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शनिवार, 9 जनवरी 2016

कविता के थरहा- बिसम्भर यादव ‘मरहा’

बिसम्भर यादव ‘मरहा’
बिना पढ़े लिखे अउ बिना लिखित संग्रह के अनगिनत रचना मुँहुअखरा होना बड़ अचरच के बात आए। एला माता सरसती के किरपा अउ कवि के लगन, त्याग-तपसिया अऊ साधना के परिनाम केहे जही मंच म खड़ा होके सरलग 8-10 घण्टा कविता पाठ करना कउनो हाँसी ठट्ठा नोहे फेर “मरहा’’ जी हा ए रिकार्ड बनइस तहाँ ले कई जघा “मरहा’’ नाइट के आयोजन घलो करे गिस। बच्छर के 365 दिन मा 300 दिन कवि सम्मेलन के मंच मा रहय। “मरहा’’ जी हा कतको धारमिक, अध्यात्मिक अउ समाजिक आयोजन मा अकेल्ला कवि पाठ
करय। तकरीबन 65-70 साल के उम्मर तक साइकिल के केरियल मा बेग ला दबा के पूरा छत्तीसगढ़ ला घुमे रिहिस। कभ्भू पइसा कउड़ी के बात नइ करय। तारिक वाले पाकिट डायरी ला जेब मा रखे रहय साल भर के एडवांस बुकिग चलय। सरल, सादगी जिनगी, नसा पानी ले कोसों दूर, चाय तक ला घलो नइ पियय। एकरे सेती दाँत, कान अऊ आँखी जियत भर ले सलामत रिहिस। मंच के परस्तुति अइसन रहय के कउनों सुनइया असकट नइ मरय अऊ टस ले मस नइ होवय।
मरहा के कविता मा हाँसी ठट्ठा के लहजा देखे ला मिलय तेखरे सेती सुनइया मन हाँसय अउ ताली बजावय (थपड़ी पिटय)। कविता के भाव के संग “मरहा’’ जी हा एकसन मिलावय कवि अऊ सोरोता के तार सरलग एके मा जुड़े रहय। कविता रचे के पाछु एकेच ठन सोच रिहिस। समाज सुधार के, फेर जर बुखार ला टोरे बर कुनेन खवाय के पहिली मंदरस चटाय बर परथे। वइसनेच बियंग के ठोसरा मारे के पहिली गुदगुदावय अउ हँसवावय। ओखर कविता नानकुन लइका ला लेके बुढ़वा-सियान तक बर रहय। कविता पाठ सुरू करे के पहिली गायितरी मंत्र अउ माता सरसती के बन्दना करय। लइका मन बर बाजा मनके गोठ-बात कविता मा तमूरा तार के अवाज गजब ढंग ले निकालय। जे ला सुन के सब हाँसी के मारे सब लोट-पोट हो जावय। घर-परिवार, सास-बहु, बेटी-बेटा, राजा-परजा, परोसिन-मितान के हुबहु दरसन मिलथे। चारा अऊ मछरी के गोठ बात जइसन रचना के माध्यम ले मनखे ला सुधरे अउ लोक-परलोक बनाय के सीख देवय। केहे जाथे सियान मन के चुँदी हा घाम म निहीं बल्कि तजुरबा अऊ अनुभव मा पाकथे, अपन सपूरन जिनगी के अनुभव ला कविता मा बाँटिस। येदे रचना मा ऐ बात के झलक देखे बर मिलथे- नाचा वाले ल अवघट मा तीन झन चोर मन छेंक लिस, उँखर मोटरा-चोटरा ला खोधिया के देखिस कुछु माल-मत्ता नइ मिलीस त खिसिया के बंदुक ला टेका के नाचे बर किहिस। जीव के डर म नाचा वाले मन नाचे ला लागिन फेर नौ झन नचइया अऊ तीन झन देखइया कहाँ ले मजा आही जोक्कड़ मनिज्जर ह बड़ हुसियार रिहिस ऐ बिपत्ति ले निपटे के उदिम सोचिस अउ साखी बनाके बोलिस-तबला बाजे धिन-धिन, मंजीरा बाजे किन-किन।
एकेक झन ल तिन-तिन, एकेक झन ल तिन-तिन ॥

