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सोमवार, 23 फ़रवरी 2015

बड़े काम का आलू

अक्सर लोग सोचते हैं कि कहीं आलू खाने से चर्बी न बढ़ जाए लेकिन आलू में ऐसे कई गुण हैं जिन्हें आप जानेंगे जो इसे जरूर खाना चाहेंगे। आलू में विटमिन-सी, विटमिन-बी, कॉम्पलेक्स, आयरन, कैल्शियम, मैगनीज और फाॅस्फोरस काफी मात्रा में पाए जाते हैं। आलू चेहरे के दाग भी दूर करता है। आज आपसे आलू के कुछ ऐसे ही गुणों के बारे में बता रहे हैं-
स्किन कलर के लिए : चेहरे की रौनक को बनाए रखने के लिए आलू को चेहरे पर लगायें और 30 मिनट तक लगा रहने दें। आलू को रोज लगाने से चेहरे का रंग साफ होने लगता है और किसी तरह की सूजन हो, तो वह कम होने लगती है। आप आलू के मिक्सचर में नींबू भी मिला सकते हैं। नींबू में विटमिन-सी होता है, जो स्किन के कलर को साफ करता है।
डार्क स्पॉट होने पर : चेहरे पर या आँखों के आसपास डार्क स्पॉट होने पर आलू सबसे फायदेमंद है। चेहरे पर ब्लैक स्पॉट हैं, तो आलू के स्लाइस को चेहरे पर रगड़ें और धीरे-धीरे मसाज करें। मसाज करने के बाद ठंडे पानी से धो लें। कई बार ऐसा होता है कि कोई फेशियल हमारे चेहरे को शूट नहीं करता। ऐसे में, चेहरे पर दाग पड़ने लगते हैं। इसके लिए आलू बेस्ट रेमिडी है।
धूप से चेहरा खराब होने पर : गर्मियों में सनबर्न होने पर आलू से बेहतर उपाय नहीं। आप आलू के स्लाइस काटकर फ्रिज में रख दें। उसके बाद ठंडे आलू को सन बर्न एरिया पर लगायें। स्किन साफ, स्मूथ और सॉफ्ट रहेगी। आँखों के डार्क सर्कल दूर करने के लिए आलू एक प्राकृतिक उपाय है। आँखों के नीचे काले घेरे होने पर आलू का रस निकाल कर आँखों पर लगायें।
रूखी त्वचा के लिए फायदेमंद : जिनकी स्किन ड्राय होती है, उनके लिए आलू परफेक्ट है। दही में आलू को मिक्स करके मास्क बनायें। इसे चेहरे पर 20 मिनट तक लगाकर रखें। आलू चेहरे की चमक और एंटी-एजिंग के साथ-साथ स्किन के डेड सेल को भी खत्म करता है। चेहरे पर 10 मिनट आलू लगाये रखने से स्किन के डेड सेल खत्म होने लगते हैं।
नैचरल क्लींजर : आलू एक नैचरल क्लींनर है। आलू के साथ खीरे को मिक्स करके चेहरे पर लगायें। इससे चेहरा साफ होगा।
जलन करे दूर : शरीर में रैशेज, जलन और खुजली होने पर आलू को काट कर लगायें। इससे जलन में काफी आराम मिलेगा।

अलसी के गुणकारी नुस्खे

आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथ चरक संहिता और सुश्रुत में अलसी का उल्लेख मिलता है। ये ग्रंथ हजारों साल पुराने है अलसी का संस्कृत नाम अतसी, क्षुमा पिच्दिला, उमा है। हिन्दी में अलसी, तिसी और बीजरी कहा जाता है। मराठी में जवर या अलशी कहते हैं। गुजराती में अलसी या जवस के नाम से इसे जानते हैं। अलसी के कुछ नुस्खे-

