बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

वेदना

चोरी करते शर्म नहीं आती, इतने कम उम्र में गलत काम करने लग गये, भीड़ में खड़े एक बुजुर्ग आदमी ने कहा। वह कोई पंद्रह वर्षीय नवयुवक था, जो गर्दन नीचे किये चुपचाप मार खाये जा रहा था। उसे दुख मार खाने का नहीं था, जिसकी मॉं मृत्युशैया पर पड़ी दवाई के अभाव में दम तोड़ रही हो उसे मारखाने की चिंता ही कहॉं हो सकती है। उसे केमिस्ट की दुकान से दवाई चुराते दुकानदार ने पकड़ लिया, बात ही बात में भीड़ इकट्ठी हो गई| मार से कपड़े जगह-जगह से फट गया था। कॉलर फटकर झूलने लगा था। इसी समय पुलिस इंस्पेक्टर अजीत सिंह ने एक भद्दी सी गाली देते हुए उस लाचार युवक को एक डंडा जमाया और दुकानदार से बोला-

‘‘आप रिपोर्ट लिखाने थाने चलिये! इस बदमाश को मैं वहीं ले जा रहा हूँ।’’ दो दिन का भूखा वह युवक लड़खड़ाता हुआ चल रहा था, रह-रहकर आँखों के सामने मॉं का मुर्झाया चेहरा घूम रहा था। असमय बुढ़ी हो चली मॉं पड़ोस में झाड़ू-पोछा करके अपनी और बेटे सरजू का पेट किसी तरह पालती थी। सरजू के पिता अपनी पत्नी को छोड़कर किसी अन्य औरत को घर में रख लिया और उसकी मॉं और सरजू को ठोकरे खाने के लिए घर से बेइज्जत करके निकाल दिया। सरजू अपने पिताजी को जानता तक नहीं था। स्नेहमयी मॉं अपने बच्चे को किसी प्रकार का कष्ट नहीं होने देती। सरजू किसी तरह आठवीं कक्षा उत्तीर्ण हो गया। प्रकृति भी गरीबों पर वज्र के समान टूटती है। काम करते-करते मॉं बेदम हो जाती है। ऊपर से खॉंसी का जोर मुँह से बलगम के साथ खून जाने लगा। मालिकों ने उसे काम से छुट्टीकर दी, स्कूल से आने पर सरजू मॉं की हालत देख रो पड़ा, घर में राशन खत्म हो गया था। पास में एक भी पैसा नहीं था। मॉं को पड़ोसवालों ने सरकारी अस्पताल में भर्ती कर दिया, लेकिन दवाई के आभाव में दिनों दिन उसकी हालत खराब होती गई।

सरजू की पढ़ाई छुट गई, वह सड़कों पर घूम-घूमकर अखबार बेचा करता। कुछ पैसे मिल जाते, जिसमें कुछ पैसों की दवाई और कुछ पैसे अपने भोजन पर खर्च करता। रात के समय हॉटल में काम करता, सुबह शाम अपनी मॉं से मिल आता। एकदिन डॉक्टर ने कहा- ‘‘तुम अपने घर के किसी जिम्मेदार सदस्य को भेेजना| तुम ! मत आया करो? तुम्हारी मॉं को टी.बी हो गई है।’’
‘‘मेरा इस दुनियॉं में मॉं के सिवाय कोई नहीं, मैं किसे लाऊँ डॉक्टर साहब!’’ सरजू ने करूण स्वर में रोते हुए कहा। डॉ. दवाई की पर्ची थमा गया- ‘‘देखो! यह दवाई और इंन्जेक्शन बहुत जरूरी है, देरी होने से मरीज को खतरा है।’’ सरजू सुनकर हक्का-बक्का रह गया। इतने बड़े शहर में पहचानवाला कोई न था। होटलवाला भी बगैर माह बीते पैसे देनेवाला नहीं था। केमिस्ट की दुकान पर सरजू ने दवाई का पर्ची दिया दुकानदार ने दवाई पैकेट में बॉंध दिया साथ ही बिल भी और दूसरे ग्राहक को निपटाने लगा। बिल देखकर सरजू को दिन में तारे नज़र आने लगा, बिल पूरे पॉंच सौ रूपये का था। कुछ सोचकर सरजू दवाई की पैकेट लेकर भागने लगा।अचानक दुकानदार की नज़र उधर चली गयी और चोर-चोर चिल्लाना शुरू कर दिया। सरजू के पीछे लोग दौड़ने लगे, भीड़ में घुसने से पहले एक आदमी ने उसे पकड़ लिया। भीड़ इकट्ठी हो गई। लोगों ने मार-मारकर उसकी हालत खराब कर दी। कमीज खींचतान में जगह-जगह से फट गया। मोटे ताजे थानेदार को अपने तरफ आते देख सरजू थर-थर कॉंपने लगा, कातर स्वर में बोला- ‘‘मेरी मॉं को बचा लो साहब! आपके बाल बच्चे सलामत रहे|’’ थानेदार ने डॉंटते हुए कहा-‘‘तुम चुपचाप रहो| नहीं तो काल कोठरी में बंदकर दूँगा|’’ और दुकानदार का रिपोर्ट लिखने लगा| ‘‘हॉं तो मिस्टर मेहता! जो दवाई पैकेट में हैं, किस बीमारी की दवा है।’’ ‘‘इसे डॉक्टर ने टी.बी. के लिए लिखा है’’ मेहता ने कहा। ‘‘आप रिपोर्ट में हस्ताक्षर कर दीजिये, जरूरत पड़ने पर आपको तकलीफ करना होगा।’’ ‘इसमें तकलीफ की क्या बात है इंस्पेक्टर साहब! मैं हाजिर हो जाऊँगा’’ चलते हुए मेहता ने कहा। सरजू के शरीर से डर के कारण पसीना छुटने लगा। मार के कारण दोनों गाल-लाल हो गये थे।सरजू ने रोते हुए इंस्पेक्टर के पैर पकड़ लिये- ‘‘मुझे छोड़ दीजिये साहब! मेरी मॉं दवाई के अभाव में मर जाएगी|’’ ऐसा लगा जैसे सारे शरीर में वेदना का साम्राज्य हो अपमान और कष्ट से शरीर निर्जीव सा हो रहा था। इंस्पेक्टर के पूछने पर सरजू ने बताया कि-‘‘मेरी मॉं बीमार है और अस्पताल में भर्ती है, यदि उन्हें दवाई और इंजेक्शन समय पर नहीं मिला तो वह मर जाएगी और मैं अनाथ हो जाऊँगा, मेरे पास दवाई के पैसे नहीं थे, इसलिए दवाई का पैकेट लेकर भाग रहा था और पकड़ा गया।’’ ‘‘तुम्हारी मॉं का नाम क्या है और किस अस्पताल में भर्ती है? अगर तुमने झूठ बोलने की कोशिश की तो छ: माह के लिए अंदर कर दूँगा।’’ ‘‘मैं झूठ नहीं बोलूँगा साहब! मेरी मॉं का नाम पार्वती है और जिला चिकित्सालय में भर्ती है। 

इंस्पेक्टर साहब सोचने लगे- ‘‘यह लड़का चोर होता तो गल्ला का पैसा लेकर भागता या पाकेट मारता, जरूर कोई मजबूरी है।’’ इतना सोचते ही सरजू पर दया आ गई, उसे अपना बचपन याद आ गया। कितने कष्ट सहे थे उसने, यदि स्वामी विवेकानंद आश्रम का सहारा नहीं मिलता तो आज वह भी चोर उच्चका होता, बचपन से ही वह अनाथ था। उसकी पढ़ाई-लिखाई आश्रम में शुरू हुआ था और वह आज सम्मानजनक पद पर है। सरजू का चेहरा देखकर ही समझ गया था कि वह भूखा है। सिपाही को पास के हॉटल से भोजन लाने के लिए कहता है और बड़े प्रेम से सरजू को भोजन खिलाया, जिस प्रकार से चट्टान को भेदकर पानी का स्त्रोत निकलता है, उसी प्रकार अजीत सिंह के हृदय से दया उमड़ पड़ी। सरजू को अपने साथ मोटरसायकल में बिठाकर अस्पताल लाया। टी.बी.वार्ड में अपनीं मॉं को देखकर सरजू सन्न रह गया। उसकी मॉं भगवान को प्यारी हो गई थी। एक मॉं ही थी, लेकिन वह भी सरजू को अकेला छोड़कर चली गई, वह अपनी मॉं के चरणों में माथा टेककर रोने लगा- ‘‘मॉं..! मैं, किसके सहारे इस निर्दयी दुनियॉं में रहूँगा। मैं, क्यों जिंदा हूँ? मॉं..! मुझे अपने पास बुला लो, इस संसार में मेरा कोई नहीं है’’ कहकर सरजू विलाप करने लगा इंस्पेक्टर ने उसे सॉंत्वना दी-‘‘जिसका कोई नहीं होता, उसका ईश्‍वर ही रखवाला होता है’’ कहते हुए उनका स्वर पीड़ा से भर गया। आज का दिन सरजू के लिए अंधकार लेकर आया था। उसके चारों ओर निराशा का अंधेरा छाया हुआ था। श्मशानघाट से आते हुए सरजू बहुत उदास था। चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ था। रात्रि का अंधकार धीरे-धीरे गहरा होने लगा, बाहर का सन्नाटा सरजू के दिल-दिमाग में समाता चला गया। एकांकी जीवन की वेदना सरजू के चेहरे से परिलक्षित होने लगा, वह पागलों की तरह चिल्लाता, कभी अपने आप से बातें करने लगता। 