नाचा वाले मन इसारा ला समझ के एकेक झन चोर ऊपर तीन-तीन झन झुमिन अऊ उँखर छति-गति ला करिन।
देसभक्ति कविता ल पढ़य त सुनइया मन के रुआँ ठाढ़ हो जाय। सैंकड़ों बलिदानी सहिद मन के लयबद्ध सरसपाट बोल ल सुनके साँस रूके असन लगे… खून खऊल जाय। देस के माटी बर जिये अऊ मरे के गोठ ल बहुँतेच असरदार ढंग ले करे फेर भरस्टाचार के खिलाफ नेता मन ला अनुसासित अऊ सिस्ट ढंग ले बेखौफ दहाड़े। काखरो डर तरास नइ घेपय (पंच से लेकर परधानमंतरी तक बइमान हे) अइसे कहय अउ चैलेंज करे। मेहा गलत बोलत होहूँ त मोला जेल भेजवाव। ‘मरहा’ ओखर उपनाम हरय जउन हा जादा प्रचलित होगे। केहे जथे जथा नाम तथा गुन, दुबर-पातर देंह हा “मरहा’’ के नाम मा सउँहत फभे, “मरहा’’ जी अपन कविता मा भरस्टाचारी परखत्ता मन ला साँड़-गोल्लर के संगिया देय अउ सदाचारी जीवन बितइया आम जन जेन हा लुट अउ सोसन के सिकार होथे ओखर प्रतिनिधित्व “मरहा’’ करे। जेखरे सेती हमर छत्तिसगड़ के महान संत कवि पवन दिवान हा टेमरी गाँव के एक कवि सम्मेलन के मंच म बिसम्भर यादव के कविता “मरहा’’ के आँसू ल सुन के ओखर टाइटिल “मरहा’’ रखदिस अऊ ए जन कवि हा “मरहा’’ के नाम ले जग जाहरित होगे। मोला “मरहा’’ जी के संग कवि सम्मेलन के डेढ़ सौ मंच मा सँघरे के मउका लगे रिहिस संचालन करत मंच म आमंतरित करँव त ओखर सम्मान मा बोलँव-
गोल्लर कस भुँकरत हे चर-चर के हरहा।




सही मायने मा समाज के पीरा ला गोहरइया जनहित बर जियइया हा बहुत बड़े माने जाथे सादा जीवन उच्च विचार ला आत्मसात करे रिहिस बरम्हलीन स्वामी सुजनानंद जी महराज विमल वैदिक सेवा आश्रम पैरी के सानिध्य पाके समाज सुधार के बीड़ा उठाय के संकल्प लेइस अँचल म अइसे कउनो बिद्वान साधू-संत महापुरुस नइ बाँचिस होही जेखर संगति नइ करिस होही। कवि के साथ-साथ जाने माने रंगकरमी घलो रिहिस चंदैनी-गोंदा अऊ कारी लोक नाट्य मा जेखर अभिनय देखे ला मिलथे। संतोसी सदा सुखी ओखर जीवन के मूलमंत्र रिहिस बहुत कम साधन मा जीवन गुजारे के प्रयास करय सादा धोती-कुरता के संग हाफ जाकिट जेमा सम्मान मा मिले मेडल मन ला गुथे रहय। जेहा ओखर बिसेस पहिचान रहय। जउन घर मा ठहरय उहाँ के बहू-बेटी संग गोठियाय-बतराय अऊ असीस देय बिना उहाँ ले नइ टरे। कवि भाई मन ले परिवारिक नत्ता जोड़य, दुख-सुख के चिंता करय। अवसान के एक महिना पहिली ओखर घर मा मुलाकात करे बर गे रेहेंव उठे-बइठे के गतर नइ रिहिस खटिया म सुते-सुते किहिस इच्छा मृत्यु होतिस त मय मर जातेंव। अब जिये के साद नइ हे फेर भीसमपितामह ल इच्छा मृत्यु रेहे के बाद घलो बान के सइया म सुते ला पड़ीस। मोर संतान नइ होय के ओला घात चिंता रिहिस मोर हाल-चाल पुछीस त बताय हँव कि नवा सगा अवइया हे… त तपाक ले पुछिस नोनी हरे ते बाबू..! मय केहेंव आने वाला हे। आसीरबाद देबे तभे सरग जाबे। 
तारिख 3 अगस्त 2011 सनिच्चर के रात 9 बजे मोर घर बेटा जन्मीस, उही अठोरिया सनिच्चर 10 अगस्त 2011 के रात 9 बजे 80 बरस के उमर मा परलोक सिधारिस। नाम्ही साहितकार मन घर म जाके आखरी भेंट करिन अउ दुख के बेरा मा उँखर परवार ल ढाँढस बँधइन। काठी म गाँव वाले अऊ सगा सोदर संग कविमन घलो संघरे रिहिन जिहाँ देखे बर मिलिस, दु-तीन बच्छर के जुन्ना आदमकद के बर रूख ला गमलासुद्धा उठाके मरघट्ठी मा लेगे रिहिस, जउन ला काँटा मा चमाचम रूँधा करके जगोइन। मर के घलो मनखे ला रूख लगाय के संदेस दिस। जियत ले घूम-घूम के उपदेस बाँटिन अऊ अपनो ऊपर घलो लागू करिस। ये हा समाज बर बहुँत बड़े सीख आय। निमगा ग्यान बँटइ के कउनो मोल नइ हे। वो गियान ल अपन आचरन म उतारना घलो जरूरी रहिथे। “मरहा’’ जी के जिनगी मा ये बात परगट रूप ले दिखथे। का भइस ओखर जिनगी के दिया ह सुन्ना म बुतागे। समाज अऊ सरकार डाहर ले जादा सोर-गोहार नइ करिस, फेर मोला पक्का बिसवाँस हे कि उँखर सिरजे कविता के एक-एक सब्द, एक-एक बोल ह समाज म अँजोरी बगराके जम्मो मइनखे ला बने रद्दा देखाही।
- केशव राम साहू
गुण्डरदेही, जिला-बालोद (छ.ग.)
मोबा. 9993291095

