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गुरुवार, 16 अप्रैल 2015

माटी महतारी

सोनारू तँय ह बइठे-बइठे काय सोचत हाबस। बेटा, जऊन होगे तऊन होगे। अब तोर सोंचे ले हमर जमीन ह नइ आवय। जा रोजी-मंजूरी करके ले आ बेटा, पानी-पसिया पीबो। निहीं त भूखे मरे ल परही। थोर बहुँत पढ़े-लिखे रहितेंव रे सोनारू.. त तोर बाप, कका अऊ गाँव के मन ल समझातेंव। दलाल के बात म नइ आतेंव।
बबा हमन तो फेक्टरी म माटी महतारी ल बेंच के अपन गोड़ म टँगिया ल चला डरे हाबन अऊ एकर भुगतना ल हमन सात पीढ़ी ले भुगते ल परही बबा। सिरतोन काहत हाबस सोनारू... मंद पीके तोर बाप ह करनी करे हावय अऊ हमन ल भुगते ल परही रे। चार ठन खेत ह हमन ल पोसत रिहिस बेटा..! ‘माटी ह महतारी आवय’ अऊ सबके पेट ल भरथे रे, फेर एक ठन फेक्टरी ह एक मनखेच ल मजदूरी के काम दिही जेमा घर के दस मनखे के पेट ह नइ पलय बेटा..! सिरतोन काहत हाबस बबा फेक्टरी म काम करे बर पढ़े-लिखे अऊ सिच्छित चाही हमन तो अप्पड़ आन बबा। फेर साहेब-अधकारी मन तो पढ़े-लिखे हावँय तभो ले हमर मन बर नइ सोंचिन। हमर दू फसली भुँईंया ल बंजर बता के अँगठा चपका दीन। (ओतके बेर सोनारू के काकी आइस)- ‘तोर कका ह चार दिन होगे, बेटा नइ आय हे गा। चार दिन होगे घर म हँड़िया नइ चढ़े हाबय।’ जानत हँव काकी... फेर काय करहूँ थोरकन तहसीली म जाके पूछताछ करबे तहॉं कुछु भी कहिनी बना के जेल म ओइला देवत हाबय काकी।

कोतवाल ह हॉंका पारत रिहिस। चिचियावत सोनारू के घर करा अइस, सोनारू पूछथे- ‘अब काके बईठका आय बबा।’
-‘काला बतावँव रे सोनारू, हमन ल रद्दा बतइया समारू गुरुजी ह घलो अब इहॉं ले चल दिही।
-‘काबर?’
-‘ओकर बदली करदीन बेटा..! गुरुजी मन मुआवजा ल नइ ले हाबय अऊ गाँव वाला मन ल सीखोवत हाबय कहिके उही पूछे खातिर तोर ककामन गे रिहिस। तेला जेल म डार देहे।
-‘साहब मन हमर मन के बात ल काबर नइ सुनय कका।’
-‘अरे बेटा, हमन गरीब किसान आवन गा... साहब मन ल काय दे सकबो। फेक्टरी वाला मन कलेक्टर ले लेके पटवारी ल चार चकिया दें हाबय। तेकर सेती तो ओमन रोज गाँव के चक्कर मारथें। गाँव के दलाल मन घलो मालामाल हो गेहें।’
दस बजे बिहनिया खा-पी के गुड़ी म सकलाहू होऽऽऽऽऽ..! बारा गाँव के मनखे मन घलो आहीं होऽऽऽऽऽ..! कोतवाल ह पूरा बस्ती म हाँका पार के चल देथे। ओतके बेरा सरपंच ह सोनारू के बबा करा आइस।
-‘पा लगी मंडल कका।’
-‘खुसी रा बेटा..! अब कइसे करबो कका अब तो कइसनों करके हमन ला फेक्टरी वाला मन ल भगाय ल लागही बेटा! कतको मन तो मुआवजा लेके पइसा ल खा डरे हावय, आधा झन मन बाँचे हावय। फेक्टरी के खुले ले कका कोसा पालन केन्द्र ह घलो बरबाद हो जही। फेक्टरी के गरमी म कोसा कीरा मर जही, त कँड़ोरो के लगाय रुपिया ह बरबाद हो जही। सरकार के काय जाही बेटा..! जनता के कमई ल पानी कस बोहाही नहीं त का। कतको बेरोजगार होही त ओला काय फरक परही। फेक्टरी वाला मन नोट के गड्डी ल धराही तहॉं सब चुप हो जहीं। ले कका बिहनिया कुन गुँड़ी म आ फेर।