सरजू की हालत देख इंस्पेक्टर अजीत सिंह उसे अपने साथ घर ले आया। इंस्पेक्टर साहब अपने क्वॉटर में अकेला रहता था। उनकी शादी अभी नहीं हुई थी, थाने का चौकीदार इसके लिए खाना बना देता था। ‘‘देखो तुम अभी मेरे साथ ही रहोगे, फिर आगे देखेंगे कि क्या करना है’’ कहकर इंस्पेक्टर साहब थाना चले गये। शाम को इंस्पेक्टर साहब घर आये, तब देखा कि सरजू शून्य में एकटक न जाने क्या देख रहा था और अपने आप बुदबुदा रहा था। इंस्पेक्टर साहब उसे अपने साथ बरामदे में ले गया। लोटा थमाते बोला जाओ- ‘‘मुँह-हाथ धो लो! भोजन करेंगे।’’ चौकीदार ने दोनों को भोजन परोस दिया, सरजू से कुछ न खाया गया। उसे मॉं की याद आने लगी, किसी तरह दो-चार कौर खाकर मुँह-हाथ धोने उठ गया। दूसरे दिन इंस्पेक्टर साहब ने स्वामी विवेकानंद आश्रम में फोन किया बोला- ‘‘मैं एक लड़के को लेकर आ रहा हूँ, उसे वहीं आश्रम के विद्यालय में पढ़ाना है, वहीं आश्रम में रहेगा।’’ सरजू को इंस्पेक्टर साहब ने आश्रम में भर्ती करा दिया। सप्ताह में बीच-बीच में देखने आ जाता। सरजू अपने मॉं को नहीं भूल सका था, वह अब भी उदास दिखाई देता था। इंस्पेक्टर साहब उसे बहुत समझाते उसकी आवश्यकताओं का ख्याल रखते। दिन बितने लगा, अप्रैल में सरजू का वार्षिक परीक्षा परिणाम घोषित हुआ, सरजू अपने कक्षा के सभी सेक्सन में टॉप किया था। इंस्पेक्टर साहब कुछ आश्‍वस्त हुये, सरजू का रहन-सहन पहनावा सब कुछ बदल गया था। अब उसे देखकर कोई भी नहीं कह सकता था, कि वह अनाथ बालक है, इंस्पेक्टर साहब सरजू के लिए सब कुछ था। उसे वह भगवान से भी बढ़कर मानता था। उसके एक इशारे में सब कुछ करने को तैयार रहता। आई.पी.एस. का आज परिणाम आया। सरजू प्रसाद का फोटो पेपर में छपा है, टॉपटेन में सरजू प्रसाद का नाम मोटे-मोटे अक्षरों में छपा है।इंस्पेक्टर अजीत सिंह आज बहुत खुश है, अपना कर्तव्य उसने बखूबी निभाया है। उसने एक अनाथ बालक को पुलिस कप्तान बना दिया। उसके दिल पर रखा बोझ आज उतर गया। उसने अपना कर्ज आज चुकता कर दिया था। सरजू प्रसाद की उपलब्धि पर आज कई लोग इंस्पेक्टर के घर बधाई देने आये। ‘‘दादा! आज मॉं की समाधि पर माथा टेकने जायेंगे’’ सरजू प्रसाद ने इंस्पेक्टर अजीत सिंह से कहा। आज नदी किनारे सरजू प्रसाद के साथ अजीत सिंह उसकी मॉं की समाधि पर फूल चक्र अर्पित कर रहे थे। वे बहुत खुश थे| सरजू अपनी मॉं की समाधि पर आँसू बहा रहा था। मॉं की यादें उसकी धरोहर थी, उनके चेहरे में वेदना की घनी छाया नज़र आ रही थी। मॉं..! आज तुम नहीं हो, लेकिन तुम्हारा आशीर्वाद मेरे साथ है मुझे आशीर्वाद नहीं दोगी ? मॉं।’’ 

सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

कुलक्षणी


राधा को खाना-पीना अच्छा नहीं लगता। सिर में दर्द की शिकायत रहती, दिन में एकाध बार उल्टी हो जाती राधा परेशान थी। सास कहती- ‘‘क्यों बेटी! तुम्हारी तबियत कैसी है? ठीक तो हूँ मॉं जी! आज कल मैं देख रही हूँ, तू ठीक से खाती-पीती नहीं, कितनी दुबली हो गई है।’’ सास दुलार से बहू की ओर देखकर कहती। रसोई घर में इमली खाती पकड़ी गई, सास को देखकर हाथ पीछे करती हुई राधा झेंप गयी। ‘‘क्यों बहू! तू इमली खा रही है! देख तेरा आज से काम करना बंद रौताईन सारा काम करेगी, तू चुपचाप बैठी रहना’’ सास हँसते हुए कहती। नहीं मॉं जी! मैं इतनी कमजोर तो नहीं हूँ। क्यों रे रामू! तू बहू को दिन भर इधर-उधर दौड़ाता है। कभी पानी दे, कभी दतौन ला, कभी कमीज के बटन टॉंक आज से बहू काम नहीं करेगी, अपना काम तू खुद करना। छोटे-मोटे काम करने से इसके हाथ थोड़े ही घिस जाऐंगे मॉं! रामू कहता। तू नहीं जानता रे! जा अपना कामकर, रामू बड़बड़ करते खेत चला गया।

राधा दर्द से चीख पड़ती रह-रहकर टीस उठती घर भर परेशान। मॉं...! राधा का खयाल रखना कहते हुए रामू डॉक्टर बुलाने पास के कस्बे में दौड़ा। वहॉं प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र है। डॉक्टर की मोटर सायकल गली में आकर रूक गई। रामू डॉक्टर का बैग पकड़े आगे-आगे घर में प्रवेश किया, रामू के पिताजी बैठक के चक्कर काट रहे थे। उन्हें कुछ आशा बंधी। इंजेक्शन लगाते हुए डॉक्टर बोले- ‘‘डरने की कोई बात नहीं है, दस-पंद्रह मिनट में डिलिवरी हो जाएगी।’’ राधा को होश आने लगा अपने बगल में उसे नरम-गरम वस्तु का आभास हुआ। धीरे-धीरे आँखें खोलती हुई उसे शांति महसूस हुई। मॉं की ममता छलकने लगी, किन्तु सारी खुशी क्षण भर में जाती रही जब उसे यह पता चला कि इस बार भी लड़की हुई है। उसे पति के शब्द बार-बार याद आने लगी। ‘‘तुम फिकर मत करो राधा..! इस बार जरूर लड़का होगा|’’ रामू को बेटा खेलाने का शौक था, लेकिन भगवान की मर्जी के सामने इंसान क्या कर सकता है। राधा प्रार्थना करती ‘‘कम से कम एक पुत्र मुझे दे देते भगवान तो तुम्हारा क्या बिगड़ जाता, तुम्हारे यहॉं कुछ कमी तो नहीं हो जाती।’’ लगातार तीन लड़कियों को जन्म देते-देते राधा आधा हो गई। शरीर में थोड़ी भी जान नहीं बची।