गुरुवार, 4 सितंबर 2014

''दार-भात खिचरी''

मोर भाखा कतेक गुरतुर, कतेक मिठास ये बात ल तो सिरिफ छत्तीसगढ़ियाच मन हर जानथंय। जम्मो भाखा बोली ले सुरहि गाय कस सिधवी बिन कपट के निच्चट सांत रूप म हावय। ''अंधवा जभे खीर खाथे तभे, पतियाथे।'' इही कहावत ह मोर छत्तीसगढ़ी भाखा ऊपर बरोबर बईठय। बोले म रमायन, गीता के बानी कस, सुने म महतारी के लोरी कस दुलार हावय हमर छत्तीसगढ़ी भाखा म। नवा दुलहिन के पइरी के घुंघरू कस नीक भाखा म करमा, ददरिया, चंदैनी के सुर म मादर, ढोलक, गड़वा बाजा के थाप ह परथे त लागथे ए छत्तीसगढ़ी भाखा बोली ह जम्मो भाखा बोली ल पचर्रा बना
दिस। ए भाखा के नावेच हावय छत्तीसगढ़ी! छत्तीस आगर छत्तीस कोरी मनखे मन मिलके ए भाखा ल गढ़े होंही तभे छत्तीसगढ़ी भाखा बोली नोहय, ए ह हमर छत्तीसगढ़ के जम्मो संसकिरती के दरसन आय। ऐंठी, तुर्रा, गजरा, पंडवानी, बिहाव-भड़ौनी, कमरा-खुमरी, नोई दुहना, के चिन्हार, इही छत्तीसगढ़ी भाखा ह कराथे। ए भाखा ह तो छत्तीसगढ़ के परान आय। जेन दिन ए भाखा नंदा जाही वो दिन छत्तीसगढ़ घलो मेटा जाही।

संस्कृति अउ तिहार ह तो छत्तीसगढ़ के माई तिजोरी म भरे हावय। माता पहुंचनी के सीतला पूजा, अक्ती, ठाकुर देव पूजा सांहड़ा देव पूजा, देवारी के गौरी-गौरा, घरो घर घूमत छेरछेरा मंगइया के होली, मेला-मड़ई जइसन या पिरीत। अउ अपन आस्था ले जुड़े अइसन तिहार कोनो जगा देखे बर नई मिलय। इंहा के तिहार सब जगा ले घुच के रहिथे। बिहाव मंगौनी के करी लाड़ू, मोहरी दफरा निसान के बघवा कस गरजई, भड़ौनी, मायसरी लूगरा, पर्रा झुलौनी, मांदी भात, आजी गोंदली ये जम्मो ह हमर छत्तीसगढ़िया होय के पहिचान आय। लईका होय म छट्ठी-बरही, कांके पानी रिवाज ह घर म हरिक लान देथे। नानपन के गंगाजल, गजामूंग, महापरसाद, भोजली-जंवारा ह दोस्ती के पिरीत ल एक ठन गांठ म बांध देथय। दाई-ददा, कका-बबा, ममा-दाई, भौजी, भांटो केहे के चलन इहेंच हे।