होत बिहनिया गाँव म चहल-पहल सुरू होगे। काबर बारा गाँव के लोगन मन आय के सुरू करदे रिहिस। दस बजते साठ गुड़ी म मनखे मन खमखमागे। दुदमुहॉं लइका मन ल पीठ म बॉंध केझॉंसी के रानी बरोबर माईलोगिन मन आय रहिन। काबर कोंनो महतारी ह अपन लईका के पेट म लात नइ मार सकँय। सरपंच ह कथे- कइसे बतावव काय करबो तऊन ल.. ओतके बेरा एक ठन चार पहिया ह आके ठाड़ होगे। सब उही ल देखे बर धरलीन। सोचे लगीन फेर पुलिस वाला मन पकड़े बर आवत हावँय। कोंनो-कोंनो मन तो कइथे- आज मारबो नहीं त मरबो। फेर अपन महतारी ल बेचन निहीं। गाड़ी ले श्रीवास्तव साहब ह उतरीस जऊन ह गाँव वाला मन के हिमायती राहय। सरपंच कइथे- ‘नमस्ते साहब..! कइसे आय हावव..!’

मँय ह ये बताय बर आय हाबँव कि मोर इँंहा ले बदली होगे, अब तुमन कइसे करहू तेकर फैसला ल तुही मन ल करे बर परही। मोला ससपेंड घलो कर सकत हाबय। फेर मँय ह कइसनों करके जी-खा लुहूँ। तुमन ल अपन लड़ई खुदे लड़े बर परही। काबर दलाल मन तुँहरे घर म बइठे हाबय। सबला मोर राम-राम। मँय ह जावत हँव फेर एक ठन बात काहत हँव सबला बेचहू फेर धरती दाई, अन्न देवइया ल फेक्टरी बर झन बेचहू। श्रीवास्तव बाबू ह गाड़ी म बइठ के लहुटगे। थोरकन बेर-बर सन्नाटा ह पसरगे। काबर? पढ़े-लिखे एक झन रद्दा बतइया रिहिस वहु ह अब नइ रइही। समारू गुरुजी ह अपन बदली रोकवाय बर उही ह साहर म साहब मन के चक्कर काटत हावय।

मंडल ह खड़ा होके कइथे- अरे बाबू हो! हमन का चार दिन जीबो के आठ दिन, फेर तुमन ह मंद महुआ म मुआवजा ल लेके उड़ा डरे हाबव। फेर अभी आधा आदमी ह पइसा नइ ले हाबय। तुमन ह पइसा कइसनों करके लहुटाहू। आयतु ह खड़ा होके कइथे- दू साल होगे खेत मन परिया परे हाबय त पइसा ल कइसे लहुटाबो। सरंपच ह कइथे- ‘मैं ह एक ठन बात काहत हाबँव। हमन नंदिया ल बॉंधबो अऊ फेक्टरी बर जमीन हावय तेमा बॉंध बनाबो अऊ बढ़िया फसल लेके कम्पनीवाला के पइसा ल लहुटाबो नंदिया के तीरे-तीरे फलदार रूख लगाबो। करजा हाबय तऊँन ल सब मिल के हमन छूटबो तब ए माटी महतारी ह बॉंचही अऊ एकर सिवाय हमन मन करा कोन्हो चारा नइये।

तब सोनारू ह खड़े होके कइथे सरपंच कका ह बने काहत हाबय। अगर हमन एक होके करजा ल नइ छूटबो त हमन सदादिन बर बनिहार रहिबो। फेक्टरी के पानी ह नंदिया म मिलही त वहु ह जहर बन जाही। हवा ह घलो बिगड़ जही। सब मनखे मन चिचियाइस। हमन ल मँजूर हाबय। मँजूर हाबय। सोनारू ह फेर कइथे- हमन तो नइ पढ़ेन फेर अपन लइका मन ल इसकुल भेजबो। पढ़ाबो तभे हमन ला फेर कोनो दलाल मन कोरा कागज मन अँगठा नइ लगवाही। इही भुँईंया के सेवा करत अपन ये बारा गाँव ल फेक्टरी के गुलामी ले अजाद कराबो। मंद मउहा ल पियइया हो अब तुमन ल सीखे ल लागही कि एक फेक्टरी ह एक झन ल कुली के काम दिही हम अप्पड़ के खरही नइ गॉंजय। ओमन ल तो पढ़े-लिखे आदमी चाही। फेर हमर धरती महतारी ह अप्पड़ अऊ पढ़े-लिखे सबला पोसथे।