आज से छह वर्ष पूर्व रामू की शादी हुई थी। राधा छम-छम करते ससुराल आयी, तो पास-पड़ोस में उसके सुंदरता की चर्चा होने लगी। रूपवती, गुणवती बहू पाकर सास अपने भाग्य को सराहने लगी। गृहकार्य में निपुण राधा मधुर स्वभाव की थी। सास कहती- ‘‘राधा बेटी! जरा गरम पानी तो देना। ससुर कहते- ‘‘बहू! जरा चाय तो बनाना मेहमान आये हैं। सभी बहू की प्रशंसा करते, रामू फूला नहीं समाता।समय पंख लगाकर उड़ने लगा। दिन भर काम करते राधा को पता ही नहीं चलता कि कब सुबह से शाम हो जाती। निम्न मध्यम वर्ग परिवार के नाम से सास-ससुर, पति और स्वयं राधा। घर में दस एकड़ जमीन गुजारा आराम से चल जाता। गॉंव से दो मील की दूरी पर बाजार लगता गॉंव के लोग बुधवार को सप्ताह भर का सामान खरीद लाते। रामू कहता- ‘‘तुम्हारे लिए रसगुल्ला लाऊँगा।’’ राधा के गाल शर्म से लाल हो जाते होंठ फड़कने लगते वह आँचल में मुँह छुपाकर भाग जाती। रामू सायकल लेकर बाजार जाता गली की मोड़ पर घंटी बजाता, राधा दरवाजे से अपने पति को देखती रहती जब तक रामू निगाह से ओझल नहीं हो जाता। बीते दिनोंकी याद आते ही राधा कहीं खो जाती।

गॉंव का चैतू रामू का दोस्त बधाई देते हुए कहता- ‘‘अब तो मुँह मीठा करा यार कितनी सुंदर बच्ची है। तू तो बड़ा भाग्यशाली है यार! साक्षात लक्ष्मी ने तेरे घर जन्म लिया है। अरे! क्या बात है तू बोलता क्यों नहीं यार! क्या तुझे कोई खुशी नहीं है? अरे! दिल क्यों छोटा करता है। मुझे देख शादी हुए दस वर्ष बीत गये, लेकिन तुम्हारी भाभी ने आज तक एक चुहिया तक नहीं जनी। गॉंव के प्रमुख ब्यक्ति चाय-नाश्ता करते रामू को बधाई देते और चले जाते, घर में कोई खुश नहीं रामू अपने सीने पर बोझ महसूस करता मॉं-बाप बूढ़े हैं। पके आम के सामान न जाने कब चू पड़े? पोता देखने के लिए आँखें तरसती रही, सास बात-बात पर ताना देती बहू तो करमजली है। क्या करूँ मॉं जी! मेरे हाथ की बात तो नहीं है राधा रूआँसी हो कहती। घर में नित्य कलह होने लगा। ससुर बहू का पक्ष लेकर पत्नी को डॉंटते- ‘‘इस में इस बेचारी का क्या कसूर है?’’ समय कभी रूकता नहीं दुख बिन बुलाये मेहमान की तरह आता है। बहू को पुत्रीव्रत प्रेम करनेवाला ससुर बेटे-बहू और पत्नी को बिलखते छोड़कर इस संसार से विदा हो गये| पति वियोग में रामू की मॉं दिल की मरीज हो गई। राधा सुबह रामू को चाय देते हुए बोली-‘‘मॉं जी..! अभी तक सो रही है, मैं दो बार दरवाजे से वापस आई हूँ।’’ रामू मॉं को जगाते हुए उठने को कहता है इसके पूर्व मॉं को देख अचानक रामू का दिल बैठता हुआ महसूस हुआ, नाड़ी गायब थी, मुँह खुला का खुला रह गया था। एक सप्ताह के अंदर रामू के माता-पिता उसे छोड़कर स्वर्ग चले गये। रामू के ऊपर दुख का पहाड़ टूट पड़ा। वह संसार में अपने को अकेला महसूस करने लगा। 

समय का चक्र घूमता रहा आषाढ़ का महीना आया आकाश में काले-काले मेघ छाते, लेकिन पता नहीं पानी कहॉं चला जाता, बरसने का नाम ही नहीं लेता किसानोंको निराशा होने लगी, आँखें आकाश की ओर उठाये राधा कहती- ‘‘सुनते हो जी! आज चॉंवल खत्म हो गया है। दुकानदार आगे देने से इनकार करते हैं। पहले का कर्ज चुकाओ तब देंगे।’’ बच्चे रोटी के लिए रोते घर में तीन दिन से चूल्हा नहीं जला, छोटी बच्ची दूध के लिए मचलती, भूखे मॉं के तन में दूध कहॉं से आता। राधा रामू को अपने जेवर उतारकर कहती- ‘‘इसे बेचकर आओ! कम से कम कुछ दिन के लिए भोजन का प्रबंध हो जाएगा।’’ रामू दुखी स्वर में लेने से इनकार करते हुए कहता है- ‘‘नहीं राधा! नहीं, मुझसे यह नहीं होगा, मैं बैलों की जोड़ी बेचकर चॉंवल सब्जी आटा लाऊँगा।’’ इस वर्ष इन्द्र महाराज हम पर कुपित हैं इसलिए एक बूंद पानी नहीं बरसा, फिर आगे सोचेंगे बाजार में पॉंच हजार जोड़ी की बैल को पॉंच सौ में भी लेने को कोई तैयार नहीं हुआ, लाचार रामू गहना गिरवी रखकर खाने पीने का सामान लाया।

चलो राधा! अब शहर चलें... इस गॉंव में क्या रखा है? लोग गॉंव छोड़कर शहर की ओर भाग रहे हैं| गॉंव श्मशान हो रहा है इस अकाल ने अच्छे-अच्छे की कमर तोड़कर रख दी है, राधा दुखी मन से घर में ताला लगाकर चाबी रामू को थमा दी और गाड़ी में बैठ गयी। तीनों बच्चियॉं सहमी मॉं के पास बैठ गयी। स्वामी भक्त कुत्ता मोती गाड़ी के आगे कभी पीछे दौड़ लगाता। राधा को खयाल आया जब डोली से इस घर में पैर रखी थी तब सभी लोग कितने खुश थे। उसने लंबी सॉंस खिंची और आँखें गीली हो गई। चलते-चलते दोपहर हो गई। पास में कुआँ देख रामू ने गाड़ी रोक दी बच्चियॉं प्यासी थी। घर से लाये रोटी सबने गुड़ के साथ खाये और पानी पीये।मोती अपने मालिक के पास पुंछ हिलाते हुए बैठा था। रामू ने स्नेह से थपथपाया चलो मोती अब चलो, राधा मन में विचार कर रही थी दुर्दिन में कोई साथ नहीं देता। अपने सभी पराये हो जाते हैं। गाड़ी शहर के बाहर नदी किनारे रूक गई| रामू गाड़ी से उतरकर झोपड़ी के पास बैठे एक वृद्ध ब्यक्ति से बोला- ‘‘बाबा आप लोग कहॉं से आये हैं? उस ब्यक्ति का नाम मुरली था। उम्र पचास वर्ष के लगभग रही होगी।उदास स्वर में उत्तर दिया यहॉं से २०मील की दूरी पर बिसनपुर नाम का गॉंव है वहीं का रहनेवाला हूँ। इस अकाल में यहॉं चले आये हैं। घर में अच्छी खेती है, लेकिन आज यहॉं हम मजदूरी कर जीवन व्यतीतकर रहें हैं। करीब बीस झोपड़ी थे। रामू शहर से बांस बल्ली लाकर झोपड़ी तैयार कर लिया वह मेहनती किसान था। एक सेठ के यहॉं बोझा ढोने का कार्य मिल गया। इस तरह अपने परिवार का भरण पोषण करने लगा। 