  • अलसी को भूनकर चूर्ण बनाकर शहद के साथ चाटने से खॉंसी, कफ में आराम मिलता है।
  • अलसी का क्वाथ बनाकर पीने से जनेन्द्रीय की जलन, दाह में लाभ होता है। क्वाथ बनाने के लिए अलसी को पानी के साथ कुछ देर धीमी आँच पर उबालना चाहिये। फिर ठंडाकर छानकर पीना चाहिये।
  • अलसी को जल में पीसकर उसमें थोड़ा दही मिलाकर फोड़ों पर लेप करने से वे जल्द पककर फूट जाते हैं।
  • भूनी हुई अलसी पीसकरकरीब ढाई मासे की मात्रा रोज सेवनकरने से मूत्र, स्वेद (पसीना), दुग्ध एवं आर्तव में लाभ होता है। इससे आँत्र वेदना भी दूर होती है।
  • कालीमिर्च और शहद के साथ इसका सेवन कामोद्दीपक और वीर्य को गाढ़ा करने वाला होता है।
  • इसे भूनकर पीसकर शहद के साथ चाटने से प्लीहा शोथ (तिल्ली वृद्धि) में लाभ होता है।
  • दमा रोगियों के लिए एक सरल नुस्खा है, अलसी के बीज साबुत आधा चम्मच, पानी पॉंच चम्मच को चॉंदी या कॉंच की कटोरी में 12 घंटे भीगोकर रख दें। बारह घंटे बाद यह पानी छानकर पीयें। सुबह भिगोया पानी रात को और रात में भिगोया सुबह नियमित लेने से दमा रोग में बहुत आराम मिलता है।
  • दूसरा नुस्खा है अलसी को पीसकर जल में उबालें फिर एक घंटे तक ढँककर रख दें। बाद में छानकर मिश्री मिलाकर पियें। इससे कफ ढीला होकर सरलता से निकल जाता है और श्वॉंस रोगियों की घबराहट में भी आराम आता है।
  • पुराने नजला-जुकाम रोगियों को भुनी हुई अलसी को पीसकर उसमें समभाग मिश्री पीसकर मिला लें और एक डिब्बी में भरकर रख लें। गर्म जल के साथ सुबह शाम एक-एक चम्मच यह चूर्ण कुछ दिन तक लेने से कफ सरलता से निकल जाता है और जुकाम ठीक हो जाता है।
  • आग से जले पर अलसी का तेल और चूने का पानी समभाग मिलाकर खूब घोंटें। यह सफेद मलहम की तरह बन जाता है। अँग्रेजी में इसे केरन ऑयल कहते हैं। इस मलहम को जले स्थान पर लेपकरने से पीड़ा और जलन मिटती है और घाव जल्दी भरते हैं।

गुरुवार, 1 अगस्त 2013

अलसी में ऐसी क्या खास बात है।

अलसी पोषक तत्वों का खज़ाना

चमत्कारी, आयुवर्धक, आरोग्यवर्धक व दैविक भोजन अलसी में ऐसी क्या खास बात है। अलसी का बोटेनिकल नाम लिनम यूज़ीटेटीसिमम यानी अति उपयोगी बीज है। अलसी के पौधे में नीले फूल आते हैं। अलसी का बीज तिल जैसा छोटा, भूरे या सुनहरे रंग का व सतह चिकनी होती है। प्राचीनकाल से अलसी का प्रयोग भोजन, कपड़ा, वार्निश व रंगरोगन बनाने के लिये होता आया है। हमारी दादी माँ जब हमें फोड़ा-फुंसी हो जाती थी, तो अलसी की पुलटिस बनाकर बाँध देती थी। अलसी में मुख्य पौष्टिक तत्व ओमेगा-3 फेटी एसिड एल्फा-लिनोलेनिक एसिड, लिगनेन, प्रोटीन व फाइबर होते हैं। अलसी गर्भावस्था से वृद्धावस्था तक फायदेमंद है। महात्मा गाँधी जी ने स्वास्थ्‍य पर भी शोध की व बहुत सी पुस्तकें भी लिखीं। उन्होंने अलसी पर भी शोध किया, इसके चमत्कारी गुणों को पहचाना और अपनी एक पुस्तक में लिखा है, “जहाँ अलसी का सेवन किया जायेगा, वह समाज स्वस्थ व समृद्ध रहेगा।”