सरपंच ह कइथे- त फेर सब साबर, कुदारी, रापा, टँगिया, झउँहा धरके परनदिन पॉंच बजे पहुँच जहू। ग्यारा बजे फेक्टरी के भूमिपूजन हाबय त ओकर पहिली हमन ल गड्ढा खोदना हाबय। अब सब अपन-अपन घर जावव। अतका जान लेव हमन ल ओ दिन मरे ल घलो पर सकथे अऊ मारे ल घलो लागही। काबर फेक्टरी वाला मन लाव-लसकर लेके आही। सब जनता के भुँईंया के कसम खाके जय-जयकार करत अपन-अपन घर लहुटगे। मंडल ह कइथे- अब तो ये दोगला मन ल मारेच बर लागही बेटा..! जब अँगरेज ल हमन भगा सकथन त ए फेक्टरी वाला मन कोन खेत के मुरई आय।

तीसर दिन ग्यारा बजे फेक्टरी वाला मन बड़े-बड़े गाड़ी वाला मन घलो रिहिस गाँव वाला मन सब काम ल छोड़-छॉंड़ के देखे लगीस हजारों झन मनखे सबके हाथ म हँथियार। साहब मन कॉंपे ल धरलीस, पछीना घलो बोहाय ल धर लीस। एक झन दलाल ह कइथे- साहेब, काली रतिहा ग्यारा बजे गेहन त कॉंही नइ खनाय रिहिस अऊ कतका बेर सउँहो तरिया खनागे। बड़े साहब के मुहूँ ले बक्का नइ फूटिस काबर ओहा छै महीना पहिली पटवारी अऊ डिप्टी कलेक्टर के हालत ल देखे रिहिस दुनों झन के मुहूँ लहूलुहान। थोरको चिन्हारी नइ रिहिस साहब ह चुपचाप गाड़ी म बइठके ड्राइवर ल गाड़ी चालू करे बर कइथे। साहब के देखते-देखत सब ह ओकर पीछू-पीछू गाड़ी म बइठ के लहुटगें। समझगें एक ठन लकड़ी ल तो आसानी से तोड़ डारबो फेर लकड़ी के बोझा ल नइ टोर सकन। गाँव वाला मन बड़ खुस होइस अऊ तिहार असन नाचे लगीस काबर? ओमन अपन सात पीढ़ी ल बनिहार बनाय ले बचा लीन। बॉंध बने ले फसल लहलहाना सुरू होगे। मंद मउहा ऊपर घलो रोक लग गे। दलाल मन गाँव छोंड़ के भाग गे। सब अपन लइका मन ल इसकुल भेजे लगीन, ताकि फेर कोनो दलाल मन कोरा कागज म अँगठा झन लगवाय।
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गीता शिशिर चन्द्राकर, भिलाई-३ देशबंधु मड़ई अंक में प्रकाशित