छत्तीसगढ़ के पहिराव ओढ़ाव दुरिहाच ले चिनहा जाथे। गरवा चरावत राउत भइया के चंदैनी गोंदा कस रिगबिग ले कुरता, सलूखा, सादा, पिंयर पंछा मुड़ म छोटकुन खुमरी, हाथ म तेंदू सार के लउठी ह सउंहत किसन भगवान के दरसन करा देथे। सुआ पांखी लूगरा पहिरे सुवा, ददरिया गावत मोटियारी मन ल मोह लेथे। बाबू जात के हाथ के ढेरकऊवा, कान के बारी अउ माई लोगन के हाथ के अंईठी, अंगरी के मुंदरी, गोड़ के पइरी, कड़ा बिछिया, गर के सुंता, तुर्रा, गजरा, बइहां के पहुंची, कनिहा के करधन, कान म खिनवा पहिरे दाई-बहिनी मन ल देख के लागथे सिरतोन म जम्मो गहना-गुरिया ल सिंगार के लछमी दाई ह सउंहत हमर छत्तीसगढ़ म बइठे हावय। तभे तो छत्तीसगढ़ ल ''धान के कटोरा'' केहे जाथे। गमछा, लुंगी, बंडी म लपटाय बनिहार किसनहा मन धरती दाई के सेवा बजावत घातेच सुग्घर लागथे। लुगरा, पोलखा पहिरे मुड़ ल ढांके दाई-दीदी मन ल देखके लागथे कि जम्मो भारत भर के इात अउ संस्कार ह इही छत्तीसगढ़ म बसे हावय। 

जौन किसम ले हम छत्तीसगढ़िया मन के जम्मो रासा-बासा अलग हावय उही किसम ले हमर खानपान घलो अलग हावय। बटकी म बासी चुटकी म नून नहीं त नून अउ मिरचा के भुरका चटनी कोन छत्तीसगढ़िया ल नई सुहावय। तिंवरा भाजी के गुरतुर सुवाद तो हमींच मन लेथन। देवारी के फरा, होरी के अइरसा, तीजा के ठेठरी-खुरमी, हरेली के चीला, कस खाजी, रोटी-पीठा भला हमर छोंड़ दूसर मन देखे होहीं? तभे तो हम धरती म सोना उपजाए के ताकत राखथन। अथान, चटनी के ममहई ह मुंहू म पानी लान देथे। चना-बटुरा के होरा, तेंदू-चार के पाका, जिमीकांदा के खोईला, रखिया के बरी के सुवाद ल हम छत्तीसगढ़िया ल छोंड़ के कोनो दूसर पाय होही?

जम्मो छत्तीसगढ़ के दरसन तो सिरिफ इंहा के लोककला म देखे बर मिलथे। रात भर गली के धुर्रा-माटी म रमंज-रमंज के हंसई ह मनोरंजन संग गियान के भंडार घलो होथे। सुवा, करमा, ददरिया, राऊत नाचा, पंथी ह तो इहां के थाती आय। ढोला-मारू, लोरिक चंदा ह इहां परेम के संदेस देथे त भरथरी, पंडवानी ह भक्ति भाव म बुड़ो देथे। ये सब हमर लोक कला के नकल कोनो नई कर सकय। भला हमर पंडवानी ल कोनो हिन्दी, अंगेरजी म गा सकत हें का? समे के संग अब यहू मन छत्तीसगढ़ के इतिहास बनतेच जात हे। हमन दूसरे के देखा-सीखी नकल उतार-उतार के एकर सुध्दता बिगाड़ के ''दोबी के कुकुर कस घर के न घाट के'' बरोबर बना डारत हन। आजकल छत्तीसगढ़ी एलबम ह तो बम गिरातेच हावय अउ छालीवुड ह तो इहां के संसकिरती के, लोककला के फोकला निकालत हावय।

हमर देस लोकतंत्र देस हावय। हम ल जम्मो धरम ल माने के अधिकार, भाखा, खाए-पिए के हक हावय। त एकर पाछू इंहा के संसकिरती, भाखा ल खिचरी बना देबो का? इंहा के बिहाव के नेंग-जोग, चुलमाटी, पस्तेला, भड़ौनी, छट्ठी-बरही जेन ल मेटाय बर हमन हमरेच गोंड़ म टंगिया मारत हन। इंहा के जम्मो चिनहा बाखा, संस्कार ल हमर हाथ म गंवावत जावत हन त काल के दिन म ये सब ल गोड़ म खोजबो त पाबो? का छत्तीसगढ़ के इही दुरगति करे बर हमन छत्तीसगढ़ म जनम धरे हन? का हमन ल छत्तीसगढ़िया कहाए बर, छत्तीसगढ़ी बोले बर सरम लागथे? ''घर जोगी जोगड़ा'' कस ये भुइंया के हाल होवत जात हे। कभू सोंचे हन ए म हमर कतका हाथ हे? का ए भाखा, संस्कृति ल सहेज के राखे के जुवाबदारी हमर नई बनय? का ए भाखा, संस्कृति ह देहतिया, गंवईहा मन के चिन्हारी आय? का हमन हमर भाखा, संस्कृति लोककला ल दूसर भाखा-बोली, पहिराव, ओढ़ाव, संस्कार संग मिंझार के ''दार-भात खिचरी'' बना देबो? फेर हमर का चिन्हारी रइही? अगर दार-भात खिचरी बनानच हे त अपन भाखा के, बोली के लोककला के, संस्कृति के, खान-पान के, पहिराव-ओढ़ाव के खिचरी बनावन अउ छत्तीसगढ़ के आत्मा ल जियत राखन। जोहार छत्तीसगढ़।