आवश्यक वसा अम्ल ओमेगा-3 व ओमेगा-6 की कहानी

अलसी में लगभग 18-20 प्रतिशत ओमेगा-3 फैटी एसिड ALA होते हैं। अलसी ओमेगा-3 फैटी एसिड का पृथ्वी पर सबसे बड़ा स्रोत है। हमारे स्वास्थ्य पर अलसी के चमत्कारी प्रभावों को भली भांति समझने के लिए हमें ओमेगा-3 व ओमेगा-6 फेटी एसिड को विस्तार से समझना होगा। ओमेगा-3 व ओमेगा-6 दोनों ही हमारे शरीर के लिये आवश्यक हैं यानी ये शरीर में नहीं बन सकते, हमें इन्हें भोजन द्वारा ही ग्रहण करना होता है। ओमेगा-3 अलसी के अलावा मछली, अखरोट, चिया आदि में भी मिलते हैं। मछली में DHA और EPA नामक ओमेगा-3 फेटी एसिड होते हैं, ये अलसी में मौजूद ALA से शरीर में बन जाते हैं। ओमेगा-6 मूंगफली, सोयाबीन, सेफ्लावर, मकई आदि तेलों में प्रचुर मात्रा में होता है। ओमेगा-3 हमारे शरीर के विभिन्न अंगों विशेष तौर पर मस्तिष्क, स्नायुतंत्र व आँखों के विकास व उनके सुचारु रुप से संचालन में महत्वपूर्ण योगदान करते हैं। हमारी कोशिकाओं की भित्तियाँ ओमेगा-3 युक्त फोस्फोलिपिड से बनती हैं। जब हमारे शरीर में ओमेगा-3 की कमी हो जाती है तो ये भित्तियाँ मुलायम व लचीले ओमेगा-3 के स्थान पर कठोर व कुरुप ओमेगा-6 फैट या ट्रांसफैट से बनती है। और यहीं से हमारे शरीर में उच्च रक्तचाप, मधुमेह प्रकार-2, आर्थ्राइटिस, मोटापा, कैंसर, आदि बीमारियों की शुरुआत हो जाती है।

शरीर में ओमेगा-3 की कमी व इन्फ्लेमेशन पैदा करने वाले ओमेगा-6 के ज्यादा हो जाने से प्रोस्टाग्लेन्डिन-ई 2 बनते हैं जो लिम्फोसाइट्स व माक्रोफाज को अपने पास एकत्रित करते हैं व फिर ये साइटोकाइन व कोक्स एंजाइम का निर्माण करते हैं। और शरीर में इनफ्लेमेशन फैलाते हैं। जिस प्रकार एक अच्छी फिल्म बनाने के लिए नायक और खलनायक दोनों ही आवश्यक होते हैं। वैसे ही हमारे शरीर के ठीक प्रकार से संचालन के लिये ओमेगा-3 व ओमेगा-6 दोनों ही बराबर यानी 1:1 अनुपात में चाहिये। ओमेगा-3 नायक हैं तो ओमेगा-6 खलनायक हैं। ओमेगा-6 की मात्रा बढ़ने से हमारे शरीर में इन्फ्लेमेशन फैलते हैं तो ओमेगा-3 इन्फ्लेमेशन दूर करते हैं, मरहम लगाते हैं। ओमेगा-6 हीटर है तो ओमेगा-3 सावन की ठंडी हवा है। ओमेगा-6 हमें तनाव, सरदर्द, डिप्रेशन का शिकार बनाते हैं तो ओमेगा-3 हमारे मन को प्रसन्न रखते हैं, क्रोध भगाते हैं, स्मरण शक्ति व बुद्धिमत्ता बढ़ाते हैं। ओमेगा-6 आयु कम करते हैं। तो ओमेगा-3 आयु बढ़ाते हैं। ओमेगा-6 शरीर में रोग पैदा करते हैं तो ओमेगा-3 हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं। पिछले कुछ दशकों से हमारे भोजन में ओमेगा-6 की मात्रा बढ़ती जा रही हैं और ओमेगा -3 की कमी होती जा रही है। मल्टीनेशनल कम्पनियों द्वारा बेचे जा रहे फास्ट फूड व जंक फूड ओमेगा-6 से भरपूर होते हैं। बाजार में उपलब्ध सभी रिफाइंड तेल भी ओमेगा-6 फैटी एसिड से भरपूर होते हैं। हाल ही हुई शोध से पता चला है कि हमारे भोजन में ओमेगा-3 बहुत ही कम और ओमेगा-6 प्रचुर मात्रा में होने के कारण ही हम उच्च रक्तचाप, हृदयाघात, स्ट्रोक, डायबिटीज़, मोटापा, गठिया, अवसाद, दमा, कैंसर आदि रोगों का शिकार हो रहे हैं। ओमेगा-3 की यह कमी 30-60 ग्राम अलसी से पूरी कर सकते हैं। ये ओमेगा-3 ही अलसी को सुपर स्टार फूड का दर्जा दिलाते हैं। स्त्रियों को संपूर्ण नारीत्व तभी प्राप्त होता है जब उनके शरीर को पर्याप्त ओमेगा-3 मिलता रहता है।