बुधवार, 25 फ़रवरी 2015

सतरंगी फागुन के रंगरेला होली

सँझा होवत गाँव के गुड़ी म लइका जवान अऊ सियान सबो जुरियाथँय। इही समे एक ले बढ़ के एक फागगीत सन रंग सिताथँय, गुलाल उड़ाथें। लइकामन के पिचकारी घलो उनिहाय रथँय। रंगे-रंग म चोरबोराय लइकामन नाचे-कूदे म बियस्त रथँय। इलका हो सियान, बेटा जात हो या माई लोगन हो, अमीर हो या गरीब। सब के सब रंग-गुलाल म बोथाय फागुन के छतरंगी तिहार होली ल सारथक करथँय। कोनों रंग या गुलाल कोनो ल रंगे बर नइ बिसरय। येकर ले इस्पस्ट हे के हम होली के यथारतता ल समझन अऊ सबर दिन कायम रखन, तभे हमर होली मनई सारथक होही। 
हमर छत्तिसगढ़ी रीति-रिवाज, परम्परा अऊ संस्कृति के सबो सार बात ह तिहार-बार समाय रथँय। वइसने छत्तीसगढ़ ल तिहार-बार के गढ़ कहे जा सकथे। बारो महीना तिहार मनाय जाथें इहाँ। जनम के सिधवा महिनतकस छत्तीसगढ़िया भाईमन के परेम अऊ सादगी तिहार-बार म झलकथे। लोगन एक तिहार मनाय के बाद अवइया तिहार के अगोरा म हँसी-खुसी समे बिताथे। हमर गाँव-देहात म बइसाख के अक्ती ले तिहार-बार के मुंड़ा घेराथँय जेन हा फागुन के होली म सिराथँय। ये रंगरेला होली फागुन के अगोना पाख के पुन्नी म मनाय जाथँय। होली परब फूलमाला के एक निक-सुग्घर पिंयर गोंदा आय। 
होली ले जुड़े किवदंती 
हर तिहार धरम, दरसन अऊ अधियात्म म जुड़े होथे। कोनों न कोनों रीति अऊ नीति तिहार बार म बिलकुल समाय रथँय। मनुख जात ल प्रकृति ले भेंट संसकिरिति के झलक तिहार म देखे ल मिलथे। रंग-रंग के किवदंती हमर तिहार-बार के संबंध म सुने ल मिलथँय। जइसे एक पौरानिक कथा ले सुने ल मिलथे कि सतजुग म सिरीहरी बिसनु के नरसिंह अवतार के कथा परसंग ले होली मनाय के परम्परा जुड़े हावय। कहे जाथँय दानवराज हिरन्यकस्यप जेन ह खुद ल भगवान मानँय। अपन राज म अपने नाम जपे के प्रचार-प्रसार करे रिहिस। प्रजा राजा के डर म भगवान के नाम बिसरान लागिस। फेर उही राजा के बेटा प्रहलाद भगवान बिसनु के परमभक्त होइस। प्रहलाद के हरिनाम पिता हिरन्यकस्यप ल थोरिक नइ भाइस। राजा बेटा प्रहलाद के ऊपर अतियाचार करिस। आखिर म राजा अपन बहिनी होलिका मेर प्रहलाद के हरिभक्ति के बात रखिस। होलिका ल बरम्हा ले वरदान मिले रिहिस के आगी (अग्निदेव) वोला कभू नइ जला सके। बरदान पाये ले होलिका ल बड़ा गरब रिहिस। भाई के आगिया मुताबिक बालक प्रहलाद ल गोदी म ले के बरत आगी म बइठगें। भक्त प्रहलाद बंबर असन बरत आगी ले बाँचगे पर अहंकार अऊ अति-अनुचित बिसवाँस म माते होलिका जर के राख होगे। येकर ले इही पता चलथँय के ईस्वरनिस्ठा ल पाप अऊ अहंकार दुनों मिलके घलो नइ पछाड़ सकँय। इही समे ले समाज म फइले बुराई ल अच्छाई ले अऊ पाप ल पुन्य ले खतम करे के उद्देस्य ले होलिका दहन के परम्परा चल पड़ीस। आज गाँव-गाँव म फागुन लगते एक जगा छेना-लकड़ी सकेलथें। अंजोरी पाख के पुन्नी रात में लइका-सियान सकला के हुम-धूप देथे। गाँव-परमुख या बइगा हर सकेलाय लकड़ी म आगी ढिलथे। इही बेरा जम्मो झन मदमस्त हो हाँसी-खुसी ले झाँझ-मँजीरा अऊ 
ढोल-नँगारा बजावत, अलाप मारत, सुमरनी फाग गीत गाथँय:- 
सदा भवानी दाहिनी सन्मुख गवरी गनेस।
पांच देव मिल रक्छा करे, बरम्हा, बिसनु, महेस।
ये मनाबो रे ल, परथम चरन गनपति ल
काकर बेटा गनपति भव, काकर भगवान