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देशबंधु/मड़ई ले संकलित : 
भागीरथी आदित्य ग्राम-अन्दोरा, गरियाबंद

रविवार, 16 मार्च 2014

सराररा सुन ले मोर कबीर

होली का पर्व अटूट प्रेम का प्रतीक है। भक्त पर भगवान का अटूट प्रेम। प्रकृति भी प्रेम-रंग से सराबोर हो जाती है। पलास वृक्ष के लाल पुष्प- गुच्छों की छटा, भौरों का गुंजार, कोयल की मीठी कूक जन-मन में अद्भुत खुशियों का संचार करती है। लोग झूमते हैं, गाते हैं, एक-दूसरे से गले मिलते हैं जिससे शारीरिक ऊष्मा में वृद्धि हो जाती है। इस ऊष्मा का शमन करने के लिए पलास के रंग का एक-दूसरे पर छिड़काव कर स्नान किया जाता है। ताकि बंधुत्व (प्रेम) भाव का जोश लंबे समय तक बना रहे। लिया है।


आप भी इस बात से परिचित होंगे कि- होली में फाग-गीत गाने के पूर्व कबीर के दोहे बोले जाते हैं और दोहे के पूर्व-‘सनु ले सराररा मोर कबीर’! कहा जाता है। फाग-गीत में कबीर का क्या संबंध है और कबीर से सराररा का क्या संबंध हो सकता है? प्रत्येक फाग-गीत गायकों के द्वारा इस परंपरा का निर्वहन किया जाता है। चूँकि परंपराएँ जन-कल्याण के लिए होती हैं। इस लिए इस परंपरा का भी कोई कल्याणकारी उद्देश्य होगा। इस पर भी विचार किया जाना चाहिए ।
आज तक के इतिहास में कबीर वह व्यक्तित्व है जो सर्वधर्म समभाव के सिदृधांत पर चलकर बुलंदी के साथ अपनी बात समाज के सामने रखी। उन्होने जातिवाद, वर्ग भेद, पॅूंजीवाद आदि सामाजिक दोषों को कभी स्थान नहीं दिया। कारण की सभी प्राणी एक ही परमात्मा के संतान हैं।, सभी में समान गुण हैं। सभी का शरीर पंचतत्वों से बना है और अंत में पंचतत्वों में ही होना है। इसलिए सर्वशक्तिमान, चराचर के स्वामी परमपिता परमात्मा से अटूट प्रेम करने का संदेश आजीवन समाज को देते रहे। यही जीवन कल्याण का वह मार्ग है जो आत्मा को परमात्मा से जुड़ना है। शायद इसी भाव धारा के कारण फाग-गीतों के पूर्व कबीर के दोहे प्रतीकात्मक रूप से बोले जाते हैं ताकि समस्त प्राणी जगत में परस्पर प्रेम का संदेश फैले। 

दूसरी बात कबीर का सराररा से संबंध की है, तो इस जानने के लिए कृपया आगामी होली पर्व की प्रतीक्षा करें ....

चन्द्रकुमार चन्द्राकर 
अर्जुन्दा
दिनांक - १६-०३-२०१४

शनिवार, 15 मार्च 2014

श्री विमल वैदिक सेवा आश्रम पैरी

धर्मप्राण देश भारत सदैव से शांतिमय जीवन का पक्षपाती रहा है, किंतु वर्तमान परिवेष में आतंकवाद, भ्रष्टाचार, अनैतिकता आदि पैशाचिक प्रवृत्तियों ने हमारे जीवन में जड़ें जमा ली है। इस परिस्थिति में आज समस्त राजनैतिक नेताओं एवं धर्मप्रिय संतों का दायित्व बनता है, कि हम भारत वर्ष के उस स्वर्णिम अतीत की याद करते हुये तत्कालीन शांति व्यवस्था की पुर्नस्थापना हेतु प्रयास करें। 

इसी उद्देश्य से हमारी समिति ने पुण्य सलिला तांदुला नदी के पावन तट पर स्थित श्री विमल वैदिक सेवा आश्रम पैरी को छत्तीसगढ़ के महान तीर्थ के रूप में विकसित करने हेतु आश्रम के स्वरूप में आमूल-चूल परिवर्तन करने का निर्णय लिया है।