मुरली की पत्नी लक्ष्मी और राधा में बहनापा हो गया। लक्ष्मी राधा से अपने बच्चों का रोना रोते हुई कहती-‘‘क्या बताऊँ बहन मेरे पॉंच बच्चे हैं, दो अभी छोटे हैं, बाकी तीनों निकम्मे हैं। हमारा हाथ बँटाना तो दूर हम पर बोझ बने हैं। बड़ा लड़का गोपाल हमेशा बीमार रहता है। आधी कमाई उसकी दवाई में खर्च हो जाती है| उससे छोटा कमल अवारा है, हमारी सुनता ही नहीं बल्कि उल्टे धौंस देता है, उससे छोटी मुनिया ब्याह लायक हो गई है। हमारे बिरादरी का कोई लड़का हो तो बताना, राधा को लक्ष्मी का दुख अपने दुख से ज्यादा लगा उसे लक्ष्मी से सहानुभूति हो गई। रात रोने-धोने की आवाज से रामू और राधा की नींद खुल गई आँख मलते हुए रामू मुरली के झोपड़ी के पास गया। लक्ष्मी रोते हुए अपनी छाती पीट रही थी। ‘‘हाय इसी दिन के कुलक्षणी को बड़ा किया था। पता होता तो गला घोंटकर मार डालती।’’ पता चला मुनिया किसी के साथ भाग गई है। आये दिन शहरी छोकरे चक्कर काटते थे। कल ३:३० वाली सिनेमा देखने गई थी, तो अभी तक घर नहीं पहुँची|।अंतिम बार उसे किसी लड़के साथ देखा गया था। कमल पिछले सप्ताह झगड़े में एक आदमी को चाकू मार दिया था, उसे पुलिस पकड़कर ले गई कोई जमानत लेने वाला नहीं मिला। दुख की अधिकता के कारण मुरली को दिल का दौरा पड़ा, लक्ष्मी अकेली बेचारी बच्चों को संभालती कि मुरली को। रामू राधा को लक्ष्मी की देखभाल के लिए छोड़कर मुरली को जिला अस्पताल में भरती करा दिया। धीरे-धीरे मुरली की हालत सुधरती गई मुरली ठीक होकर घर आ गया। 

एक दिन बस्ती में मुनिया अपने मॉं-बाप के झोपड़ी के बाहर रो रही थी, उसके कपड़े मैले-कुचैले और फटे हुए थे, जिस लड़के के साथ भागी थी उसने उसको मारपीटकर घर से निकाल दिया है, अत: वह वापस अपने बाप के घर आ गई है और अपने किये पर पछता रही है। अकाल के कारण न जाने कितने लड़कियॉं घर से भाग गई और अपने भाग्य पर रो रही है, कितने घर बर्बाद हो गये हैं। रामू सोचने लगा लोग पेट भरने के लिए अपनी इज्जत बेच रहे हैं। जमीन जायजाद बेच रहे हैं, ताकि पापी पेट को दो जून खाना मिल सके अकाल जो कराये थोड़ा है। बस्ती के लोग दिन भर काम करने शहर चले जाते, बस्ती में छोटे बच्चे और बूढ़े ब्यक्ति दिन को दिखाई पड़ते। पूरा बस्ती सूना है। मुनिया का पति शराब के नशे में मुनिया को अपने साथ चलने को कहता है| ‘‘घर में कोई नहीं है, मैं ऐसे कैसी जा सकती हूँ? बापू के आते तक रूक जाओ फिर तुमने तो मुझे घर से निकाल दिया है मैं तुम्हारे साथ नहीं जा सकती।’’ ‘‘साली नखरे करती है मेरे साथ जाने से मना करती है, सतिसावित्री बनती है यहॉं धंधा करती है। बुला अपने यार को’’ कहकर मुनिया की चोटी पकड़कर मारने लगा, मुनिया प्राण बचाने इधर-उधर भागने लगी रास्ते में पड़े पत्थर को देख मुनिया रूक गयी। रूक जाओ नहीं तो मार डालूँगी कहकर अपने पति को डराने लगी। तब तक उसका पति नजदीक आ गया| उसने मुनिया का गला पकड़ लिया, खींचतान में उसका हाथ गले पर कसता चला गया। मुनिया की आँखें फटी की फटी रह गयी। जीभ बाहर निकल आया, मुनिया का प्राणान्त हो गया। मुनिया की मॉं अपनी बेटी को कुलक्षणी कहती थी, वही उसके शरीर से लिपटकर रोने लगी। आज मुनिया सदा के लिए संसार से विदा हो गई थी।


विश्राम सिंह चंद्राकर
अध्यक्ष, सरस साहित्य समिति गुण्डरदेही

शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

छत्तिसगढ़ी जनभाखा के बर्तमान सरूप

छत्तिसगढ़ के छत्तिसों गढ़ ले निकले सुर के गुन-भॉंज ले बने भाखा के नाँव छत्तिसगढ़ी आय। छत्तिस सुर के गुन-भॉंज के सेती कोस-कोस म पानी बदले, चार कोस म बानीवाले हाना पूरा छत्तिसगढ़ म छाहित हाबे। येकर ले जादा छाहित बाहे छत्तिसगढ़ी के गुरतुरपन। संस्किरित के ‘गुड़’ अउ ‘तुल्य’ ले बने गुरतुर सब्द के अर्थ होथे- गुर असन मींठ। गुर असन मींठ काबर हाबे छत्तिसगढ़ी भाखा ह? छत्तिसगढ़ी पूर्वी हिंदी के भाखा आय। पूर्वी हिंदी म अउ कई भाखा हाबें, फेर कोनों ल अइसन बिसेसन काबर नइ मिलिस? ये बात ल धोखे ले छत्तिसगढ़ी के सरूप जइसन ढंग ले मिलिस वोहा बिंदुवार अइसन ढंग ले हाबे-




ये जम्मो आखर के उचार सब्बो वर्ग के मनसे बर निच्चट सरल हाबे। देवनागरी लिपि के ‘ण, श, ष, क्ष, त्र, ज्ञ, श्र’ आदि आखर मन के उपयोग छत्तिसगढ़ी म होबे नइ करें। येकर दू कारन बताये जा सकथे- 1. इन ल भाखे ले उचार-अवयव म थोकिन बल नइते तनाव जादा परथे । अर्थात्‌ उचार कठिन होथे । 2. ऊपर बताय 40 आखर ले पूरा भाव ब्यक्त तो होबेच करथे, येकर ले भाखा परकिरिति अउ वोकर गुन-धरम के घलो पूरा-पूरा हियाव होथे । आखर-ओरी तो भाखा के नेंव आय। जइसे नेंव के खोदा-खादी ले मकान के मजबूती खतम हो जथे, वइसने आखर-ओरी म आखर के घटा-बढ़ी ले भाखा के मौलिकता सिरा जथे । बिन मौलिक गुन-धरम के बिकास ल सिरिफ भाखा के बिनास केहे जा सकथे । भाखा के सहीं बिकास तो तभे माने जही जब आखर-ओरी के सीमा म रहिके भाव ब्यक्त करे खातिर सब्द गढ़े जाही, नइते हिंदी जइसे संस्किरित के जम्मो आखर ल अपनाय के बाद काँट-छाँट के बुता आज ले चलत हे, वइसने छत्तिसगढ़ी म घलो बइगुन बाढ़ जही। बइगुन ल जानबूझ के दुहराना बुधमानी नइ हो सके।


ब) सब्द उचार म सरलीकरन- छत्तिसगढ़ी के सबले बड़े गुन सब्द ल निच्चट सहज अउ सरल ढंग ले उचारे के आय। इही बिसेसता के सेती छत्तिसगढ़ी के अलगे चिन्हारी होथे । आने भाखा ले आय हर सब्द ल वोकर मूल रूप म नइ सिवकार के अपन आखर-ओरी के अनुसार सहज-सरल रूप म सिवकारे जाथे । एकर ले एक फायदा यहू हाबे, उचार-अवयव म जादा ताकत नइ लगे ले चेहरा-मोहरा के सुंदरता बरोबर बने रथे । ये सहज-सरल तरीका ह छत्तिसगढ़ी भाखा-भखइया मन के उचार-दोस, अगियानता नइते गँवइहापन नोहे, भलुक छत्तिसगढ़ी भाखा के परकिरिति आय। इही परकिरिति के सेती छत्तिसगढ़ी गुरतुर भाखा कहाथे । जन-जन के अंतस म समा जथे अउ पूर्वी हिंदी के जम्मो भाखा ले अलगे चिन्हारी बनाथे, जइसे-




2. जम्मो मनसे बर बरोबर भाव- संस्किरिति के अनसार सब्द अउ भाखा के सरूप निरधारित होथे । छत्तिसगढ़ के संस्किरिति म जम्मो मनसे बर एक बरोबर भाव देखे बर मिलथे । लोक-बेवहार खातिर जउन नाँव छुटपन म धरा देय जाथे उही नाँव ले अपन करम के मुताबिक जगजहिर होथे । कोनो मनसे कतको गुनवान हो जाय, कोनो कतको बिदवान हो जाय, कोनो कतको धनमान हो जाय, चाहे कोनो कतको महान हो जाय फेर वोकर नाँव के आघू ‘श्री, श्रीमान, सुश्री, श्रीमती’ आदि सनमान के सब्द उपयोग नइ होय। एकर पाछू सोंच सायेद अतके रथे के जम्मो परानी परमात्मा के अंस आँय। जम्मो म बरोबर गुन-धरम होथे । अपन-अपन बुता म सब्बो महान होथें। एकर पाय के सब्बो के सनमान घलो बरोबर होना चाही। कोनो ल उपरहा सनमान दे के एक बर मॉंय एक बर मोसी करे के बेवहार छत्तिसगढ़ के संस्कार नोहे।