काकर बेटी देवी कारका, काकर हनुमान
परथम चरन...
गवरी के बेटा गनपति भव, कौसिलिया के भगवान
भैरव की बेटी देवी कारका, अँजनी के हनुमान
प्रथम चरन गनपति ला...। 
लोगन होलिका दहन के दूसर दिन ओ जगह म जाके जुड़ाय राख ल चिमटी म धर के एक-दूसर के माथा म लगा के होली के बधई देथँय। इही राख ल घाव-गोंदर, खस्सू-खजरी म चुपरे ले घाव माड़ जाथँय। ये ह एक गँवइहा बिस्वास आय।
रंग-रोगन के गरीब तिहार 
होलिकादहन के दूसर दिन धुरेड़ी होथे। ये दिन रंग-गुलाल के दिन आय। ये दिन ल गाँव-गाँव म नोनी-बाबू, लइका-सियान मिलजुल के रंगहा-तिहार के रूप म मनाथें। सुने ल मिलथे के दुवापर जुग म भगवान सिरी किरिस्न बृन्दाबन म गोप-गुवालिन सन बन के सुन्दरता ल देख भाव-विभोर हो के नाचिन- गाइन अऊ एक परम्परा चल पड़िस। हमर गाँव देहात म ये दिन लोगन के मन बडा प्रफुल्लित रथँय। एक दूसर ऊपर रंग-गुलाल लगाथँय। नत्ता-गोत्ता मुताबिक एक-दूसर ल पयलगी करथँय। लइकामन के लइकापना धुर्रा अऊ चिखला म इही दिन घलो देखे ल मिलथे। ये तिहार के सबसे बड़े बिसेसता ये आय के ये गरीब के तिहार आय। कम खरचा-पानी म बने-बने निपट जथें। एक-दूसर याने अमीर-गरीब रंग-गुलाल लगइक-लगा होथँय। अमीरी-गरीबी के कोनो बिलग चिन्हारी नइ होय। जवनहा संगी मन बिहनिया नौ-दस बजे ढोल-नँगारा अऊ झाँझ-मँजीरा बजावत, रंग-गुलाल म गोड़-मुड़ बोथाय घर-घर म जा के फाग सन राग लमियाथँय-
'अरे हाँ हो .... हो 
पातर पान बंभूर के, केरापान दलगीर
पातर मुहूँ के छोकरी, बात करे गंभीर।
राजा बिकरमादित महाराजा
केंवरा लगे तोर बागों में
के ओरी बोय राजा केकती अऊ केंवरा
के ओरी अनार महाराजा
ए कि एओरी बोये राजा केकती अऊ केंवरा
दुई ओर अनार महाराजा।
केंवरा लगे हे तोर बागो में ... राजा बिकरमा...।'
सँझा होवत गाँव के गुड़ी म लइका जवान अऊ सियान सबो जुरियाथँय। इही समे एक ले बढ़के एक फागगीत सन रंग सिताथँय, गुलाल उडाथँय। लइकामन के पिचकारी घलो उनिहाय रथँय। रंगे-रंग म चोरबोराय लइकामन नाचे कूदे म बियस्त रथँय। लइका हो सियान, बेटा जात हो या माई लोगन, अमीर हो या गरीब सब के सब रंग-गुलाल म बोथाय फागुन के छतरंगी तिहार होली ल सारथक करथँय। कोनों रंग या गुलाल कोनो ल रंगे बर नइ बिसरय। येकर ले इस्पस्ट हे के हम होली के यथारतता ल समझन अऊ सबर दिन कायम रखन, तभे हमर होली मनई सारथक होही। बबा उमर के मन हू...हू...हू... करत इही बेरा अपन सियनही जिनगी के अनुभव ल नवा पीढ़ी ल बाँटत, डंडा नाचत, संदेस पठोथँय-
'अरे हो, अरे हाँ हाँ हो
सरसती ने सर दिया, गुरू ने दिया गियान
माता पिता ने जनम दिया, रूप दिया भगवान
तरी नरी ना ना मोर न हा ना रे भाई 
ये न हा ना ना मोर ना ना रे भाई 
बड़ सतधारी लखनजाति राजा
तरी नरी हू... हू... हू..
फूटे बंधा के पानी नइ पिअँय 
टूटे चाँवर के भानस नइ खावय 
पर तिरिया के मुख नइ देखय
तरी नरी ना ना मोर न हा ना रे भाई
बस सतधारी लखनजाति...।'
रितुराज के पहुँना फागुन 
फागुन महीना रितुराज के राज म पहुँना कस आथँय। राजसी पहुँनई होथँय फागुन के। सरद-गरम मिश्रित पुरवई के रंग म सवार फागुन चंदन सही फुदकी ल निहारत मधुमास के महल म अमरथँय। रंगरेला फागुन के सुन्दरई ल देख अमराई बउरा जाथँय। कोयली के कंठ ले सिंगारगीत निकलथँय। परसा अऊ सेमर के सजई-संवरई घात सुहाथँय फागुन ला। पंदरा दिन के साँवरी सलौनी अँधियारी पाख फागुन ल बिलमाथँय, ताहन पारी आथँय चिकनी गोरी अँजोरी पाख के भला कइसे बिसरा ज ही फागुन ल। पिंयर देही छात रूपसी चंदा ह अँजोरी पाख अऊ फागुन के मेल-मिलाप देख मुस्कुरावत रथँय।