आश्रम के उद्देश्य :
सर्वमान्य जनता का नैतिक, आर्थिक, सामाजिक, विकास कर सुखी व समृद्ध समाज की रचना समिति का उद्देश्य है। इसे निम्नांकित बिंदुओं में प्रस्तुत किया जाता है-

नैतिक : ग्रामों व नगरों में श्रीरामायण सेवा समिति की स्थापना कर रामायण के माध्यम से स्वच्छ एवं आदर्श समाज की संरचना, सत्साहित्य का प्रकाशन व प्रचार-प्रसार। पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन। गौरक्षा हेतु गौशाला का संचालन। 

आर्थिक : बेकारी उन्मूलन और गरीबी के निराकरण हेतु ग्रामोद्योग की स्थापना। कुटीर उद्योगों का संचालन। कुटीर उद्योग के अंतर्गत सिलाई-कढ़ाई, अगरबत्ती, मोमबत्ती, सर्फ, साबुन, हवन सामाग्री, काढ़ा आदि बनाने का काम प्रारंभ में किया जाना है इसके सिवाय वेल्डिंग, फिटिंग आदि का प्रशिक्षण। 

स्वास्थ्य संवर्धनः सर्वसामान्य जनता को स्वस्थ रखने हेतु स्वास्थ्य संवर्धन कार्यक्रम के अंतर्गत चिकित्सा सेवा की व्यवस्था एवं व्यायाम व विभिन्न आसनों का प्रशिक्षण। 

सामाजिक : व्यसनमुक्ति (शराब, बिड़ी, गाँजा, मांस, जुआ, चाय तथा व्यभिचार का परित्याग)। 

पृष्ठभूमि 
सन् १९६१ की घटना है। संत विनोबा भावे अखिल भारतीय पद यात्रा पर थे गाँव-गाँव चलकर समर्थ लोगों से भूमिदान प्राप्तकर जरुरतमंद गरीबों के बीच जमीन वितरण कर रहे थे। इस दल में हमारे गुरुदेव ब्रम्हलीन स्वामी सुजनानंद महाराज भी शामिल थे। ज्ञातब्य हो कि स्वामीजी महाराज सर्वोदयी विचार से प्रभावित होने के नाते भूदान यज्ञ के सृजेता श्री विनोबा जी के सानिध्य में राष्ट्रसेवा में लगे हुये थे। यह दल दुर्ग जिले की यात्रा पर था। इस तारतम्य में एक पड़ाव बालोद विकासखंड के ग्राम लाटाबोड़ में था। यहाँ पर किसानों का विशाल सम्मेलन आयोजित था। इस सम्मेलन को संत विनोबा जी के साथ-साथ अन्य सर्वोदयी नेताओं ने भी संबोधित किया। संबोधन करनेवालों में एक वक्ता स्वामी सुजनानंद जी महाराज (श्री हीरालाल शास्त्री) भी थे। श्री शास्त्री जी के वक्तृत्व शैली से पूरा समुदाय मोहित हो गया। उन्होंने रामचरित मानस के आधार पर सर्वहित की बात रखी। हजारों श्रोताओं में ग्राम पैरी निवासी श्री कलीराम जी पटेल भी थे। श्री पटेल ने स्वामीजी से अपने ग्राम पैरी चलने का अनुरोध किया। श्री कलीरामजी के सादगी पूर्ण व्यवहार एवं रामायण के प्रति श्रद्धा देखकर शास्त्री जी महाराज उनके साथ दिनांक २१-०१-१९६१ को पैरी आ गये। रात में उनका प्रवचन पहली बार पैरी के गुड़ी चौक में हुआ। रामायण के माध्यम से कुण्ठाग्रस्त एवं दिग्भ्रमित समाज कैसे सुधर सकता है इस प्रसंग पर प्रवचन हुआ। यह प्रसंग ग्रामीणों को प्रभावित कर गया और उसी रात ग्राम के ८० भाई-बहन मांस-मदिरा एवं बिड़ी-तम्बाकू का परित्याग करते हुये रामायण सेवा समिति के सदस्य बन गये। 