कोनो पहुना के आय ले आदर-सत्कार भले जी-जान लगा के करथन, फेर वोकरो नाँव के आघू सनमान खातिर कोनो सब्द नइ जोंड़न। सीधा-सीधा नाँव लेय ले अपनत्व के भाव जागथे । हिरदे म परेम-गंगा के भाव दुन्ना हो जथे । इही परेम गंगा म सरोबर होय ले पहुना हम छत्तिसगढ़िया मन बर भगवान बन जथे । अत्तेक मयाँ पलपलावय के बाद घलो कोनो बर मनगढ़न उपरहा सब्द-बेवहार करे के संस्कार छत्तिसगढ़ म नइ हे। हमर संस्कार तो सब बर दया-मयाँ के भाव-डोर ले कस के कसाय हाबे।

छत्तिसगढ़ म ये बात जरूर देखे बर मिलथे के कोनो ल सनमान देनच हे त नाँव के पाछू कोती ‘दाऊ’ सब्द जोंड़ देय जाथे । जइसे- रामसिंग दाऊ घर जाबे। कोनो-कोनो मन ‘दाऊ’ सब्द ल नाँव के आघू म जोंड़थें जइसे- दाऊ रामसिंग...... आदि। ‘दाऊ’ सब्द के अइसन उपयोग सनमान खातिर होथे, अइसे केहे तो जा सकथे, फेर एकर अर्थ अतकिच नइ हे। कारन के- (1) ‘दाऊ’ सब्द के उपयोग कोनो महानेच मनसे बर नइ करे जाय। एकर उपयोग छोटे-बड़े सबो बर होथे । दाई-ददा मन घलो अपन लइका बर ‘दाऊ’ सब्द के उपयोग करथें, जइसे- आ रे मोर दाऊ.......। (2) ‘दाऊ’ सब्द के उपयोग सर्वनाम के पाछू म घलो करे जाथे जइसे- मोर दाऊ। (3) धनमान ल ‘दाऊ’ केहे म भले अपन ल सनमानित समझे, फेर दीगर के मन म सनमान के भाव नइ जागे। कारन के ‘दाऊ’ के मूल म दया के भाव होथे । येकर उत्पत्ति कहूँ संस्किरित के ‘देवः’ ले मानन त समास के आखरी म परयोग होय ले अर्थ होथे- अपन देंवता के रूप म। नाँव अउ सर्वनाम के पाछू म ‘दाऊ’ के उपयोग इही अधार म करे जाथे । तभे तो छत्त्सिगढ़ म हर पहुना अउ भला मानुस ल देंवता के रूप म देखे जाथे अउ वोकर नाँव के पाछू म ‘दाऊ’ सब्द जोंड़ दे जाथे । जेकर बर मन म देवत्व भाव जागथे, वोहर सब बर दयच तो करथे । बिन दया भाव के कोनो ह कोनो के हितवा नइ बन सके। एकर सेती जम्मो परानी बर ‘दाऊ’ सब्द के उपयोग करे जाये। लइका मन देंवता सरूप होथें, एकर सेती उन ल ‘दाऊ’ केहे जाथे । संस्किरित के ‘दय्+अलुच=दयालु’ ले ‘दाऊ’ के उत्पत्ति घलो माने जा सकथे । एकर अर्थ दया करइया होथे । हर हितवारथी, पहुना अउ लइका मन ल दया-भाव ले देखे जाथे तेकर सेती लइका-सियान जम्मो बर ‘दाऊ’ सब्द उपयोग म आथे ।

कुछ बिदवान मन के मानना हे- संस्किरित के ‘दा’=देना+‘ऊ’=दया अउ सुरच्छाबोधक प्रत्यय ले ‘दाऊ’ सब्द बने हे। येकर अर्थ होथे- दया अउ सुरच्छा देवइया। लेनदेन के बात तो बड़े मन बर ठीक हे, फेर लइका मन घलो दया-मयाँ देके मानसिक तरास ले सुरच्छा तो करथे । ‘दाऊ’ के चाहे कोनो अर्थ निकालन मूल मा दया-मयाँ के भाव मिलथे । अइसन ढंग ले छत्तिसगढ़ी भाखा म सनमान खातिर घलो सिरिफ चमत्कारिक सब्द योजना नइ मिले भलुक भाव गंभीरता अत्तेक हे के डुबकी लगइया के मन गदगद हो जथे ।


3. सब्द के भाव अउ बेवहार म अटूट संबंध : छत्तिसगढ़ी म आदर सूचक सर्वनाम के रूप म ‘तुमन, तहूँमन’ अउ ‘तुँहर’ के उपयोग करे जाथे । हिंदी म ‘तू’ समान्य एक बचन सर्वनाम आय। एकर आदरार्थक रूप ‘आप’ होथे । ‘आप’ के उपयोग छत्तिसगढ़ी म पढ़े-लिखे वर्ग मन अब करत हें। गॉंव-गँवई म एकर उपयोग आजो नइ होय। हिंदी के ‘तू’ म ‘मन’ परत्यय जोंड़े ले ‘त’ के बड़े ‘ऊ’ ह छोटे ‘उ’ म बदल जथे अउ सब्द-रूप ‘तुमन’ बहुबचन बन जथे । कारन के ‘मन’ बहुबचन परत्यय आय, जइसे- तुमन गे रेहेव। जब जवइया के संखिया दू नइते दू ले जादा होथे तभे ‘तुमन’ बहुबचन सर्वनाम के रूप म उपयोग होथे । कहूँ जवइया एके झन हे अउ कोनो किसम ले आदर पाय के लइक हे तब ‘तुमन’ के ‘मन’ परत्यय आदर सूचक बन जथे, जइसे- तुमन गे रेहेव (आप गये थे ।) अइसने किसम ले ‘तहूँमन’ के उपयोग बहुबचन अउ आदरार्थक दुनों रूप म होथे, जइसे- तहूँमन गे रेहेव। ‘तुँहर’ सब्द घलो दुनों अर्थ म परयोग होथे, जइसे- तुँहर गत ल तो देखो। हिंदी के ‘तुम्ह’ म ‘र’ परत्यय जुड़े ले ‘तुम्हर’ अउ बाद म ‘तुँहर’ के रूप धारन करिस। एमा ‘मन’ परत्यय लगाय के जरूरत नइ हे। ‘र’ ले ‘मन’ परत्यय के अर्थ पूरा हो जथे । आदरार्थक सर्वनाम ल बहुबचन बनाय बर ‘सब’ परत्यय जो़ंडे जाथे, जइसे- तुमन सब, तुहँर सब आदि।


परस्न उठथे ‘तू’ सर्वनाम ल काबर सिवकारे गिस? हिंदी म येकर आदरार्थक रूप ‘आप’ आय। वोला काबर नइ लेय गिस? हिंदी के बिदवान मन घलो ये बात ल मानथें के आप केहे ले वोकर बड़प्पन के भाव मन म आथे । बड़े ले भय, संकोच, लिहाज आदि के सेती दूरी बाढ़ जथे । ‘तू’ सब्द ले बरोबरी के बोध होथे । बरोबरी म भाईचारा, मयॉं, अपनत्व के भाव पनपथे । दिल के निच्चट नजीक होय के अनभो होथे । इही अनभो के सेती भगवान बर घलो ‘तू’ सर्वनाम उपयोग कर दे जाथे । संस्किरित म घलो ‘त्वमेव माता च पिता त्वमेव’ केहे जाथे । संस्किरित के ‘त्वम्’ ले हिंदी म ‘तू’ अउ हिंदी के ‘तू’ ले छत्तिसगढ़ी म ‘तुमन’ सिरजे हे। भगवान बर ‘तू’ के उपयोग अर्थ्लृात अनन्य परेम, अंतस चीर के मयाँ कुढ़ोय के भाव ले सराबोर ‘तू’ सब्द ल मूल बना के परेम रस ल छत्तिसगढ़ी म लाय गेहे अउ संस्किरित के ‘मन’= बड़े नइते महान मानना ल परत्यय रूप म सिवकारे ले ‘तुमन’ सब्द बने हे। अइसन ढंग ले जउन ल बड़े, महान अउ पूजनीय मानथन ऊँकर सनमान खातिर अंतस के मयाँ ले सराबोर ‘तुमन, तहूँमन’ नइते ‘तुँहर’ जइसे सब्द के उपयोग छत्तिसगढ़ी म करे जाथे। डर-तरास उपजाके दूरी बढ़इया ‘आप’ सब्द के उपयोग नइ करे जाय।