 हृदय और परिवहन तंत्र के लिए गुणकारी

अलसी हमारे रक्तचाप को संतुलित रखती है। अलसी हमारे रक्त में अच्छे कॉलेस्ट्रॉल (HDL-Cholesterol) की मात्रा को बढ़ाती है और ट्राइग्लीसराइड्स व खराब कॉलेस्ट्रॉल (LDL-Cholesterol) की मात्रा को कम करती है। अलसी दिल की धमनियों में खून के थक्के बनने से रोकती है ओर हृदयाघात व स्ट्रोक जैसी बीमारियों से बचाव करती है। अलसी सेवन करने वालों को दिल की बीमारियों के कारण अकस्मात मृत्यु नहीं होती। हृदय की गति को नियंत्रित रखती है और वेन्ट्रीकुलर एरिद्मिया से होनेवाली मृत्युदर को बहुत कम करती है।

कैंसर रोधी लिगनेन का पृथ्वी पर सबसे बड़ा स्त्रोत

अलसी में दूसरा महत्वपूर्ण पौष्टिक तत्व लिगनेन होता है। अलसी लिगनेन का सबसे बड़ा स्रोत हैं। अलसी में लिगनेन अन्य खाद्यान्नों से कई सौ गुना ज्यादा होते हैं। लिगनेन एन्टीबैक्टीरियल, एन्टीवायरल, एन्टी फंगल और कैंसर रोधी है और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है। लिगनेन कॉलेस्ट्रोल कम करता है और ब्लड शुगर नियंत्रित रखता है। लिगनेन सचमुच एक सुपर स्टार पोषक तत्व है। लिगनेन पेड़ पौधों में ईस्ट्रोजन यानी महिला हारमोन के तरह कार्य करता है। रजोनिवृत्ति के बाद महिलाओं में ईस्ट्रोजन का स्त्राव कम हो जाता है और महिलाओं को कई परेशानियाँ जैसे हॉट फ्लेशेज़, ओस्टियोपोरोसिस आदि होती हैं। लिगनेन इन सबमें बहुत राहत देता है।

लिगनेन मासिक धर्म संबंधी अनियमितताएं ठीक करता है। लिगनेन हमें प्रोस्टेट, बच्चेदानी, स्तन, आंत, त्वचा आदि के कैंसर से बचाता हैं। यदि मां के स्तन में दूध नहीं आ रहा है तो उसे अलसी खिलाने के 24 घंटे के भीतर स्तन में दूध आने लगता है। यदि मां अलसी का सेवन करती है तो उसके दूध में प्रर्याप्त ओमेगा-3 रहता है और बच्चा अधिक बुद्धिमान व स्वस्थ पैदा होता है।

एड्स रिसर्च असिस्टेंस इंस्टिट्यूट (ARAI) सन् 2002 से एड्स के रोगियों पर लिगनेन के प्रभावों पर शोध कर रही है और आश्चर्यजनक परिणाम सामने आए हैं। ARAI के निर्देशक डॉ. डेनियल देव्ज कहते हैं कि जल्दी ही लिगनेन एड्स का सस्ता, सरल और कारगर उपचार साबित होने वाला है।