गाँव-गँवई के दरसन 
हमर गाँव-देहात म देवारी के बाद खेत-खार अऊ कोठार के बियस्तता ले घर-दुआर के बिगड़े स्थिति फागुन महीना म सुधरथँय। इही महीना ढोल-नँगारा के संग फाग गुंजन लागथँय। चौपाल के खनक बढ़ जाथे। काम-बुता ले फुरसत हो लोगन परछी अऊ चँवरा म बइठ तास म रमे रथे। पासा ढुलावत बीते खेती किसानी के दिन बादर के गोठ गोठियावत रथे। कोनों-कोनों छेत्र म गाँव भर के नवकर जइसे गहिरा, लोहार, नउ बरेठ मन के दिन-बादर (सेवा-अवधि) फागुन महीना म पूरा होथे। इही महीना म लोगन-लोगन ल मँगनी-बरनी अऊ बर बिहाव के सुरता आबे करथे, संगे-संग अवइया, चइत नवरात्रि के गोठ, खेती-किसानी के गोठ जइसे बीज-भात, नाँगर-बक्खर काँटा-खुटी, बन बुटा, मेंड़पार, माल-मत्ता (बइला-वइला) के गोठ फागुन के गोठ होथे। कमाय-खाय बर परदेस गेये लोगन फागुन के होली तिहार मनाय बर अपन जनम भुइँया जरूर लहुटथे। इही फागुन महिना म फेर एक घाँव गाँव-गँवई के दरसन होथे। 
ठेठरी रोटी के मजा 
लोगन माघ के महीना के निकलते अऊ फागुन के लगते ओन्हारी सियारी लुवत-टोरत अऊ मिंजत खानी ठुठुर-ठाठर करत लुथे-टोरथे अऊ घइरथे-सइतथे। माँघ के ओन्हारी ले ही फागुनहा होली के रोटी-पीठा के चुरई निरभर करिथे। बने-बने ओन्हारी-सियारी होथे त रोटी-पीठा घलो बने-बने चुरथे। तिली, अरसी, सरसो के तेलपइत, उरिद-मूँग दार ले बरा, लाख-लाखड़ी अऊ चना बेसन के भजिया अऊ ठेठरी जम्मो सकलाथे त होली के रोटी चुरथे। कोनों, कभू, कतको अऊ कुछु बना के खाय, चाहे झन खाय, पर तिहार बार के तेलहा रोटी राँध के खाय ल कोनों नइ छोड़ँय। अपन-अपन इच्छा अऊ हेसियत मुताबिक जरूर राँधहीं, खाहीं। बरा, सोंहारी, भजिया ह लगभग सबो तिहार म जनम लेवत रइथें पर ठेठरी ह फागुन के होली म ही अवरतथँय। दिगर तेलहा रोटी ह एक-दू दिन म लरजाये ल धरथे, फेर ठेठरी के बात अलग हे। बनाये म घला सहज। ये ल लाख-लाखड़ी या चना बेसन ल बने सान के नान-नान लोई धरके उबड़ी (उल्टी) थारी, कोपरी या चँवकी म हथेली ले, पतला-पतला डोरी असन बरे जाथे। बरे के बाद बीच ले मोड़ के एक घाँव अऊ मोड़े जाथे। ताहन फेर डबकत तेल म डार के बनाय जाथँय। येला तिहार के दिन खाले, आन दिन अऊ पंदरा-महिना दिन ले घला रख ले। कुछु नइ होवय, खावत रा ठुठुर-ठुठुर। येकर सेती सियान मन कहे हावय 'माँघ के ठुठुर-ठाठर अऊ फागुन के ठेठरी।'
माँस-मंदिरा के अवगुन 
सुग्घर रूप से फागुन महीना के गुनगान होली म जबड़ अवगुन घला समाय रथे। जेमा माँस-मंदिरा के उपयोग परमुख हावय। कइसन तो अइसे समझे के होली ह पिये-खाय के तिहार आय। ये माँस-मंदिरा ले तिहार के अच्छा-मंगल सइतानास हो जथँय। पीअई-खवई ले लोगन के आरथिक स्थिति सिखाथँय, अऊ मारपीट ले समाज म हिंसा उपजथे। हिंसा के पिकी बैर के बिरिक्छ बन के समाज म सिरीफ काँटा बगराथे। समाज म मनुखपना ल बनाये राखे बर ये माँस मंदिरा ल बिसरान, ठेठरी खावन, रंग-गुलाल लगावत होली मनावन अऊ कहन - 'होली हे।' 

भारतीय गणना

आप भी चौक गये ना? क्योंकि हमने तो नील तक ही पढ़े थे..!