छत्तिसगढ़ी म असनो सब्द हाबे जेकर उपयोग जरूरत के मुताबिक संगिया, बिसेसन, किरिया आदि म बिना सोंचे-बिचारे कभू भी करे जा सकथे । एकर ले गोठियात खानी कोनो बात जबान म नइ आ पाय तभो बोले म बाधा नइ परे अउ सुनइया ह बहुत कुछ समझ घलो जथे । अइसन सब्द ल स्थ्लृानापन्न (ऑफिसिएटिंग) केहे जा सकथे । वो सब्द आय- ‘अइहे’। येला ‘एहे’ घलो कहे जाथे, जइसे-

















भाखा के नियम बद्धता ले छत्तिसगढ़ी म सहजता अउ सरलता के गुन तो कूट-कूट के भरायेच हाबे, बर्तनी दोस के संभावना घलो निच्चट कम होगे हे। सब्द मन के भाव अउ बेवहार म अइसे अटूट संबंध मिलथे के भाखा के मिठास गुड़ जइसे मुह म आते साठ हिरदे तक उतर जथे । कम सब्द अउ नान-नान बाक्य ले पूरा-पूरा भाव ब्यक्त करे के अजगुत छमता गागर म सागर भराय के गुन ल सूचित तो करबे करथे, छत्तिसगढ़ी भाखा के बिकसित सरूप के परचय घलो देथे । सब्द सरलीकरन के सेती छत्तिसगढ़ी भाखा भाखे म सरल अउ सूने म बड़ सुग्घर लागथे । अत्तेक मनभावन छत्तिसगढ़ी भाखा आज छत्तिसगढ़ियच मन ल लिखे-पढ़े बर मुसकिल होथे । एकर एके कारन हाबे- अभियास के अभाव। थोरिक दिन के अभियास ले ये जम्मो गुन सब के समझ म आ जही। एमा कोनो दिक्कत के बात नइ हे। जरूरत भलुक ये बात के हाबे- छत्तिसगढ़ी के मूलभूत बिसेसता ल समझे खातिर अपन आँखी ले हिंदी के चसमा उतारे ल परही। जब तक ये चसमा नइ उतरही तब तक छत्तिसगढ़ी ल पूरा-पूरा समझे के आत्मबिसवाँस जागे ले घलो धोखच मिलही। ये ह चेत करे के लइक बात आय।


बुधवार, 20 नवंबर 2013

हॉकी के जादूगर ध्यानचंद

नंगे पांव हिटलर के देश को हराया, जब मरे तो सरकार ने सुध नहीं ली हॉकी के जादूगर ध्यानचंद की...


हॉकी के जादूगर और इस खेल के दुनिया के अब तक के सबसे बड़े खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद
आज पूरे देश में सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न मिलने के बाद बहस हो रही है कि हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को यह सम्मान क्यों नहीं. क्या ध्यानचंद के वक्त इतना मीडिया होता, टीवी युग होता, तो यह अनदेखी मुमकिन? क्या था ध्यानचंद का जादू और उनका करियर? क्यों हिटलर उन्हें अपनी सेना में कर्नल बनाना चाहता था? ब्रिटेन उनसे हारने के बाद अपनी टीम को ओलंपिक में ही नहीं भेजता था और क्यों पचास की उम्र के बाद भी ध्यानचंद को न चाहते हुए भी खेलना पड़ा और आखिर में कैसे वह एम्स में कमोबेश गुमनामी की हालत में मरे... ये सब हुआ 1926 से 1947 के दौर में. 21 बरस. जी सचिन के 24 तो ध्यानचंद के 21 बरस. सचिन के कुल जमा 15921 रन तो ध्यानचंद के 1076 गोल.

ध्यानचंद ने किया कर्नल से वादा, आगे किसी से नहीं हारेंगे
पहली बार 1928 में भारतीय हॉकी टीम ओलंपिक में हिस्सा लेने ब्रिटेन पहुंचती है और 10 मार्च 1928 को एमस्‍टर्डम में फोल्कस्टोन फेस्टिवल. ओलंपिक से ठीक पहले फोल्कस्टोन फेस्टिवल में जिस ब्रिटिश साम्राज्य में सूरज डूबता नहीं था उस देश की राष्ट्रीय टीम के खिलाफ भारत की हॉकी टीम मैदान में उतरती है. और भारत ब्रिटेन की राष्ट्रीय हॉकी टीम को इस तरह पराजित करता है कि अपने ही गुलाम देश से हार की कसमसाहट ऐसी होती है कि ओलंपिक में ब्रिटेन खेलने से इनकार कर देता है. हर किसी का ध्यान ध्यानचंद पर जाता है, जो महज 16 बरस में सेना में शामिल होने के बाद रेजिमेंट और फिर भारतीय सेना की हॉकी टीम में चुना जाता है और सिर्फ 21 बरस की उम्र में यानी 1926 में न्यूजीलैड जाने वाली टीम में शरीक होता है, और जब हॉकी टीम न्यूजीलैड से लौटती है तो ब्रिटिश सैनिक अधिकारी ध्यानचंद का ओहदा बढ़ाते हुये उसे लांस-नायक बना देते हैं क्योंकि न्यूजीलैंड में ध्यानचंद की स्टिक कुछ ऐसी चलती है कि भारत 21 में से 18 मैच जीतता है. 2 मैच ड्रा होते हैं और एक में हार मिलती है. हॉकी टीम के भारत लौटने पर जब कर्नल जॉर्ज ध्यानचंद से पूछते हैं कि भारत की टीम एक मैच क्यों हार गयी तो ध्यानचंद का जबाब होता है कि उन्हें लगा कि उनके पीछे बाकी 10 खिलाड़ी भी हैं. अगला सवाल, तो आगे क्या होगा. जवाब आता है कि किसी से हारेंगे नहीं. इस प्रदर्शन और जवाब के बाद ध्यानचंद लांस नायक बना दिए गए.

हिटलर के सामने क्या करेगा भारत का ध्यानचंद
तो बर्लिन ओलंपिक एक ऐसे जादूगर का इंतजार कर रहा है, जिसने सिर्फ 21 बरस में दिये गये वादे को ना सिर्फ निभाया बल्कि मैदान में जब भी उतरा अपनी टीम को हारने नहीं दिया. चाहे एमस्टर्डम में 1928 का ओलंपिक हो या सैन फ्रांसिस्को में 1932 का ओलंपिक. और अब 1936 में क्या होगा जब हिटलर के सामने भारत खेलेगा. क्या जर्मनी की टीम के सामने हिटलर की मौजूदगी में ध्यानचंद की जादूगरी चलेगी? जैसे-जैसे बर्लिन ओलंपिक की तारीख करीब आ रही है वैसे-वैसे जर्मनी के अखबारो में ध्यानचंद के किस्से किसी सितारे की तरह यह कहकर चमकने लगे हैं कि ‘चांद’ का खेल देखने के लिए पूरा जर्मनी बेताब है क्योंकि हर किसी को याद आ रहा है 1928 का ओलंपिक. ऑस्ट्रिया को 6-0, बेल्जियम को 9-0, डेनमार्क को 5-0, स्वीटजरलैंड को 6-0 और नीदरलैंड को 3-0 से हराकर भारत ने गोल्ड मेडल जीता तो समूची ब्रिटिश मीडिया ने लिखा कि यह हॉकी का खेल नहीं जादू था और ध्यानचंद यकीनन हॉकी के जादूगर हैं. लेकिन बर्लिन ओलंपिक का इंतजार कर रहे हिटलर की नज़र 1928 के ओलंपिक से पहले प्रि ओलपिंक में डच, बेल्जियम के साथ जर्मनी की हार पर थी. और जर्मनी के अखबार 1936 में लगातार यह छाप रहे थे जिस ध्यानचंद ने कभी भी जर्मनी टीम को मैदान पर बख्शा नहीं चाहे वह 1928 का ओलंपिक हो या 1932 का तो फिर 1936 में क्या होगा. क्योंकि हिटलर तो जीतने का नाम है. तो क्या बर्लिन ओलंपिक पहली बार हिटलर की मौजूदगी में जर्मनी की हार का तमगा ठोकेगा? और इधर मुंबई में बर्लिन जाने के लिये तैयार हुई भारतीय टीम में भी हिटलर को लेकर किस्से चल पड़े थे. पत्रकार टीम के मैनेजर पंकज गुप्ता और कप्तान ध्यानचंद से लेकर लगातार सवाल कर रहे थे इस खास मुकाबले के बारे में.

