोड़ नेतृत्व क्षमता ने उन्हें रातों रात क्रांतिकारियों का अगुवा बना दिया। उन्होंने गाँव-गाँव जाकर सत्याग्रहियों की टोलियाँ बनाई इस दौरान वे प्रमुख युवा क्रांतिकारी ठाकुर प्यारेलाल सिंह, डॉ. खूबचंद बघेल, घनश्याम सिंह गुप्ता, द्वारिकानाथ तिवारी, रामप्रसाद देशमुख, छोटेलाल साहू, अंजोर राव, गोपाल राव, यमुना प्रसाद कसार, रोहणी कुमार चौबे, डॉ. पाटणकर, दोनगाँवकर, पंडित रत्नाकर झा, विष्णु चौबे, गंगा चौबे, ररूहा महराज और तामस्कर जी के निरंतर संपर्क में रहे। अपनी जीवटता, जुझारूपन, अदम्य साहस, नेतृत्व क्षमता के बदौलत सभी प्रमुख क्रांतिकारियों के चहेते बन गये। सन् 1935 में महात्मा गाँधी के सत्याग्रह आंदोलन से प्रेरित होकर काँग्रेस सेवादल की सदस्यता ग्रहण की।

दुर्ग जिले के ग्रामीण परिवेश से भली-भॉंति परिचित होने और उनकी अपार लोकप्रियता के चलते सन् 1937 में प्रांतीय (म.प्र.) काँग्रेस कमेटी के सदस्य एवं दुर्ग जिला लोकल बोर्ड के चेयरमेन बनाये गये। दाऊ ढाल सिंह के धुआँधार दौरे से घबराकर अंग्रेजों ने 12 मई 1941 को गिरतार कर नागपुर जेल भेज दिया। 1941 से 1945 तक वे देश के विभिन्न जेलों (नागपुर, दमोह, जबलपुर) में रहे।

जेल में सर्वोदय के महान क्रांतिदूत सन्त विनोबा भावे और अब्दुल कलाम आजाद जैसे क्रांतिकारियों के साथ एक ही कोठरी में लंबे समय तक रहे। उन दिनों जेल में वेद-पुराण, समाज, देश, इतिहास, भारतीय दर्शन, पाश्‍चात्य दर्शन, रामायण, महाभारत, गीता आदि पर प्रचुरता से चर्चा में जीवंत होती थी। जेलों में कुन्दन तपता गया और खरा होता गया। जेल यात्रा पश्‍चात तात्कालीन मध्यप्रदेश की राजनीति और स्वतंत्रता सेनानियों में बेहद प्रभावशाली हो चुके थे। इस बात की जिक्र 1948 में प्रकाशित नवभारत जयपुर काँग्रेस अंक में है जिसमें दाऊ ढाल सिंह को मध्यप्रांत के प्रधान नक्षत्र की संज्ञा दी गई है। उस पृष्ठ पर विभाजित मध्यप्रदेश से दाऊ ढाल सिंह के अलावा पंडित रत्नाकार झा को ही स्थान मिला था।

वरिष्ठ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री जमुना प्रसाद कसार जी ने अपनी किताब में दाऊ ढाल सिंह को प्रथम पंक्ति के क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी बताते हुए सन् 1941 में गाँधी चौक की सभा से बलपूर्वक गिरतारी का विस्तार से उल्लेख किया है। दाऊ ढाल सिंह स्वतंत्रता पश्‍चात् सन् 1955 से 1962 तक दुर्ग जनपद सभा के अध्यक्ष रहे। सन् 1961 में दाऊ ढाल सिंह दुर्ग जिला काँग्रेस कमेटी के अध्यक्ष चुने गये। उस समय दुर्ग जिले में राजनांदगाँव, कवर्धा, बेमेतरा, खैरागढ़, बालोद आदि तहसीलें थी। इस तरह उनका का कार्यक्षेत्र बेहद व्यापक था। उनकी सूझबूझ और कुशल प्रशासनिक क्षमता के मद्देनजर 1962 में दुर्ग विधानसभा से काँग्रेस प्रत्याशी बनाये गये। जिसमें भारी मतों से विजयी हुये। 1967 तक उन्होंने दुर्ग विधानसभा का प्रतिनिधित्व किया। उनके कार्यकाल में बहुत से मीडिल और हाईस्कूलों की स्थापना हुई।

तात्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू और मुख्यमंत्री (मध्यप्रदेश) पंडित रविशंकर शुक्ल जी भी उनकी प्रतिभा और प्रभाव के कायल थे। भिलाई इस्पात संयंत्र हेतु स्थल निरीक्षण एवं चयन हेतु जब पं. नेहरू और शुक्ल जी ने भ्रमण किया तब उन्होंने सिर्फ दाऊ ढाल सिंह को ही अपने साथ रखा। आज यही संयंत्र समूचे देश का गौरव है।

दुर्ग स्थित सांइस कॉलेज दाऊ ढाल सिंह की ही देन है। साइंस कॉलेज की शुरूआत हिन्दी भवन में चंद विद्यार्थियों के साथ हुई थी। सन् 1967 में इनके के सद्प्रयासों से विशाल भूखण्ड पर विशाल महाविद्यालय भवन तैयार हुआ, जो कि आज छत्तीसगढ़ के प्रमुख महाविद्यालयों में से एक है।

पंडित नेहरू जी के पास तात्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी जी भी दाऊ ढाल सिंह का बेहद सम्मान करती थी। जब श्रीमती गाँधी दुर्ग प्रवास के समय गंज मंडी प्रांगण में एक धार्मिक कार्यक्रम में व्याख्यान सुनने रूकी थी तब दाऊ ढाल सिंह का पूरा परिवार उनके साथ रहा।

दाऊ ढाल सिंह अपने राजनीतिक जीवन में निष्पक्षता, ईमानदारी, न्यायप्रियता, सच्चे जनसेवक के रूप में याद किये जाते है। उनके समकालीन यह मानते थे कि वे राजनीति नहीं बल्कि समाजनीतिमें विश्‍वास रखते थे। उनका यही सदाचरण उन्हें इतना प्रभावी बना दिया कि वे सिगरेट या बीड़ी के पन्ने पर किसी की सिफारिश कर देते थे तो उन्हें नौकरी मिल जाती थी। विभिन्न जातियों के अनेक लोग ऐसी ही सिफारिशों का लाभ लेकर विभिन्न पदों पर नौकरी में रहे। वे जन-जन के अजीज और अगुवा बन गये। दाऊ ढाल सिंह के बढ़ते प्रभाव से तात्कालीन क्षेत्रीय राजनीतिज्ञों ने उन्हें हाशिये पर ढकेलने की साजिशें रची परन्तु दाऊजी ने कभी भी पलटवार नहीं किया।

जिन्दादिल, आदर्शवादी, ईमानदार, निष्पक्ष, न्यायप्रिय, उदारमन:, मृदुभाषी, नेतृत्व व प्रशासनिक क्षमता के धनी, परदुखकातर, सादगी के प्रतीक दाऊ ढाल सिंह 10 अगस्त 1969 को इस दुनिया से विदा हो गये। 

डॉ. राजेन्द्र हरमुख
ग्राम-थनौद, दुर्ग



भारतीय गणना

आप भी चौक गये ना? क्योंकि हमने तो नील तक ही पढ़े थे..!