प्रातः शास्त्री जी महाराज कलीराम जी के साथ तांदुला नदी जो ग्राम पैरी के समीप बहती है, स्नान के लिये गये। नदी किनारे बीहड़ जमीन जहाँ साँप, बिच्छु एवं अनेक प्रकार के जहरीले जन्तुओं का डेरा था को देखकर महाराज जी ने जिज्ञासा व्यक्त की कि यह जमीन किसकी है। अगर यह जमीन दान में मिल सके तो इस पर एक बढ़िया आश्रम का निर्माण किया जा सकता है, उसी दिन जमीनवालों से संपर्क हुआ। शास्त्री जी के विचार से प्रभावित दान-दाता अपनी जमीन देने तैयार हो गये। धार्मिक कार्यों के लिये दान देनेवाले दाता है-श्री तनगूराम साहू, श्री मनहरण लाल साहू, श्री उजियालिक साहू, श्री चंदूलाल साहू, श्री तुलसी राम साहू आदि। घासफूस की सफाई कर पहले वर्ष इस स्थान पर ग्यारह कुण्डीय गायत्री महायज्ञ संपन्न हुआ। तदंतर सन् १९७५ में १००१ कुण्डीय विशाल गायत्री महायज्ञ का आयोजन किया गया जिसमें स्वामी ओमप्रकाशानंद सरस्वती, स्वामी दिव्यानंद सरस्वती, विश्‍वबंधु शास्त्री, सत्यमित्र शास्त्री आदि उद्भट विद्वान उपस्थित हुये थे। इसी कार्यक्रम में तत्कालीन मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री पं.श्यामाचरण शुक्ल का भी इस पावन भूमि पर शुभागमन हुआ था एवं उन्होंने भूमिहीनों को पट्टा वितरण किया था। इसी समय आश्रम पहुँच मार्ग का २-३ दिनों के अंदर तीव्र गति से निर्माण किया गया था। तब से लगातार यह आश्रम इस क्षेत्र में स्वामी सुजनानंद महाराज के निर्देशन में निर्व्यसनी समाज निर्माण की दिशा में गतिशील है। दान में प्राप्त भूमि पर आश्रम के अनुरूप निर्माण कार्य किये जा रहे हैं। इसी बीच १० अगस्त १९९६ को हमारे गुरुदेव ब्रम्हलीन हो गये। ब्रम्हलीन होने के पूर्व गुरुजी ने श्री विमल वैदिक सेवा आश्रम पैरी के लिये समिति तथा श्रीराम जानकी आश्रम सगनी के लिये ट्रस्ट का गठन कर दिया। तब से श्री विमल वैदिक सेवा आश्रम पैरी का संचालन समिति द्वारा किया जा रहा है, एवं दान में प्राप्त भूमि एवं सारी संपत्ति का स्वामित्व श्रीरामायण सेवा समिति के आधीन है। वर्ष भर आश्रम में आयोजित होनेवाले कार्यक्रमों एवं नियमों की जानकारी निम्नानुसार है-

आश्रम की नियमावली
१. बिना अनुमति रात्रि ९ बजे के पश्‍चात् आश्रम में प्रवेश वर्जित है। 
२. आश्रम परिसर में शराब, बीड़ी, गाँजा, तम्बाकू, चाय आदि नशीले पदार्थों का सेवन वर्जित है। 
३. आश्रमवासी समस्त भाई-बहनों से प्रातःकालीन प्रार्थना, संध्याकालीन प्रार्थना एवं दैनिक यज्ञ में सम्मिलित होने की अपेक्षा की जाती है। 
४. आश्रम में सदैव शांति बनाये रखने का प्रयास किया जावे। बाहर से आनेवाले बच्चों को भी शोरगुल करने की अनुमति नहीं है। 
५. दर्शनार्थी दानराशि दानपेटी में ही डालें। बड़ी राशि दान करने के इच्छुक भक्त व्यवस्थापक से संपर्क करें एवं दान की रसीद प्राप्त करें। 
६. सदस्य बनने के इच्छुक भाई बहन व्यवस्थापक से संपर्क करें। 
७. आश्रम परिसर को सुन्दर व स्वच्छ बनाये रखने में सभी सहयोग करें। 
८. अपनों से बड़ों के प्रति सम्मान, छोटों के प्रति स्नेह व बराबर उम्रवालों के प्रति सद्भावना का व्यवहार करें। सभी से नम्रता का व्यवहार करें।
९. अनजान व्यक्ति को आश्रम में रुकने हेतु अध्यक्ष एवं संचालक के निर्देशानुसार अनुमति प्राप्त करना होगा।

दैनिक कार्यक्रम-
१. प्रातः ०४.०० बजे जागरण, नित्य प्रार्थना एवं चिंतन। 
२. प्रातः ०६.०० बजे सामूहिक सफाई। 
३. प्रातः ०७.०० बजे स्नान, ध्यान एवं पूजा। 
४. प्रातः ०८.०० बजे मंदिर में पूजा। 
५. प्रातः ०९.०० बजे दैनिक गायत्री महायज्ञ। 
६. प्रातः १०.०० बजे स्वल्पाहार। 
७. प्रातः ११.०० बजे आध्यात्मिक चर्चा। 
८. दोपहर ०१.०० बजे भोजन एवं विश्राम। 
९. दोपहर ०३.०० बजे प्रवचन एवं अध्यात्म चर्चा। 
१०. संध्या ०५.०० बजे वायु सेवन भ्रमण। 
११. संध्या ०६.०० बजे मंदिरों में पूजा। 
१२. संध्या ०७.०० बजे नित्य प्रार्थना, भजन एवं प्रवचन। 
१३. रात्रि ०८.०० बजे भोजन। 
१४. रात्रि ०९.०० बजे विश्राम। 