ध्यानचंद के स्वागत को 24 घंटे के लिए रोक दिया गया जहाजों का ट्रैफिक
1928 में जब ओलपिंक में गोल्ड लेकर भारतीय हॉकी टीम बंबई हारबर पहुंची थी तो पेशावर से लेकर केरल तक से लोग विजेता टीम के एक दर्शन करने और ध्यानचंद को देखने भर के लिये पहुंचे थे. उस दिन बंबई के डाकयार्ड पर मालवाहक जहाजों को समुद्र में ही रोक दिया गया था. जहाजों की आवाजाही भी 24 घंटे नहीं हो पायी थी क्योंकि ध्यानचंद की एक झलक के लिये हजारों हजार लोग बंबई हारबर में जुटे और ओलंपिक खेल लौटे ध्यानचंद का तबादला 1928 में नार्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस वजीरिस्तान [फिलहाल पाकिस्तान] में कर दिया गया, जहां हाकी खेलना मुश्किल था. पहाड़ी इलाका था. मैदान था नहीं. लेकिन ओलंपिक में सबसे ज्यादा गोल [5 मैच में 14 गोल] करने वाले ध्यानचंद का नाम 1932 में सबसे पहले ओलंपिक टीम के खिलाडियों में यह कहकर लिखा गया कि सेंट फ्रांसिस्को ओलंपिक से पहले प्रैक्टिस मैच के लिये टीम को सिलोन यानी मौजूदा वक्त में श्रीलंका भेज दिया जाए. दो प्रैक्टिस मैच में भारत की ओलंपिक टीम ने सिलोन को 20-0 और 10-0 से हराया. ध्यानचंद ने अकेले डेढ दर्जन गोल ठोंके और उसके बाद 30 जुलाई 1932 में शुरू होने वाले लॉस एंजेलिस ओलंपिक के लिये भारत की टीम 30 मई को मुंबई से रवाना हुई.

फाइनल में अमेरिका के खिलाफ दो दर्जन गोल हुए 
लगातार 17 दिन के सफर के बाद 4 अगस्त 1932 को अपने पहले मैच में भारत की टीम ने जापान को 11-1 से हराया. ध्यानचंद ने 3 गोल किए. फाइनल में मेजबान देश अमेरिका से भारत का सामना था और माना जा रहा था कि मेजबान देश को मैच में अपने दर्शकों का लाभ मिलेगा. लेकिन फाइनल में भारत ने अमेरिकी टीम के खिलाफ दो दर्जन गोल ठोंके. जी हां, भारत ने अमेरिका को 24-1 से हराया. इस मैच में ध्यानचंद ने 8 गोल किए. लेकिन पहली बार ध्यानचंद को गोल ठोंकने में अपने भाई रूप सिंह से यहां मात मिली क्योंकि रूप ने 10 गोल ठोंके. लेकिन 1936 में तो बर्लिन ओलंपिक को लेकर जर्मनी के अखबारों में यही सवाल बड़ा था कि जर्मनी मेजबानी करते हुए भारत से हार जाएगा या फिर बुरी तरह हारेगा और ध्यानचंद का जादू चल गया तो क्या होगा. क्योंकि 1932 के ओलंपिक में भारत ने कुल 35 गोल ठोंके थे और खाए महज 2 गोल थे. और तो और ध्यान चंद और उनके भाई रूपचंद ने 35 में से 25 गोल ठोंके थे. तो बर्लिन ओलंपिक का वक्त जैसे जैसे नजदीक आ रहा था, वैसे वैसे जर्मनी में ध्यानचंद को लेकर जितने सवाल लगातार अखबारों की सुर्खियों में चल रहे थे उसमें पहली बार लग कुछ ऐसा रहा था जैसे हिटलर के खिलाफ भारत को खेलना है और जर्मनी हार देखने को तैयार नहीं है. लेकिन ध्यानचंद के हॉकी को जादू के तौर पर लगातार देखा जा रहा था और 1932 के ओलंपिक के बाद और 1936 के बर्लिन ओलंपिक से पहले यानी इन चार बरस के दौरान भारत ने 37 अंतरराष्ट्रीय मैच खेले जिसमें 34 भारत ने जीते, 2 ड्रा हुये और 2 रद्द हो गये. यानी भारत एक मैच भी नहीं हारा. इस दौर में भारत ने 338 गोल किये जिसमें अकेले ध्यानचंद ने 133 गोल किए. बर्लिन ओलंपिक से पहले ध्यानचंद के हॉकी के सफर का लेखा-जोखा कुछ इस तरह जर्मनी में छाने लगा कि हिटलर की तानाशाही भी ध्यानचंद की जादूगरी में छुप गई.

पहले ही प्रैक्टिस मैच में दी जर्मनी को पटखनी
बर्लिन ओलंपिक की शान ही यही थी कि किसी मेले की तरह ओलंपिक की तैयारी जर्मनी ने की थी. ओलंपिक ग्राउंड में ही मनोरंजन के साधन भी थे और दर्शकों की आवाजाही भी जबरदस्त थी. ओलपिंक शुरू होने से 13 दिन पहले 17 जुलाई 1936 को जर्मनी के साथ प्रैक्टिस मैच भारत को खेलना था. 17 दिन के सफर के बाद पहुंची टीम थकी हुई थी. बावजूद इसके भारत ने जर्मनी को 4-1 से हराया और उसके बाद ओलंपिक में बिना गोल खाए हर देश को बिलकुल रौंदते हुए भारत आगे बढ़ रहा था और जर्मनी के अखबारों में छप रहा था कि हॉकी नहीं जादू देखने पहुंचें. क्योंकि हॉकी का जादूगर ध्यानचंद पूरी तरह एक्टिव है. भारत ने पहले मैच में हंगरी को 4-0, फिर अमेरिका को 7-0, जापान को 9-0, सेमीफाइनल में फ्रांस को 10-0 से हराया और बिना गोल खाए हर किसी को हराकर फाइनल में पहुंचा. यहां सामने थी हिटलर की टीम यानी जर्मनी की टीम. फाइनल का दिन था 15 अगस्त 1936.

भारतीय टीम ने खाई तिरंगे की कसम, नहीं डरेंगे हिटलर से
भारतीय टीम में खलबली थी कि फाइनल देखने एडोल्फ हिटलर भी आ रहे थे और मैदान में हिटलर की मौजूदगी से ही भारतीय टीम सहमी हुई थी. ड्रेसिंग रूम में सहमी टीम के सामने टीम के मैनेजर पंकज गुप्ता ने गुलाम भारत में आजादी का संघर्ष करते कांग्रेस के तिरंगे को अपने बैग से निकाला और ध्यानचंद समेत हर खिलाड़ी को उस वक्त तिंरगे की कसम खिलाई कि हिटलर की मौजूदगी में घबराना नहीं है. यह कल्पना के परे था. लेकिन सच था कि आजादी से पहले जिस भारत को अंग्रेजों से मु्क्ति के बाद राष्ट्रीय ध्वज तो दूर संघर्ष के किसी प्रतीक की जानकरी पूरी दुनिया को नहीं थी और संघर्ष देश के बाहर गया नहीं था, उस वक्त भारतीय हॉकी टीम ने तिरंगे को दिल में लहराया और जर्मनी की टीम के खिलाफ मैदान में उतरी. हिटलर स्टेडियम में ही मौजूद था.