पाचन तंत्र और फाइबर

अलसी में 27 प्रतिशत घुलनशील (म्यूसिलेज) और अघुलनशील दोनों ही तरह के फाइबर होते हैं अतः अलसी कब्ज़ी, मस्से, बवासीर, भगंदर, डाइवर्टिकुलाइटिस, अल्सरेटिव कोलाइटिस और आई.बी.एस. के रोगियों को बहुत राहत देती है। कब्जी में अलसी के सेवन से पहले ही दिन से राहत मिल जाती है। हाल ही में हुई शोध से पता चला है कि कब्ज़ी के लिए यह अलसी इसबगोल की भुस्सी से भी ज्यादा लाभदायक है। अलसी पित्त की थैली में पथरी नहीं बनने देती और यदि पथरियाँ बन भी चुकी हैं तो छोटी पथरियाँ तो घुलने लगती हैं।

प्राकृतिक सौंदर्य प्रसाधन

अलसी त्वचा की बीमारियों जैसे मुहाँसे, एग्ज़ीमा, दाद, खाज, खुजली, छाल रोग, बालों का सूखा व पतला होना, बाल झड़ना आदि में काफी असरदायक है। अलसी में पाये जाने वाले ओमेगा-3 बालों को स्वस्थ, चमकदार व मजबूत बनाते हैं। अलसी खाने वालों को कभी भी रुसी नहीं होती है। अलसी त्वचा को आकर्षक, कोमल, नम, व गोरा बनाती है। नाखूनों को स्वस्थ व सुंदर बनाती हैं। अलसी खाने व इसके तेल की मालिश से त्वचा के दाग, धब्बे, झाइयाँ, झुर्रियाँ दूर होती हैं। अलसी आपको युवा बनाये रखती है। आप अपनी उम्र से काफी वर्ष छोटे दिखते हो। अलसी उम्र बढ़ाती हैं।

रोग प्रतिरोधक क्षमता

अलसी हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है। गठिया, गाउट, मोच आदि में अत्यंत लाभकारी है। ओमेगा-3 से भरपूर अलसी यकृत, गुर्दे, एडरीनल, थायरायड आदि ग्रंथियों को ठीक से काम करने में सहायक होती है। अलसी ल्यूपसनेफ्राइटिस और अस्थमा में राहत देती है।

मस्तिष्क और स्नायु तंत्र के लिए दैविक भोजन

अलसी हमारे मन को शांत रखती है, इसके सेवन से चित्त प्रसन्न रहता है, विचार अच्छे आते हैं, तनाव दूर होता है, बुद्धिमत्ता व स्मरण शक्ति बढ़ती है तथा क्रोध नहीं आता है। अलसी के सेवन से मन और शरीर में एक दैविक शक्ति और ऊर्जा का प्रवाह होता है। अलसी एल्ज़ीमर्स, मल्टीपल स्कीरोसिस, अवसाद ( Depression ), माइग्रेन, शीज़ोफ्रेनिया व पार्किनसन्स आदि बीमारियों में बहुत लाभदायक है। गर्भावस्था में शिशु की आँखों व मस्तिष्क के समुचित विकास के लिये ओमेगा-3 अत्यंत आवश्यक होते हैं।

ओमेगा-3 से हमारी नज़र अच्छी हो जाती है, रंग ज्यादा स्पष्ट व उजले दिखाई देने लगते हैं। आँखों में अलसी का तेल डालने से आँखों का सूखापन दूर होता है और काला पानी व मोतियाबिंद होने की संभावना भी बहुत कम होती है। अलसी बढ़ी हुई प्रोस्टेट ग्रंथि, नामर्दी, शीघ्रपतन, नपुंसकता आदि के उपचार में महत्वपूर्ण योगदान देती है।

डायबिटीज़ और मोटापे पर अलसी का चमत्कार

अलसी ब्लड शुगर नियंत्रित रखती है, डायबिटीज़ के शरीर पर होने वाले दुष्प्रभावों को कम करती हैं। चिकित्सक डायबिटीज़ के रोगी को कम शर्करा और ज्यादा फाइबर लेने की सलाह देते हैं। अलसी व गेहूँ के मिश्रित आटे में 50 प्रतिशत कार्ब, 16 प्रतिशत प्रोटीन व 20 प्रतिशत फाइबर होते हैं। यानी इसका ग्लायसीमिक इन्डेक्स गेहूँ के आटे से काफी कम होता है। डायबिटीज़ के रोगी के लिए इस मिश्रित आटे से अच्छा भोजन क्या होगा? मोटापे के रोगी को भी बहुत फायदा होता है। अलसी में फाइबर की मात्रा अधिक होती है। इस कारण अलसी सेवन से लंबे समय तक पेट भरा हुआ रहता है, देर तक भूख नहीं लगती है। यह बी.एम.आर. को बढ़ाती है, शरीर की चर्बी कम करती है और हम ज्यादा कैलोरी खर्च करते हैं।