छत्तीसगढ़ शासन द्वारा सहायता-यहाँ पर माघ मेला का
आयोजन हेतु संस्कृति, पर्यटन एवं पुरातत्व विभाग द्वारा प्रतिवर्ष ५०००० रू. का अनुदान प्राप्त होता है। इस राशि को बढ़ाने हेतु समिति द्वारा शासन से लगातार माँग की जा रही है। समिति इस क्षेत्र को पर्यटन स्थल घोषित करने की माँग भी लगातार रख रही है जिससे यह मेला राजिम मेला का स्वरूप ग्रहण कर सके। 

आश्रम के मुख्य आयोजन-
१. वार्षिकोत्सव माघ पूर्णिमा मेला, त्रिदिवसीय सत्संग समारोह माघ शुक्ल १३ से पूर्णिमा तक।
२. चैत्र नवरात्रि विश्‍वकल्याण हेतु ज्याति कलश स्थापना एवं रामनवमीं महोत्सव।
३. गुरु पूर्णिमा-आषाढ़ पूर्णिमा पर क्रमशः पैरी आश्रम/सगनी आश्रम में आयोजन।
४. तुलसी जयंती समारोह-श्रावण शुक्ल सप्तमी
५. क्वॉंर नवरात्रि मनोकामना ज्योति कलश। 
६. शरदपूर्णिमा-मानस मर्म विवेचन शिविर श्रद्धालुओं की माँग के अनुसार स्थल निर्धारण। 
७. त्रिदिवसीय साधना शिविर शरद् पूर्णिमा महोत्सव के तत्काल पश्‍चात्। 

नोट-
१. सत्र के मध्य में प्रवचन कार्यक्रम रखने हेतु अध्यक्ष से संपर्क करें। 
२. आश्रम में पुँसवन, यज्ञोपवीत, मुंडन, आदर्श विवाह, विद्यांरभ, अस्थिविसर्जन के लिये अध्यक्ष से संपर्क करें। 

विगत वार्षिक सम्मेलन में आशीर्वन देनेवाले संत एवं राजनेता

संतगण-
श्री विष्णु अरोरा, सुश्री उमाभारती, स्वामी ओमप्रकाशानंद सरस्वती, स्वामी दिव्यानंद सरस्वती, विश्‍वबंधु शास्त्री, सत्यमित्र शास्त्री, पं.चंद्रप्रकाश कौशिक, श्री असंग साहेब, चंद्रशेखर शास्त्री, गिरिजादेवी शर्मा, आत्माराम कुंभज, संत पन्नालाल ‘सूरदास’, संत नेतराम ‘सूरदास’, श्रीमती शकुंतला देवी वैष्णव, श्री राजन महाराज, रामबिहारी रामायणी, राघवजी, सुश्री जानकी देवी, सिद्धबाबा इलाहाबाद, कमलनारायण आर्य, जगत गुरु स्वामी डॉ. जीवनानंद चैतन्य (ओंकारेश्‍वर), साध्वी दीदी सत्यप्रिया जी (वृन्दावन)। 

राजनेतागण-
पं. श्यामाचरण शुक्ल (मुख्यमंत्री, मध्यप्रदेश शासन), डॉ. रमन सिंह (मुख्यमंत्री, छत्तीसगढ़ शासन), अरविंद नेताम (केंद्रीय मंत्री नई दिल्ली), सोहन पोटाई (सांसद कॉंकेर), वासुदेव चंद्राकर (अध्यक्ष, जिला कॉंग्रेस कमेटी दुर्ग), घनाराम साहू (विधायक) ताराचंद साहू (विधायक), डॉ. दयाराम साहू (विधायक, उपाध्यक्ष भाजपा) श्रीमती रमशीला साहू (मंत्री महिला एवं बाल विकास विभाग, छत्तीसगढ़ शासन), श्रीमती झमिता साहू (अध्यक्ष, जिला पंचायत) बृजमोहन अग्रवाल (संस्कृति एवं पर्यटनमंत्री) ननकी राम कँवर (गृहमंत्री, छत्तीसगढ़ शासन) विरेन्द्र साहू (विधायक)।

भारतीय गणना

आप भी चौक गये ना? क्योंकि हमने तो नील तक ही पढ़े थे..!