हाफ टाइम के बाद ध्यानचंद ने उतारे जूते
टीम ने खेलना शुरू किया और गोलों का सिलसिला भी फौरन शुरू हो गया. हाफ टाइम तक भारत 2 गोल ठोंक चुका था. 14 अगस्त को बारिश हुई थी तो मैदान गीला था और बिना स्पाइक वाले रबड़ के जूते लगातार फिसल रहे थे. ध्यानचंद ने हाफ टाइम के बाद जूते उतार कर नंगे पांव ही खेलना शुरू किया. जर्मनी को हारता देख हिटलर मैदान छोड़ जा चुका था. उधर नंगे पांव खेलते ध्यानचंद ने हाफ टाइम के बाद गोल दागने की रफ्तार बढ़ा दी थी. इस मैच में भारत ने 8-1 से जर्मनी को हराया.

रात भर सो नहीं पाए ध्यानचंद हिटलर को मिलने के ख्याल से 
फाइनल के अगले दिन यानी 16 अगस्त को ऐलान हुआ कि विजेता भारतीय टीम को मेडल पहनाएंगे हिटलर. इस खबर को सुनकर ध्यानचंद रात भर नहीं सो पाए. भारत में जैसे ही ये खबर पहुंची यहां के अखबार हिटलर के अजीबोगरीब फैसलों के बारे में छाप कर आशंका का इंतजार करने लगे. बहरहाल, अगले दिन हिटलर आए और उन्होंने ध्यानचंद की पीठ ठोंकी. उनकी नजर ध्यानचंद के अंगूठे के पास फटे जूतों पर टिक गई. ध्यानचंद से सवाल जवाब शुरू हुआ. जब हिटलर को पता चला कि ध्यानचंद ब्रिटिश इंडियन आर्मी की पंजाब रेजिमेंट में लांस नायक जैसे छोटे ओहदे पर है, तो उसने ऑफर किया कि जर्मनी में रुक जाओ, सेना में कर्नल बना दूंगा. ध्यानचंद ने कहा, नहीं पंजाब रेजिमेंट पर मुझे गर्व है और भारत ही मेरा देश है. हिटलर ध्यानचंद को मेडल पहनाकर स्टेडियम से चले गए. ध्यानचंद की सांस में सांस आई.

देश के दबाव में खेलते रहे पचास के पार तक
बर्लिन से जब हाकी टीम लौटी तो ध्यानचंद को देखने और छूने के लिये पूरे देश में जुनून सा था. रेजिमेंट में भी ध्यानचंद जीवित किस्सा बन गए. उन्हें 1937 में लेफ्टिनेंट का दर्जा दिया गया. सेना में वह लगातार काम करते रहे और जब 1945 में दूसरा विश्व युद्ध खत्म हुआ, तो ध्यानचंद की उम्र हो चुकी थी 40 साल. उन्होंने कहा कि अब नए लड़कों को आगे आना चाहिए और मुझे रिटायरमेंट लेना चाहिए. मगर देश का उन पर ऐसा न करने का दबाव था. और 1926 में अपने कर्नल से कभी न हारने का जो वादा उन्होंने किया था, उसे 1947 तक बेधड़क निभाते रहे.

51 बरस की उम्र में 1956 में आखिरकार ध्यानचंद रिटायर हुये तो सरकार ने पद्मविभूषण से उन्हें सम्मानित किया और रिटायरमेंट के महज 23 बरस बाद ही यह देश ध्यानचंद को भूल गया. इलाज की तंगी से जूझते ध्यानचंद की मौत 3 दिसबंर 1979 को दिल्ली के एम्स में हुई. उनकी मौत पर देश या सरकार नहीं बल्कि पंजाब रेजिमेंट के जवान निकल कर आए, जिसमें काम करते हुये ध्यानचंद ने उम्र गुजार दी थी और उस वक्त हिटलर के सामने पंजाब रेजिमेंट पर गर्व किया था जब हिटलर के सामने समूचा विश्व कुछ बोलने की ताकत नहीं रखता था. पंजाब रेजिमेंट ने सेना के सम्मान के साथ ध्यानचंद को आखिरी विदाई थी.

मौका मिले तो झांसी में ध्यानचंद की उस आखिरी जमीन पर जरूर जाइएगा, जहां टीवी युग में मीडिया नहीं पहुंचा है. वहां अब भी दूर से ही हॉकी स्टिक के साथ ध्यानचंद दिख जाएंगे. और जैसे ही ध्यानचंद की वह मूर्ति दिखायी दे तो सोचिएगा कि अगर ध्यानचंद के वक्त टीवी युग होता और हमने ध्यानचंद को खेलते हुये देखा होता तो ध्यानचंद आज कहां होते. लेकिन हमने तो ध्यानचंद को खेलते हुए देखा ही नहीं.

बुधवार, 21 अगस्त 2013

रक्षाबंधन

बहना ने भाई की कलाई से प्यार बाँधा है, प्यार के दो तार से संसार बाँधा है... सुमन कल्याणपुर द्वारा गाया या यह गाना रक्षाबंधन का बेहद चर्चित गाना है। भले ही ये गाना बहुत पुराना न हो पर भाई की कलाई पर राखी धने का सिलसिला बेहद प्राचीन है। रक्षाबंधन का इतिहास सिंधु घाटी की सभ्यता से जुड़ा हुआ है। वह भी तब जब आर्य समाज में सभ्यता की रचना की शुरुआत मात्र हुई थी। 

रक्षाबंधन पर्व पर जहाँ बहनों को भाइयों की कलाई में रक्षा का धागा बाँधने का बेसब्री से इंतजार है, वहीं दूर-दराज बसे भाइयों को भी इस बात का इंतजार है कि उनकी बहना उन्हें राखी भेजे। उन भाइयों को निराश होने की जरूरत नहीं है, जिनकी अपनी सगी बहन नहीं है, क्योंकि मुँहबोली बहनों से राखी बंधवाने की परंपरा भी काफी पुरानी है। 

असल में रक्षाबंधन की परंपरा ही उन बहनों ने डाली थी जो सगी नहीं थीं। भले ही उन बहनों ने अपने संरक्षण के लिए ही इस पर्व की शुरुआत क्यों न की हो लेकिन उसी बदौलत आज भी इस त्यौहार की मान्यता बरकरार है। इतिहास के पन्नों को देखें तो इस त्यौहार की शुरुआत की उत्पत्ति लगभग 6 हजार साल पहले बताई गई है। इसके कई साक्ष्य भी इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं।

इतिहास के पन्नों से... 

रक्षाबंधन की शुरुआत का सबसे पहला साक्ष्य रानी कर्णावती व सम्राट हुमायूँ हैं। मध्यकालीन युग में राजपूत व मुस्लिमों के बीच संघर्ष चल रहा था। रानी कर्णावती चितौड़ के राजा की विधवा थीं। उस दौरान गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह से अपनी और अपनी प्रजा की सुरक्षा का कोई रास्ता न निकलता देख रानी ने हुमायूँ को राखी भेजी थी। तब हुमायूँ ने उनकी रक्षा कर उन्हें बहन का दर्जा दिया था। 

दूसरा उदाहरण अलेक्जेंडर व पुरू के बीच का माना जाता है। कहा जाता है कि हमेशा विजयी रहने वाला अलेक्जेंडर भारतीय राजा पुरू की प्रखरता से काफी विचलित हुआ। इससे अलेक्जेंडर की पत्नी काफी तनाव में आ गईं थीं। 

उसने रक्षाबंधन के त्यौहार के बारे में सुना था। सो, उन्होंने भारतीय राजा पुरू को राखी भेजी। तब जाकर युद्ध की स्थिति समाप्त हुई थी। क्योंकि भारतीय राजा पुरू ने अलेक्जेंडर की पत्नी को बहन मान लिया था। 

इतिहास का एक अन्य उदाहरण कृष्ण व द्रौपदी को माना जाता है। कृष्ण भगवान ने दुष्ट राजा शिशुपाल को मारा था। युद्ध के दौरान कृष्ण के बाएँ हाथ की अँगुली से खून बह रहा था। इसे देखकर द्रौपदी बेहद दुखी हुईं और उन्होंने अपनी साड़ी का टुकड़ा चीरकर कृष्ण की अँगुली में बाँधा जिससे उनका खून बहना बंद हो गया। तभी से कृष्ण ने द्रौपदी को अपनी बहन स्वीकार कर लिया था। वर्षों बाद जब पांडव द्रौपदी को जुए में हार गए थे और भरी सभा में उनका चीरहरण हो रहा था तब कृष्ण ने द्रौपदी की लाज बचाई थी।

भारतीय गणना

आप भी चौक गये ना? क्योंकि हमने तो नील तक ही पढ़े थे..!