डॉक्टर योहाना बुडविज का कैंसर रोधी प्रोटोकोल

डॉ. योहाना बुडविज की चर्चा के बिना अलसी का कोई भी लेख अधूरा रहता है। ये जर्मनी की विश्व विख्यात कैंसर वैज्ञानिक थी, जिन्होंने अलसी के तेल, पनीर, कैंसर रोधी फलों और सब्ज़ियों से कैंसर के उपचार का तरीका विकसित किया। उन्होंने सभी प्रकार के कैंसर, गठिया, हृदयाघात, डायबिटीज आदि बीमारियों का इलाज अलसी के तेल व पनीर से किया। इन्हें 90 प्रतिशत से ज्यादा सफलता मिलती थी। इसके इलाज से वे रोगी भी ठीक हो जाते थे जिन्हें अस्पताल में यह कहकर डिस्चार्ज कर दिया जाता था कि अब कोई इलाज नहीं बचा, सिर्फ दुआ ही काम आयेगी। अमेरीका में हुई शोध से पता चला है कि अलसी में 27 से ज्यादा कैंसररोधी तत्व होते हैं। डॉ. योहाना का नाम नोबेल पुरस्कार के लिए 7 बार चयनित तो हुआ पर उन्हें मिला नहीं क्योंकि उनके सामने शर्त रखी गई थी कि वे अलसी पनीर के साथ-साथ कीमोथेरेपी व रेडियोथेरेपी भी काम में लेंगी जो उन्हें मंजूर नहीं था।

बॉडी बिल्डिंग के लिए भी नंबर वन

अलसी बॉडी बिल्डर के लिए आवश्यक व संपूर्ण आहार है। अलसी में 20 प्रतिशत आवश्यक अमाइनो एसिड युक्त अच्छे प्रोटीन होते हैं। प्रोटीन से ही मांस-पेशियाँ बढ़ती हैं। अलसी भरपूर शक्ति देती है। कसरत के बाद मांस पेशियों की थकावट चुटकियों में ठीक हो जाती है। बॉडी बिल्डिंग पत्रिका मसल मीडिया 2000 में प्रकाशित आलेख “बेस्ट आँफ द बेस्ट” में अलसी को बॉडी के लिए सुपर फूड माना गया है। मि. डेकन ने अपने आलेख ‘आँस्क द गुरु’ में अलसी को नम्बर वन बॉडी बिल्डिंग फूड का खिताब दिया। अलसी हमारे शरीर को भरपूर ताकत प्रदान करती है, शरीर में नई ऊर्जा का प्रवाह करती है तथा स्टेमिना बढ़ाती है।

सेवन का तरीका

हमें प्रतिदिन 30-60 ग्राम अलसी का सेवन करना चाहिये। रोज 30-60 ग्राम अलसी को मिक्सी के चटनी जार में पीसकर आटे में मिलाकर रोटी, पराठा आदि बनाकर खायें। इसकी ब्रेड, केक, कुकीज़, आइसक्रीम, लड्डू आदि स्वादिष्ट व्यंजन भी बनाये जाते हैं। अंकुरित अलसी का स्वाद तो कमाल का होता है। इसे आप सब्ज़ी, दूध, दही, दाल, सलाद आदि में भी डाल कर ले सकते हैं। बेसन में भी मिला कर पकोड़े, कढ़ी, गट्टे आदि व्यंजन बनाये जा सकते हैं। इसे पीसकर नहीं रखना चाहिये। इसे रोजाना पीसें। ये पीसकर रखने से खराब हो जाती है। बस 30 ग्राम का आंकड़ा याद रखें। अलसी के नियमित सेवन से व्यक्ति के जीवन में चमत्कारी कायाकल्प हो जाता है।

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भारतीय गणना

आप भी चौक गये ना? क्योंकि हमने तो नील तक ही पढ़े थे..!